सुप्रीम कोर्ट और धार भोजशाला की वाग्देवी मंदिर पर आदेश
श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

मध्य प्रदेश में धार स्थित भोजशाला को वाग्देवी मंदिर घोषित करने के हाई कोर्ट के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक नहीं लगाई है। हालांकि शीर्ष अदालत ने परिसर के पास ही कोई खुली वैकल्पिक जगह मुसलमानों को शुक्रवार को नमाज के लिए मुहैया कराने का आदेश दिया है।
इसके साथ ही कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली मुस्लिम पक्ष की याचिकाओं पर मध्य प्रदेश सरकार, केंद्र सरकार और भारत पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) को नोटिस जारी किया है। ये भी निर्देश दिया है कि सुप्रीम कोर्ट की इजाजत के बगैर एएसआई इमारत में कोई ढांचागत बदलाव नहीं करेगी। मामले पर कोर्ट तीन सप्ताह बाद फिर सुनवाई करेगा।
ये आदेश प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, जोयमाल्या बाग्ची और वी. मोहना की पीठ ने हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली मुस्लिम पक्ष की याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान दिये। मुस्लिम पक्ष की ओर से हाई कोर्ट के आदेश पर अंतरिम रोक लगाने और पूर्व स्थिति बहाल करने की मांग की गई।
मुस्लिम पक्ष की ओर से पेश वरिष्ठ वकील हुजैफा अहमदी और अभिषेक मनु सिंघवी, मिनाक्षी अरोड़ा ने जोरदार बहस करते हुए कहा कि लंबे समय से परिसर में नमाज होती चली आ रही है। और कई दस्तावेजों में इसे मस्जिद माना गया है। इन चीजों पर ध्यान दिए बगैर हाई कोर्ट ने परिसर को मंदिर घोषित करने का आदेश दे दिया।
अभिषेक मनु सिंघवी का कहना था कि भोजशाला मामले में हाई कोर्ट का आदेश 1991 के पूजा स्थल कानून के प्रविधानों का उल्लंघन करने वाला है। उन्होंने कहा कि भारत में कई परतों का इतिहास है। इसकी परतें डिर्स्टब करने से सब डिस्टर्ब हो जाएगा और इसीलिए 1991 का पूजा स्थल कानून है। उस कानून में अयोध्या को छोड़ा गया था उसे हम मान लेते हैं लेकिन इस मामले में तो 1991 के कानून का प्रतिबंध लागू होगा।
इस केस पर तो सुनवाई ही नहीं हो सकती थी। सभी वकीलों ने हाई कोर्ट के आदेश पर अंतरिम रोक लगाने की मांग की और कहा कि हाई कोर्ट का फैसला आते ही अगले दिन एएसआई ने आदेश जारी कर दिया कि वह मंदिर है और मुस्लिम पक्ष का उस पर कोई अधिकार नहीं है।
हालांकि दूसरी ओर तरफ मध्य प्रदेश सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने हाई कोर्ट के आदेश पर अंतरिम रोक का विरोध किया। मेहता ने कहा कि मुस्लिम पक्ष ने हाई कोर्ट के आदेश को दो महीने बाद चुनौती दी है और ये अब हाई कोर्ट के आदेश पर अंतरिम रोक मांग रहे हैं लेकिन इस बीच कई चीजें हो चुकी हैं, अगर अब उस आदेश पर रोक लगाई गई तो कानून व्यवस्था की समस्या खड़ी हो सकती है।
कोर्ट ने दोनों पक्षों को धैर्य रखने के सलाह दी कोर्ट ने कहा कि ये मामला बहुत संवेदनशील है। कोई ने कहा कि ऐसा आदेश नहीं दिया जा सकता जिससे कानून व्यवस्था बिगड़ने की आशंका हो। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कोर्ट ने याचिकाओं पर नोटिस जारी किया और इसके साथ ही प्रशासन को आदेश दिया कि शुक्रवार को एक बजे से लेकर तीन बजे के बीच परिसर के पास ही मुसलमानों को कोई वैकल्पिक खुली जगह दी जाए जहां वे नमाज अदा करेंगे।
हालांकि कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह व्यवस्था तदर्थ होगी और सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले के अधीन होगी। मुस्लिम पक्ष द्वारा इमारत में बदलाव व निर्माण की आशंका जताने और उस बारे में यथास्थिति कायम रखने का आदेश मांगने पर कोर्ट ने निर्देश दिया कि एएसआई सुप्रीम कोर्ट की अनुमति के बगैर इमारत में कोई ढांचागत बदलवा नहीं करेगी।
मामले को सीजेआई की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए तीन सप्ताह बाद लगाया जाएगा। इस बीच दोनों पक्ष उत्तर प्रतिउत्तर दाखिल कर देंगे।
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने भोजशाला परिसर के धार्मिक स्वरूप के बारे में 15 मई को फैसला दिया था। हाई कोर्ट ने फैसले में कहा कि परिसर भोजशाला और वाग्देवी (सरस्वती) देवी का मंदिर था। हालांकि मुस्लिम पक्ष उसे कमाल मौला मस्जिद बता रहे थे। हाई कोर्ट ने आदेश में कहा था कि मुसलमान मस्जिद के निर्माण के लिए वैकल्पिक जमीन के लिए राज्य सरकार से आवेदन कर सकते हैं।
हाई कोर्ट ने परिसर को मंदिर घोषित करते हुए आदेश में कहा है कि ऐतिहासिक साहित्य और पुरातात्विक संदर्भों से यह स्थापित होता है कि यह स्थल संस्कृत शिक्षा का केंद्र था और यहां देवी सरस्वती को समर्पित एक मंदिर भी मौजूद था।
काजी मुइनुद्दीन ने हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। इसके अलावा मस्जिद के मुतवल्ली ने भी अपील दाखिल की है।
