शिक्षा को नोटिफिकेशन से नहीं, संवाद से संचालित करें : प्रफुल्ल
श्रीनारद मीडिया, स्टेट डेस्क:

यूजीसी द्वारा लागू की जा रही नई नियमावली को लेकर उच्च शिक्षा क्षेत्र में असंतोष और रोष लगातार बढ़ रहा है। छात्र, शोधार्थी और शिक्षक इन प्रावधानों को न केवल अव्यावहारिक बता रहे हैं, बल्कि इन्हें उच्च शिक्षा की लोकतांत्रिक संरचना और भविष्य की दिशा के लिए हानिकारक भी मान रहे हैं। इसी संदर्भ में भारतीय जनता पार्टी वाणिज्य प्रकोष्ठ के प्रदेश प्रवक्ता प्रफुल्ल राज पांडेय ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि शिक्षा को जटिल और प्रतिबंधित करने वाले ऐसे निर्णय छात्रों के सपनों और देश की प्रगति—दोनों पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं।
प्रफुल्ल ने कहा कि आज देश का हर युवा अपने मेहनत, शोध और ज्ञान के आधार पर आगे बढ़ने की लड़ाई लड़ रहा है। ऐसे में सरकारी स्तर पर ऐसे नियम लागू करना, जिनसे प्रवेश प्रक्रिया, शोध अवसर, नियुक्ति, और विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता पर प्रतिकूल असर पड़े, न केवल अनैतिक है बल्कि राष्ट्रीय हित के भी खिलाफ जाता है। उन्होंने कहा कि भारत की शक्ति उसके युवा हैं और उनके भविष्य को अनिश्चित बनाना किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के अनुरूप नहीं है।
उन्होंने सरकार और यूजीसी से तत्काल संवाद की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि शिक्षा कोई तकनीकी आदेश नहीं है जिसे फाइलों और नोटिफिकेशन से लागू कर दिया जाए। शिक्षा का विषय समाज, परिवार और राष्ट्र से जुड़ा हुआ है। हर घर में शिक्षा एक उम्मीद है, एक सपना है और उस सपने को नियमों से बाधित करने का अधिकार किसी संस्था को नहीं होना चाहिए। प्रफुल्ल ने यह भी कहा कि यदि नीति निर्माण में लोकतांत्रिक भावना नहीं होगी तो विरोध और असंतोष स्वाभाविक रूप से उभरेंगे।
उन्होंने सरकार से यह भी मांग की कि किसी भी नई नियमावली को लागू करने से पहले छात्रों, शोधार्थियों, विशेषज्ञों, विश्वविद्यालय प्रशासन और शिक्षकों से खुला संवाद अनिवार्य किया जाए। यह संवाद न केवल समाधान ढूंढने में मदद करेगा बल्कि नीति निर्माण को अधिक न्यायपूर्ण भी बनाएगा। उन्होंने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य अवसरों को बढ़ाना और प्रतिभा को नई उड़ान देना है, न कि क्षमता को बाँधना और भविष्य को संकुचित करना।
उन्होंने चेतावनी दी कि यदि सरकार जल्द हस्तक्षेप नहीं करती और यूजीसी नियमों को वापस नहीं लेती तो उच्च शिक्षा क्षेत्र में उभर रहा असंतोष बड़े आंदोलन में बदल सकता है। युवाओं की ऊर्जा को असंतोष में बदलना देश के लिए किसी भी रूप में हितकारी नहीं हो सकता। उन्होंने इस संघर्ष को मात्र नीतिगत मुद्दा नहीं बल्कि राष्ट्र के भविष्य को बचाने का संघर्ष बताया।
अंत में उन्होंने कहा कि देश तभी प्रगति करेगा जब उसके युवा सुरक्षित, आश्वस्त और समर्थ महसूस करेंगे। शिक्षा को लोकतांत्रिक बनाना राष्ट्र निर्माण का आधार है और इस आधार को कमजोर करने वाली कोई भी नीति स्वीकार नहीं की जा सकती।
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