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लेखिका तस्लीमा नसरीन पूरे बाइस साल बाद कोलकाता आ रही हैं

लेखिका तस्लीमा नसरीन पूरे बाइस साल बाद कोलकाता आ रही हैं

सत्ता बदलने से क्या बदलता है?

श्रीनारद मीडिया सेन्ट्रल डेस्क

खबर पढ़ी कि प्रसिद्ध बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन पूरे बाइस साल बाद कोलकाता आ रही हैं। मतलब बंगाल में उनपर लगा दो दशक पुराना बैन अब खत्म हो गया है।

सोचिए तो, तस्लीमा ने ऐसा क्या कर दिया था कि बंगाल की सरकारों ने राज्य में उनके प्रवेश पर हमेशा के लिए रोक लगा दी थी? जिस बंगाल में हजारों की हत्या करने वाले कुख्यात नक्सलियों तक के लिए संवेदना के पुष्प उछाले जाते रहे, वहां एक लेखिका के प्रवेश पर बैन लगा दिया गया? इतना भय?

तस्लीमा नसरीन ने अपने देश बंगलादेश में हिंदुओं पर होने वाले अत्याचार पर एक किताब क्या लिख दी, भारतीय बुद्धिजीवियों की सटक गई। हम उसको बोंगाल में नोहीं घुसने डेगा… जबकि उसी बंगाल में बैठ कर दर्जनों लेखकों ने भारत और भारत के सबसे बड़े समुदाय के विरुद्ध सैकड़ों किताबें लिखी हैं, पर कभी उनसे प्रश्न नहीं पूछा गया। लेकिन तस्लीमा को रोका गया। पहले वामियों ने रोका, फिर ममता ने… स्वयं को सभ्यता और समानता के ठेकेदार मानने वाले अभिव्यक्ति के स्वतंत्रता सेनानी उस एक अकेली महिला के डर से कांप उठे थे।

भारत में रह कर जिन लोगों ने सदैव नफरत की खेती की, चाइनीज भीख पर पल कर जीवन भर नक्सलवादी आतंक को बढ़ावा दिया, वे उस लेखिका को नफरती बताने लगे जिसने अपने देश में एक पूरे समुदाय पर हो रहे अत्याचार पर एक किताब भी लिख दी थी।

वामपंथी लोग नारीवाद की बातें करते हैं, तस्लीमा नारीवादी होने के बाद भी उन्हें पसंद नहीं। भारतीय वामपंथी भारत में सदैव अल्पसंख्यक हितों का रोना रोते हैं, तस्लीमा अपने देश के अल्पसंख्यक हिंदुओं की बातें करती हैं तब भी उन्हें पसंद नहीं। यहां आ कर भारतीय बुद्धिजीवी अरब देशों के गुलाम सिद्ध होते हैं। जिसने भी मालिक की कम्युनिटी के विरुद्ध बोला, उसका बायकॉट…
ममता स्त्री थीं, स्त्री होने के नाते भी वे तस्लीमा के साथ हो रहे भेदभाव को रोक सकती थीं। पर वोट का लोभ उन्हें भी था। न्याय वह भी नहीं कर सकीं…
खैर! बंगाल के लोगों ने अब बंगाल को बदला है। और इसी का असर है कि तस्लीमा बंगाल आ रही हैं। सच्चे मायनों में बंगाल अब जा कर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता स्थापित हुई है। यह केवल सत्ता बदलने से संभव हुआ है।

ऐसा नहीं है कि तस्लीमा का आना भारत के लिए बहुत जरूरी हो, या उनके आने से राष्ट्र की प्रतिष्ठा बढ़ जा रही हो। मुझे उनसे कोई आशा नहीं। लेकिन जिस कारण से उन्हें रोका गया था, वह एक लोकतांत्रिक देश के लिए लज्जाजनक था। सुखद है कि अब इस गलती को सुधार लिया गया है। वैसे आपने तस्लीमा नसरीन की पुस्तक लज्जा पढ़ी है? मुझे लगता है, हर भारतीय को वह पुस्तक जरूर पढ़नी चाहिए।

मशहूर लेखिका तसलीमा नसरीन लगभग दो दशक बाद कोलकाता वापसी कर रही हैं। आगामी 1 अगस्त को वे शहर में एक बड़े सार्वजनिक कार्यक्रम में हिस्सा लेंगी। गौरतलब है कि साल 2007 में उनकी किताब ‘द्विखंडितो’ को लेकर हुए हिंसक प्रदर्शनों के बाद उन्हें वह शहर छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा था, जिसे उन्होंने बांग्लादेश से निर्वासन के बाद अपना घर मान लिया था।

तीन संगठनों ने मिलकर किया आयोजन

कोलकाता के रवींद्र सदन में आयोजित होने वाले इस कार्यक्रम को तीन संगठनों- ‘सेक्युलर मिशन’, ‘पश्चिमबोंगेर जोन्नो’ और ‘ह्यूमन राइट्स बियॉन्ड फ्रंटियर्स’ ने मिलकर आयोजित किया है। ‘पश्चिमबोंगेर जोन्नो’ के मोहित रॉय के मुताबिक, इस कार्यक्रम में तसलीमा की कविताएं और गीत प्रस्तुत किए जाएंगे। आयोजकों ने बताया कि राज्य के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी और मशहूर बंगाली लेखक शीर्षेंदु मुखोपाध्याय के भी इस कार्यक्रम में शामिल होने की उम्मीद है।

पिछली सरकार में नहीं मिली थी अनुमति

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, सेक्युलर मिशन के उस्मान मलिक ने बताया, “कोलकाता भारत की सांस्कृतिक राजधानी है। कट्टरपंथियों के विरोध के कारण तसलीमा को यहां से भगा दिया गया था, जिसका हमें गहरा दुख है। हमने पिछली सरकार के कार्यकाल में भी उनके दौरे की योजना बनाई थी, लेकिन हम सफल नहीं हो सके।” मलिक ने आगे कहा, “इस बार हमने मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी से संपर्क किया, जिन्होंने सुरक्षा की पुख्ता व्यवस्था का पूरा भरोसा दिया। इसके बाद लेखिका ने भी कोलकाता आने पर सहमति जता दी। कार्यक्रम में तसलीमा अपने निर्वासन के दिनों और कोलकाता छोड़ने के हालातों पर खुलकर बात करेंगी।”

आखिर 2007 में क्यों छोड़ना पड़ा था कोलकाता?

तसलीमा नसरीन का लेखन हमेशा से महिला अधिकारों, लैंगिक समानता और पितृसत्तात्मक हिंसा पर केंद्रित रहा है। 1993 में आए उनके उपन्यास ‘लज्जा’ ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई, लेकिन जान से मारने की धमकियों के बाद 1994 में उन्हें बांग्लादेश छोड़ना पड़ा। स्वीडन की नागरिकता के साथ यूरोप में रहने के बाद उन्होंने अपनी संस्कृति के करीब होने के चलते कोलकाता में शरण ली। हालात तब बिगड़े जब 2003 में उनकी आत्मकथा का दूसरा भाग ‘द्विखंडितो’ प्रकाशित हुआ।

किताब पर बैन

इस किताब के कुछ हिस्सों को धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाला माना गया। 2003 में ही कवि सैयद हसमत जलाल के मानहानि मुकदमे के बाद, बुद्धदेब भट्टाचार्य के नेतृत्व वाली वाम मोर्चा सरकार ने सांप्रदायिक सौहार्द बिगड़ने के डर से इस पर बैन लगा दिया। हालांकि 2005 में हाई कोर्ट ने बैन हटा लिया था।

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