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कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट से सरकारी तेल कंपनियों का घाटा काफी कम हो गया है

कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट से सरकारी तेल कंपनियों का घाटा काफी कम हो गया है

श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क 

पश्चिम एशिया शांति समझौते की घोषणा के बाद से कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट का सिलसिला जारी है। इससे सरकारी तेल कंपनियों को होने वाला घाटा काफी कम हो चुका है और अब इनके लाभ में सुधार होने की उम्मीद है। ब्रोकरेज फर्म जेपी मॉर्गन की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकारी रिफाइनरियों और खुदरा ईंधन विक्रेताओं के पेट्रोल और डीजल की बिक्री पर संयुक्त मार्जिन अब हाल के पश्चिम एशिया संघर्ष से पहले के स्तर से ऊपर है।

तेजी से घट रही कच्चे तेल की कीमत

इसका कारण कच्चे तेल की कम कीमतें और केंद्रीय उत्पाद शुल्क में कटौती है। हालांकि, रिपोर्ट में इस बात की चिंता व्यक्त की गई है कि बढ़ते कर्ज और ईंधन कर को लेकर अनिश्चितता इस क्षेत्र की लंबी अवधि की कमाई की संभावनाओं को सीमित कर सकती है।

जब वैश्विक कच्चे तेल की कीमत करीब 115 डॉलर प्रति बैरल थी, तब सरकार ने बताया था कि तेल कंपनियों को पेट्रोल पर 23 रुपये और डीजल पर 35 रुपये प्रति लीटर का घाटा हो रहा है। पिछले सप्ताह आई रिपोर्ट के अनुसार, पेट्रोल पर यह घाटा कम होकर मात्र तीन रुपये प्रति लीटर रह गया है।

कंपनियों को कितना घाटा?

मई में पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में कुल मिलाकर करीब 7.50 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी की गई, लेकिन पेट्रोल पंप पर ईंधन के दाम लागत से कम थे। हाल के महीनों में पेट्रोलियम मंत्री हरदीप पुरी ने तेल कंपनियों के भारी घाटे पर चिंता जताई थी।

उन्होंने कहा था कि कंपनियां पेट्रोल, डीजल और एलपीजी बेचने पर रोजाना करीब 1,000 करोड़ रुपये का नुकसान उठा रही हैं और कुल अंडर-रिकवरी करीब दो लाख करोड़ रुपये के आसपास पहुंच गई है।

ऑयल कम्पनियों को लाभ की उम्मीद

रिपोर्ट के अनुसार, अप्रैल-जून तिमाही में भंडार में पहले से मौजूद महंगे तेल के चलते तेल कंपनियों की कमाई पर दबाव रहेगा, लेकिन जुलाई-सितंबर तिमाही से स्थिति सुधरने की उम्मीद है। हालांकि, दो बड़े मुद्दे इस सुधार को सीमित कर सकते हैं।

पहला, पिछले महीनों में कंपनियों ने काफी कर्ज लिया है, जिससे वैल्यूएशन प्रभावित होगा। दूसरा, मुनाफे में सुधार का बड़ा हिस्सा एक्साइज शुल्क कम करने से आया है। सरकार ने मार्च में पेट्रोल-डीजल पर 10-10 रुपये प्रति लीटर एक्साइज ड्यूटी घटाई थी, जिससे राजस्व में सालाना करीब 1.8 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर तेल की कीमतें अगर धीरे-धीरे कम होती रहती हैं तो भारत पेट्रोलियम (बीपीसीएल), इंडियन ऑयल (आईओसी) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (एचपीसीएल) में से बीपीसीएल और आईओसी को निकट भविष्य में सबसे अधिक लाभ होने की उम्मीद है। एलपीजी पर नुकसान अभी भी ज्यादा है, लेकिन कच्चे तेल की कीमत कम होने से इसमें भी राहत मिलने की उम्मीद है।

अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम होने की खबरों के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में नरमी देखने को मिल रही है. ब्रेंट क्रूड का भाव आज 22 जून को सुबह 7:00 बजे 79 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया था. पिछले कुछ महीनों में मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव की वजह से तेल की कीमतों में तेज उछाल आया था, लेकिन अब हालात सामान्य होने की उम्मीद से बाजार को राहत मिली है. तेल की कीमतों में गिरावट भारत जैसे देशों के लिए अच्छी खबर मानी जा रही है, क्योंकि देश अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है.
हालांकि, कच्चा तेल सस्ता होने के बावजूद आम लोगों को पेट्रोल और डीजल के दामों में तुरंत राहत मिलने की संभावना कम है. विशेषज्ञों का मानना है कि तेल कंपनियां और सरकार पहले बढ़ी हुई लागत और पुराने नुकसान की भरपाई पर ध्यान दे सकती हैं. ऐसे में ईंधन की कीमतों में कटौती होने में कुछ समय लग सकता है.

कच्चे तेल की कीमतों में क्यों आई गिरावट?

मिंट की रिपोर्ट के अनुसार, मिडिल ईस्ट में तनाव कम होने से वैश्विक बाजार में तेल आपूर्ति को लेकर चिंता घटी है. निवेशकों को उम्मीद है कि क्षेत्र से तेल की सप्लाई सामान्य बनी रहेगी, जिससे बाजार में उपलब्धता बढ़ेगी. यही वजह है कि पिछले दिनों तेजी से बढ़ी तेल कीमतों में अब नरमी देखने को मिल रही है.
कच्चा तेल सस्ता होने से भारतीय तेल डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियों को राहत मिल सकती है. जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होता है तो कंपनियों की लागत बढ़ जाती है. कई बार उपभोक्ताओं पर पूरा बोझ नहीं डाला जाता, जिससे कंपनियों के मुनाफे पर असर पड़ता है.
अब कीमतों में नरमी आने से कंपनियों की लागत कम हो सकती है. हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि कंपनियां पहले अपने वित्तीय दबाव को कम करने और मार्जिन सुधारने की कोशिश करेंगी. इसलिए तेल सस्ता होने का पूरा फायदा तुरंत उपभोक्ताओं तक पहुंचना मुश्किल है.

पेट्रोल-डीजल के दाम कब घट सकते हैं?

भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें केवल कच्चे तेल पर निर्भर नहीं करतीं. इसमें टैक्स, परिवहन लागत और अन्य खर्च भी शामिल होते हैं. यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल सस्ता होने के बाद भी घरेलू कीमतों में तुरंत बदलाव नहीं होता.
विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक कंट्रोल रहती हैं, तो आने वाले महीनों में पेट्रोल और डीजल के दामों में कुछ राहत मिल सकती है, लेकिन यह राहत स्टेप-बाय-स्टेप तरीके से मिलने की संभावना है.

अर्थव्यवस्था को कैसे होगा फायदा?

सस्ता कच्चा तेल भारत की अर्थव्यवस्था के लिए पॉजिटिव माना जाता है. इससे देश का आयात बिल कम हो सकता है और फॉरेन करेंसी पर दबाव घट सकता है. साथ ही परिवहन और एनर्जी लागत कम होने से महंगाई को कंट्रोल रखने में भी मदद मिल सकती है.
इसके अलावा, तेल की कीमतों में स्थिरता आने से उद्योगों और कारोबारों को भी फायदा होगा. इससे आर्थिक गतिविधियों को मजबूती मिल सकती है और विकास को समर्थन मिलेगा.

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