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उस गांव की मिट्टी को नमन…

उस गांव की मिट्टी को नमन…

श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

वर्तमान दौर में जब गांव विकास की राह पर चलते हुए शहर होने लगे हैं, माहौल बदल रहा है और भाईचारे की जगह वैमनस्य बढ़ रहा है, तब दुनिया के शिखर राष्ट्र अमेरिका की सरजमीं पर अपनी काबिलियत का झंडा लहरा रहा एक लड़का अभी भी उस गांव से न केवल खुद को जोड़े हुए है बल्कि उससे जुड़ा रहना चाहता है, ऐसे समय में जब गांव बदल रहे हैं तो गांवों से निकलने वाले लोग भी उनसे दूर होते जा रहे हैं। यह कहानी सांता नंद मिश्र की है।

वॉशिंगटन डीसी में मैनेजमेंट और फाइनेंस के क्षेत्र में शानदार कार्य कर रहे सांता जी की कहानी दिलचस्प है और सोचने के लिए मजबूर भी करती है। फेसबुक पर अक्सर वेदांता ग्रुप के मालिक अनिल अग्रवाल के जीवन की कहानी और उससे पहले भारत में E&Y को स्थापित करने वाले काशीनाथ मेमानी की जीवन गाथा पढ़ कर पता चला था कि सफलता हासिल करने के लिए कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं। उद्यमिता उनके जीन में थी।

वहीं ऐसी और भी महान विभूतियां हो चुकी हैं जो अपने परिश्रम की बदौलत तमाम मुश्किलों से गुजर कर शिखर पर पहुंची। सांता जी भी उस फेहरिस्त में शामिल हो गए हैं। हालांकि, उनको अभी और भी आगे जाना है। उससे पहले अपने जीवन के कुछ पन्नों को उन्होंने लिपिबद्ध करने का यह अनूठा प्रयास किया है जिसमें बहुत सी खट्टी-मीठी यादें शामिल हैं।

सांता जी से #JNU में मेरी मुलाकात फकत तीन साल की रही होगी क्योंकि वे 1997 में कैंपस में आए और मैं 2000 में वहां से बाहर हो गया। इस दरम्यान मनीष, सुमित, व्यालोक और पीयूष जी सहित कई कॉमन मित्रों के माध्यम से सांता जी से मिलना होता रहा। वह जेएनयू में बदलाव का दौर था। ऐसे में गांव से आए सांता जी का अत्यंत सहज और सरल व्यक्तित्व बड़ी आसानी से आकर्षित करता था। खासतौर से पढ़ाई और अंग्रेजी सीखने के प्रति उनकी ललक कम से कम हर गंभीर और संवेदनशील छात्र को उनसे जु़ड़ने के लिए प्रेरित जरूर करती थी।

ऐसे सांता जी एक दिन कामयाब होंगे और कुछ अच्छा ही करेंगे यह सोचने में कोई दिक्कत नहीं थी, और सांता जी उम्मीदों से आगे बढ़कर सफल हुए यह और भी प्रसन्नता की बात है। कैंपस छोड़ने के बाद सांता जी से मेरा सीधे संवाद और संपर्क लंबे समय तक नहीं रहा। हालांकि परिचितों के माध्यम से उनके बारे में छिटपुट जानकारियां मिलती रहीं। २०१४-१६ के आसपास सांता जी के अमेरिका में होने के बारे में पता चला जब मैं संपूर्ण विश्व के मीडिया पर अपनी महत्वाकांक्षी पुस्तक में अमेरिकी मीडिया के संबंध में अमेरिका में रह रहे किसी व्यक्ति की टिप्पणी की तलाश कर रहा था। सांता जी ने उदारतापूर्वक अपनी टिप्पणी मुझे भेजी जिसे मैंने पुस्तक में शामिल किया। इस बीच सांता जी के दिल्ली आने पर उनसे पुनः मिलने का अवसर भी मिला।

मेरे लिए अत्यंत हर्ष और संतोष की बात यह है कि सांता जी ने सिवान से अमेरिका और जेएनयू से वाया डीएसई, हटफोर्ड का सफर तय किया लेकिन उनके स्वभाव और बर्ताव में ऐसा कोई बदलाव नहीं दिखा जिसके आधार पर यह कहा जा सके कि सांता जी तो बदल गए! सांता जी ने खुद भी पुस्तक में स्वीकार किया है कि सामाजिकता के मामले में वे जैसे थे वैसे ही रहे। अज्ञेय कह गए हैं कि दुख सबको मांजता है। सांता जी के जीवन में भी दुश्वारियां बहुत आईं लेकिन वे तमाम विघ्न बाधाओं से गुजरते हुए जीवन पथ पर आगे बढ़ते रहे। सांता जी का दिल साफ है और ध्येय स्पष्ट है।

उनकी यह कृति इसका प्रमाण है। हालांकि इस पुस्तक की सार्थकता केवल सांता जी के अतीत और भविष्य के कार्यों से नहीं बल्कि इस बात से साबित होगी कि उखई जैसे देश के तमाम गांवों के बच्चे इसे पढ़ें और सच्चाई एवं सदाचार के पथ पर चलते हुए जीवन में उचित मुकाम हासिल करने के लिए प्रेरित हों। उखई गांव की उस मिट्टी को नमन है जहां सांता जी का जन्म हुआ, उनके परिवार के प्रति श्रद्धानत हूं जिन्होंने उन्हें सत्संस्कार दिए।

जेएनयू में उनकी पुस्तक के विमोचन समारोह का हिस्सा बनने का अवसर मिला। लेकिन कृति पर अपने विचार व्यक्त करने के लिए इसे पढ़ना भी था। इसे आद्योपांत पढ़ने के बाद सांता जी को पुनः मेरी हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं।

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