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राजा भोज की भोजशाला के 188 स्तंभों में छिपा है इतिहास

राजा भोज की भोजशाला के 188 स्तंभों में छिपा है इतिहास

श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

सनातन के विराट, विशद वैभव का गुणगान करती धार की भोजशाला सदियों से जिस क्षण की आतुरता से प्रतीक्षा कर रही थी, वह आ ही गया। यह प्रतीक्षा केवल धार नगरी के निवासियों की नहीं थी बल्कि अटक से कटक तक और लद्दाख से लक्षद्वीप तक समस्त भारत वर्ष के उन ज्ञान साधकों की भी थी, जो अपनी आराध्य मां वाग्देवी के मंदिर की मुक्ति का स्वप्न संजोए थे।

करीब 700 वर्षों के कालखंड में परमार वंश के प्रतापी राजा भोज की आराध्य वाग्देवी (मां सरस्वती) का यह मंदिर विधर्मियों के कई दुर्दांत आक्रमण झेलकर भी आज प्रसन्न है। पहले विदेशी आक्रांताओं से अपनी धरोहर की रक्षा और फिर इसके स्वामित्व के लिए लड़ी गई लंबी कानूनी लड़ाई के बाद मिली हमारी इस विरासत की गाथा कम रोमांचक नहीं है।

सनातन के अडिग स्तंभ

परमार वंश के प्रतापी राजा भोज उद्भट विद्वान थे। उन्होंने 1010 से 1055 ईस्वी तक शाासन किया। 1034 ईस्वी में उन्होंने भोजशाला का निर्माण करवाया। कला और संस्कृति के उपासक राजा भोज ने धारा नगरी (वर्तमान में धार) को शिक्षा और कला की राजधानी के रूप में विकसित किया।

नालंदा और तक्षशिला की तरह यहां संस्कृत विश्वविद्यालय स्थापित किया, जहां देश-दुनिया के विद्वान, शोधार्थी और बटुक वेद-उपनिषदों के गूढ़ रहस्यों का अध्ययन करते थे। इस पूर्वाभिमुख बहुमंजिला आयताकार भवन में विशाल सभा मंडप, सैकड़ों नक्काशीदार स्तंभ और कक्ष थे। विदेशी आक्रांताओं के आक्रमण के बाद अब भोजशाला का मुख्य प्रासाद, जहां कभी वाग्देवी की प्रतिमा स्थापित थी, ही शेष बचा है।

परिसर में 188 स्तंभ गवाही देते हैं कि उन्होंने कितनी कठिनाई सहकर भी सनातन के इस गौरव को थामे रखा। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के आदेश के बाद एएसआइ के सर्वे में जब इन स्तंभों पर जमी धूल हटी तो हर स्तंभ नई गाथा सुनाता नजर आया। परमारकालीन अद्भुत वास्तु शिल्प भोजशाला के स्तंभों में नजर आता है। यहां मंदिर की घंटियां, शंख और कीर्तिमुख दिखते हैं।

स्तुति मंत्र सुनाती हैं दीवारें

भोजशाला के मुख्य द्वार से भीतर प्रवेश करते ही इतिहास स्वयं बोल उठता है। बरबस ही दृष्टि काले पाषाण पर उत्कीर्ण प्राकृत और संस्कृत भाषा में लिखे शब्दों पर टिक जाती है। विशेषज्ञ बताते हैं कि ये पारिजात मंजरी नाट्य को लिपिबद्ध कर लगाया गया था।

कुछ पत्थरों पर देवी सरस्वती के मंत्र और भगवान शिव व श्रीराम का भी उल्लेख है। 17 पत्थरों में से कुछ दीवारों पर लगे हैं जबकि कुछ संग्रहालय व परिसर में सुरक्षित हैं। कुछ पत्थरों पर धारा नगरी के नगर नियोजन से जुड़ी जानकारी भी दर्ज है।

दीवारों पर राजा भोज द्वारा बनवाए गए कालसर्प और सिद्धि यंत्र स्पष्ट नजर आते हैं। इतिहासविद् बताते हैं कि राजा भोज ने धार में 84 चौराहों का निर्माण करवाया था, वहीं भोजशाला में 84 अलग-अलग यंत्र बनवाए थे।

700 वर्ष बाद आहुतियों के लिए तैयार हवनकुंड

भोजशाला परिसर के ठीक मध्य में विशाल हवनकुंड है। यह हवन कुंड के निर्माण की तकनीक यह बताने के लिए पर्याप्त है कि हमारा प्राचीन ज्ञान-विज्ञान तब कितना समृद्ध था। कुंड गणितीय माप के अनुसार है। मंडप का आकार कुंड के आकार के अनुसार, कुंड का आकार आहुतियों की संख्या पर और आहुतियों की संख्या अनुष्ठान पर निर्भर करती थी।

यज्ञ कुंड में बड़ी मात्रा में घी के प्रवाह के लिए भी व्यवस्था नजर आती है। हर वर्ष वसंत पंचमी पर राजा भोज भव्य आयोजन करते थे। इसमें सरस्वती यज्ञ सबसे महत्वपूर्ण होता था। 500 महाविद्वान और कविगणों से सज्जित उनका राजदरबार इस उत्सव में शामिल होकर आहुतियां देता था। वर्ष 1305 में अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के बाद अब यह यज्ञकुंड मानो फिर से आहुतियों के लिए तैयार हो रहा है।

धार की भव्य धरोहर

परमार काल स्थापत्य, ज्ञान, विज्ञान, कला और संस्कृति के क्षेत्र में कितना उन्नत था, यह धार स्थित भोजशाला को देखकर पता लग जाता है। वाग्देवी की प्रतिमा जिस स्थान पर विराजित थी, वहां गुंबद की नक्काशी चमत्कृत कर देती है।

अष्टकमल की सुंदर आकृति और उसके आस-पास की रचनाएं भी मोहक हैं। इसके एक हिस्से में कई चक्रों के साथ बनी नक्काशी बताती है कि भोज के राज्य में कितने कुशल वास्तुविद और शिल्पज्ञ मौजूद थे। भोजशाला के पूर्व-उत्तर क्षेत्र के पास वह इमारत भी नजर आती है, जिसे कमाल मौला मस्जिद कहा जाता है। इसी परिसर के भीतर स्थित है सरस्वती कूप, जिसे अकल कूप भी कहा जाता है।

इतिहासविद् बताते हैं कि इसके निर्माण में धातु विज्ञान और शिलाओं के विशेषज्ञों की सहायता ली गई थी। इस अकल कूप पर 14 कोणीय संरचनाएं बनी हुई हैं। यहां विद्यार्थी विद्याध्ययन करते थे। अब भी इस कूप में जलधाराएं प्रवाहित होती हैं।

मंदिर ही है भोजशाला

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ) द्वारा 98 दिन किए गए सर्वे के बाद मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में 24 दिन नियमित सुनवाई हुई। 15 मई को जब कोर्ट ने ऐतिहासिक निर्णय सुनाते हुए कहा- ‘मंदिर ही है भोजशाला’ तो वर्षोंवर्ष से प्रतीक्षा कर रहे लोगों का आत्मा झंकृत हो उठा।

कोर्ट ने भोजशाला में पूजा के सीमित अधिकार को समाप्त करते हुए अब वर्ष भर दर्शन-पूजन की अनुमति दे दी और पूरे परिसर को मंदिर घोषित करते हुए यह भी कहा कि यहां पूजा की परंपरा कभी समाप्त ही नहीं हुई।

यहां मिले साक्ष्य और स्थापत्य इसे राजा भोजकालीन सरस्वती मंदिर सिद्ध करते हैं। कोर्ट ने एएसआइ के उस आदेश को भी रद कर दिया, जिसमें प्रति शुक्रवार को भोजशाला परिसर में नमाज पढ़ने की अनुमति दी गई थी।

अब वाग्देवी की प्रतीक्षा

मां सरस्वती का ‘शारदा सदन’ कहलाने वाली भोजशाला में निर्बाध पूजा की अनुमति मिलने के बाद अब लोगों को वाग्देवी की उस दुर्लभ प्रतिमा की प्रतीक्षा है, जो वर्ष 1875 में अंग्रेजों द्वारा लंदन ले जाई गई थी। वाग्देवी की इस प्रतिमा का निर्माण संभवत: 1034 ईस्वी में करवाया गया था।

128.5 सेंटीमीटर ऊंची व करीब 250 किलो वजनी यह प्रतिमा धार क्षेत्र के भग्नावशेषों के बीच से प्राप्त हुई थी। अब उस क्षण की प्रतीक्षा है, जब मां वाग्देवी की प्रतिमा को लंदन से लाकर दिव्य, भव्य और नव्य ‘सरस्वती लोक’ के गर्भगृह में स्थापित किया जाएगा!

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