फाइलेरिया उन्मूलन की जंग में पीएसपी सदस्य फ्रंटलाइन पर, नाइट ब्लड सर्वे को मिल रहा जनसहयोग

फाइलेरिया उन्मूलन की जंग में पीएसपी सदस्य फ्रंटलाइन पर, नाइट ब्लड सर्वे को मिल रहा जनसहयोग
• समुदाय की ताकत से चलेगा फाइलेरिया प्रहार
• नाइट ब्लड सर्वे के महत्व को समझा रहें सदस्य
• पीएसपी की भूमिका केवल जागरूकता तक सीमित नहीं

श्रीनारद मीडिया, पंकज मिश्रा, अमनौर, सारण (बिहार):

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सारण जिले में फाइलेरिया उन्मूलन को लेकर इस बार स्वास्थ्य विभाग ने समुदाय को केंद्र में रखकर रणनीति तेज कर दी है। रिविलगंज और दिघवारा प्रखंड में बने पेशेंट स्टेकहोल्डर प्लेटफॉर्म अब जमीनी स्तर पर बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। नाइट ब्लड सर्वे की तैयारी और सर्वजन दवा सेवन को लेकर पीएसपी सदस्यों की सक्रियता ने अभियान को नई ताकत दी है। सीएचओ की अध्यक्षता में गठित इन मंचों में पंचायत प्रतिनिधि, जीविका समूह, आईसीडीएस, ग्रामीण चिकित्सक, फाइलेरिया मरीज, यूथ वॉलंटियर और समाज कल्याण से जुड़े लोग शामिल हैं, जो मिलकर गांव के प्रत्येक परिवार तक जागरूकता पहुंचाने में जुटे हैं। रिविलगंज और दिघवारा प्रखंड में फाइलेरिया उन्मूलन अभियान को गति देने के लिए बनाए गए पेशेंट स्टेकहोल्डर प्लेटफॉर्म (PSP) अब जमीनी स्तर पर मजबूत भूमिका निभा रहे हैं। दोनों प्रखंडों में कुल 12 पीएसपी का गठन किया गया है, जिनकी अगुवाई सीएचओ कर रहे हैं।

नाइट ब्लड सर्वे के महत्व को समझा रहें सदस्य:
स्वास्थ्य विभाग द्वारा नाइट ब्लड सर्वे के लिए चिन्हित गांवों में बैठकें शुरू की जा चुकी हैं। सीएचओ तिथि तय कर पंचायत स्तर पर पीएसपी सदस्यों के साथ बैठकों में लोगों को समझा रहे हैं कि नाइट ब्लड सर्वे क्यों जरूरी है, यह कैसे किया जाता है और इससे फाइलेरिया की चेन तोड़ने में कैसे मदद मिलती है। लोग पहले एनबीएस को लेकर भ्रमित रहते थे, लेकिन अब पीएसपी की ओर से घर-घर जाकर समझाए जाने पर समुदाय सर्वे के महत्व को समझ रहा है। ग्रामीणों को बताया जा रहा है कि रात में लिए गए रक्त के नमूनों से माइक्रोफाइलेरिया की पहचान होती है और इसी आधार पर बीमारी पर नियंत्रण की योजना बनाई जाती है।

पीएसपी की भूमिका केवल जागरूकता तक सीमित नहीं
फाइलेरिया उन्मूलन अभियान में पीएसपी की भूमिका केवल जागरूकता तक सीमित नहीं है। इन सदस्यों को पहले ही फाइलेरिया, उसके लक्षण, बचाव और एमडीए दवा खाने के महत्व के बारे में प्रशिक्षित किया गया है। प्रशिक्षण का असर अब मैदान में दिख रहा है। पंचायत के मुखिया, सरपंच और वार्ड सदस्य अपने स्तर पर गांवों में संभावित लक्षण वाले लोगों की पहचान कर सीएचओ को सूचना दे रहे हैं। इससे संदिग्ध मरीजों की समय पर जांच और इलाज संभव हो पा रहा है। वहीं पहचान किए गए फाइलेरिया मरीजों को स्वास्थ्य विभाग की ओर से एमएमडीपी किट और यूडीआईडी कार्ड उपलब्ध कराया जा रहा है, ताकि उन्हें बेहतर देखभाल, राहत और जरूरी सरकारी सुविधाएं मिल सकें।

इधर पंचायत और सामुदायिक कार्यक्रमों के जरिए भी जागरूकता का दायरा बढ़ाया जा रहा है। आईसीडीएस टीम अपने नियमित रूटिन टीकाकरण सत्र, अन्नप्राशन और गोद भराई कार्यक्रमों के दौरान गर्भवती महिलाओं और माताओं को बता रही है कि फाइलेरिया से बचने के लिए दवा सेवन कितना जरूरी है। जीविका समूह की दीदियां VO और CLF बैठकों में महिलाओं को समझा रही हैं कि पूरे परिवार को एक साथ दवा देनी है, तभी अभियान सफल होगा। विकास मित्र दलित बस्तियों में विशेष कार्यक्रम कर लोगों तक संदेश पहुंचा रहे हैं। इसके अलावा यूथ क्लब के सदस्य शाम की बैठकों में युवाओं के साथ एमडीए विषय पर चर्चा कर रहे हैं।

पीएसपी की कोशिशों के कारण कई पंचायतों में लोगों की सोच में तेजी से बदलाव आ रहा है। पहले जहां दवा को लेकर झिझक और भ्रम था, वहीं अब लोग खुद आगे आकर पूछ रहे हैं कि सर्वे कब होगा और दवा कब मिलेगी। CHO की टीम और PSP सदस्य लगातार यह समझा रहे हैं कि फाइलेरिया को खत्म करने का एक ही तरीका है—शत-प्रतिशत दवा सेवन और समय पर सर्वे में सहयोग।
स्वास्थ्य विभाग का लक्ष्य है कि इस बार नाइट ब्लड सर्वे का कवरेज 100 प्रतिशत हो और कोई भी परिवार या व्यक्ति छूटे नहीं। पीएसपी की सक्रिय भागीदारी ने इस लक्ष्य को आसान बना दिया है। समुदाय के बीच उनकी पकड़ और भरोसे ने अभियान को मजबूत आधार दिया है।

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