अब किस्मत नहीं, इलाज बदलेगा बच्चों का भविष्य: छपरा सदर अस्पताल में बिना ऑपरेशन ठीक हो रहे जन्मजात टेढ़े-मेढ़े पैर
पोंसेटी विधि से क्लबफुट पीड़ित बच्चों का शुरू हुआ निःशुल्क इलाज
समय पर उपचार मिलने पर सामान्य बच्चों की तरह चल-फिर सकेंगे मासूम
अनुष्का फाउंडेशन के सहयोग से जरूरत की सामग्री भी मिल रही मुफ्त
श्रीनारद मीडिया, पंकज मिश्रा, अमनौर/छपरा (बिहार):

कभी गांव-देहात में जब किसी बच्चे का जन्म टेढ़े-मेढ़े पैरों के साथ होता था तो लोग इसे भगवान की मर्जी या किस्मत का लिखा मानकर चुप हो जाते थे। परिवार यह सोचकर उम्मीद छोड़ देता था कि अब यह बच्चा कभी सामान्य रूप से चल नहीं पाएगा। जानकारी के अभाव, आर्थिक तंगी और इलाज की सुविधा नहीं होने के कारण ऐसे हजारों बच्चे जीवनभर शारीरिक विकलांगता जैसी स्थिति के साथ जीने को मजबूर हो जाते थे। लेकिन अब समय बदल चुका है। आधुनिक चिकित्सा पद्धति ने इस सोच को पूरी तरह बदल दिया है। सारण जिले के सदर अस्पताल में जन्मजात क्लबफुट से पीड़ित बच्चों के लिए विश्वस्तरीय उपचार की शुरुआत हुई है, जिससे बिना किसी बड़े ऑपरेशन के बच्चों के टेढ़े-मेढ़े पैरों को सामान्य बनाया जा रहा है।
एक जुलाई 2026 से सदर अस्पताल में जन्मजात क्लबफुट से प्रभावित बच्चों का इलाज पोंसेटी विधि के माध्यम से शुरू किया गया है। यह तकनीक दुनिया भर में क्लबफुट के उपचार के लिए सबसे प्रभावी और सुरक्षित मानी जाती है। इस उपचार के जरिए अधिकांश बच्चों को बड़े ऑपरेशन की जरूरत नहीं पड़ती। विशेषज्ञ चिकित्सकों की निगरानी में बच्चे के पैर पर विशेष प्लास्टर चढ़ाया जाता है और प्रत्येक सप्ताह उसे बदलते हुए पैर की विकृति को धीरे-धीरे सही दिशा में लाया जाता है। इस प्रक्रिया को सीरियल प्लास्टर कास्टिंग कहा जाता है।
समय पर इलाज से पूरी तरह सामान्य हो सकता है बच्चा
सदर अस्पताल के हड्डी रोग विशेषज्ञ डॉ. रवि अमृत के नेतृत्व में इस उपचार की शुरुआत की गई है। उनका कहना है कि यदि जन्म के तुरंत बाद या शुरुआती महीनों में ही क्लबफुट का इलाज शुरू कर दिया जाए तो अधिकांश बच्चे पूरी तरह सामान्य जीवन जी सकते हैं। वे न केवल सामान्य बच्चों की तरह चल सकते हैं, बल्कि दौड़ने, खेलने और पढ़ाई-लिखाई सहित सभी दैनिक गतिविधियां बिना किसी परेशानी के कर सकते हैं।
डॉक्टरों के अनुसार क्लबफुट कोई लाइलाज बीमारी नहीं है। यह जन्म के समय होने वाली पैरों की एक विकृति है, जिसका समय पर उपचार होने पर लगभग पूरी तरह सुधार संभव है। इसलिए अभिभावकों को चाहिए कि यदि नवजात के पैरों में किसी प्रकार का टेढ़ापन दिखाई दे तो इसे नजरअंदाज करने के बजाय तुरंत विशेषज्ञ चिकित्सक से संपर्क करें।
बिना ऑपरेशन मिल रही नई जिंदगी
पोंसेटी विधि की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें बड़े ऑपरेशन की आवश्यकता बहुत कम पड़ती है। नियमित अंतराल पर प्लास्टर बदलते हुए पैरों की स्थिति को धीरे-धीरे ठीक किया जाता है। इससे बच्चे को कम तकलीफ होती है, उपचार का खर्च भी कम आता है और सफलता की संभावना काफी अधिक रहती है। विशेषज्ञों का मानना है कि शुरुआती अवस्था में शुरू किया गया उपचार बच्चों के भविष्य को पूरी तरह बदल सकता है। इससे वे सामान्य स्कूलों में पढ़ सकते हैं, खेलकूद में भाग ले सकते हैं और आत्मनिर्भर जीवन जी सकते हैं।
गरीब परिवारों के लिए राहत बनी अनुष्का फाउंडेशन
इस पहल में सामाजिक संस्था अनुष्का फाउंडेशन भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। संस्था की ओर से क्लबफुट के इलाज में उपयोग होने वाली आवश्यक सामग्री निःशुल्क उपलब्ध कराई जा रही है। इससे आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को बड़ी राहत मिली है। कई ऐसे अभिभावक, जो इलाज का खर्च उठाने में सक्षम नहीं थे, अब बिना आर्थिक बोझ के अपने बच्चों का उपचार करा पा रहे हैं।स्वास्थ्य विभाग का मानना है कि सरकारी अस्पताल और सामाजिक संस्थाओं के इस संयुक्त प्रयास से जिले में क्लबफुट से पीड़ित अधिक से अधिक बच्चों को समय पर उपचार मिल सकेगा।
जागरूकता बढ़ाने की भी जरूरत
सदर अस्पताल के प्रबंधक राजेश्वर प्रसाद ने कहा कि आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में क्लबफुट को लेकर कई तरह की भ्रांतियां हैं। कुछ लोग इसे भाग्य या ईश्वर की इच्छा मान लेते हैं, जबकि यह पूरी तरह इलाज योग्य स्थिति है। इसलिए समाज में जागरूकता बढ़ाना भी उतना ही जरूरी है, जितना इलाज उपलब्ध कराना। सदर अस्पताल की यह पहल न केवल चिकित्सा सुविधा का विस्तार है, बल्कि उन परिवारों के लिए उम्मीद की नई किरण भी है, जो कभी अपने बच्चों के भविष्य को लेकर निराश हो जाते थे। अब आधुनिक चिकित्सा, प्रशिक्षित चिकित्सकों और समय पर उपचार की बदौलत जन्मजात टेढ़े-मेढ़े पैरों वाले बच्चे भी सामान्य जीवन की ओर आत्मविश्वास के साथ कदम बढ़ा रहे हैं।
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