अफ्रीकन आम एवं लीची पहुंचा सीवान

अफ्रीकन आम एवं लीची पहुंचा सीवान

अफ्रिका महादेश में मेडागास्कर देश से यह आम आया है

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✍🏻 राजेश पाण्डेय

श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

जी नमस्कार। हां आप ठीक आकलन कर रहे है। यह आम ही है लेकिन यह पिछले मौसम का आम नहीं है बल्कि अभी एक हफ्ते पहले यह पेड़ से तोड़ा गया है। यह आम खास है। क्यों खास है?
क्योंकि जिस तरह से इंटरनेट में हम सभी को एक ग्लोबल ग्राम में रहने के लिए मजबूर कर दिया है। उस प्रकार से अब कोई भी फल हमारे लिए मौसमी नहीं रह गया है। यही कारण है कि यह आम हमारे घर सीवान तक पहुंच गया है। यह आम इसलिए भी खास है क्योंकि यह ससुराल पक्ष की ओर से आया है।

सबसे बड़ी बात यह है कि यह आम अफ्रीका महादेश के मेडागास्कर देश से भारत पहुंचा है। इस आम ने लगभग 5000 किलोमीटर की यात्रा तय करके सीवान की धरती पर अवतरित हुआ है।
सीवान जिले में पचरुखी प्रखंड अंतर्गत गम्हरिया गांव निवासी चंद्रभूषण ओझा के बेटे हृदय ओझा अफ्रीकन देश मेडागासकर में एक अंतर्राष्ट्रीय कम्पनी में शीर्ष पद पर कार्यरत है। ऐसे आप सभी‌ रांची नगर के लालपुर चौक के निकट वाले मुहल्ले के रहवासी हैं।
अब आप समझ गए होंगे, वहीं हृदय ओझा की बड़ी बहन से मेरा विवाह हुआ है। ऐसे में आम एवं लीची तो मेरे लिए बनता है।

मेडागास्कर दक्षिणी गोलार्ध में स्थित है और हमारा भारत देश उत्तरी गोलार्ध में अवस्थित है, ऐसे में जब हमारे यहां ठंड का मौसम होता है तो मेडागास्कर में गर्मी का वातावरण होता है। वहां इन दिनों आम और लीची का मौसम है, वहीं से यह आम और लीची हमारे घर तक आया है। इसका स्वाद ठीक है। स्वाद जो भी हो लेकिन खाने में बस यही लग रहा है कि हम अफ्रीका महादेश में मेडागास्कर देश के आम और लीची का आनंद लें रहे हैं, सुखद है अच्छा है।

भारत का अफ्रीकन महादेश से संबंध मधुर रहा है। हमारी तरह आप भी तीसरी दुनिया के देश हैं। आपके अधिकतर देशों में फ्रांस एवं ब्रिटेन का औपनिवेश रहा। हम भी लंबे समय तक ब्रिटेन के औपनिवेश रहे। इसलिए हमारी भाषा, बोली- वाणी संस्कृति में एक अलग प्रकार का जुड़ाव आप देख सकते हैं। उत्तरी अफ्रीका के कई देशों में भारत के गुजराती समुदायों का वाणिज्य एवं व्यापार पर आज अच्छा खासा प्रभाव है। वहीं दक्षिण अफ्रीका, केन्या, जिंबॉब्वे, तंजानिया, नाइजीरिया सहित कई देशों के नगरों पर में अप्रवासी भारतीयों की अच्छी उपस्थिति है। जो संस्कृतिक भारतीय राजदूत के रूप में यहां के समाज से संबद्ध हैं।

बहरहाल आम और लीची ने संबंधों को मधुर बनाने में आज भी कोई कोर कसर नहीं छोड़ रखा है। यह आम, आम नहीं बल्कि खास है।

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