सदैव अविचल, अनुपम हमारे अटल
जन्म जयंती पर विशेष
श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

आज श्रद्धेय अटल जी होते, तो सौ वर्ष के हो चुके होते। शतायु, पूर्ण आयु। भारतीय परंपरा में ‘शतायु’ होना जीवन की सिद्धि मानी गई है। पर, शतायु कौन होता है? वही मनई, जिसकी जीवन-साधना की कथा समय स्वयं कहता हो। मनुष्य के चरणों में बैठकर। जिसके दिन कैलेंडर पर नहीं, पीढ़ियों की स्मृति में दर्ज हों। जिसने अपने युग को केवल देखा न हो, उसे दिशा भी दी हो।
अटल जी इस कसौटी पर खरे उतरते हैं। उनका जन्म भी ऐसे ही एक दिन पर हुआ, जो आगे चलकर राष्ट्रीय स्मृति में ‘अच्छे शासन’ की पहचान बन गया। देश ने उनके जन्मदिवस को ‘सुशासन दिवस’ कहकर मानो उनकी लोक-प्रतिबद्धता पर मुहर लगा दी। आज उनकी जन्मशती पर उन्हें याद करना किसी दिवंगत नेता का औपचारिक स्मरण भर नहीं है। अपने ही राष्ट्रीय चरित्र के आईने के सामने शांत बैठने जैसा है। यह सोचते हुए कि इस एक व्यक्ति ने हमारी राजनीति में कितनी संवेदनशीलता, कितनी मर्यादा और कितना विश्वास जोड़ दिया था।
अटल जी का शतायु होना केवल एक काल-गणना का अनुमान नहीं, एक सांस्कृतिक कल्पना भी है। जैसे भारतीय मन किसी प्रिय पुरुष के लिए कामना करता है कि ‘तुम सौ बरस जियो’, और यह आशीष उसकी देह से आगे बढ़कर उसके विचारों, उसकी भाषा, उसकी करुणा में जाकर सच हो जाती है। अटल जी के संदर्भ में यह कामना अब एक प्रश्न की तरह लौटती है। क्या हम उस सौ साल की परंपरा के योग्य शिष्य बन पाए हैं, जिसे उन्होंने अपने राजनीतिक विवेक, काव्य-संवेदना और मानवीय व्यवहार से हमारे हाथों में सौंप दिया?
जब किसी नाम के उच्चारण में ही उजास उतर आए, तो समझ लेना चाहिए कि वह केवल व्यक्ति नहीं, युग की साँस है। अटल जी का नाम राजनीति के पृष्ठ पर नहीं, भारतीय मन की पीर और प्रार्थना के बीच लिखा गया है। वे उस समय के शीतल बयार जस थे, जब राजनीति अपने ताप से जन-मन को जला रही थी। उन्होंने शब्दों में मनुष्य को बचाए रखा। सत्ता में मनुष्यता को।
वाजपेयी जी का व्यक्तित्व राजनीति की ऊँचाइयों पर खड़ा वह वृक्ष था, जिसकी जड़ें कविता की मिट्टी में थीं। उन्होंने सत्ता को कभी मुकाम नहीं, माध्यम माना। संवाद का, समरसता का, सहानुभूति का। संसद की गहमागहमी में उनकी वाणी चिंगारी नहीं सिक्त किरण थी। नतीजतन कठोर से कठोर विरोध भी मर्यादा में ढल जाता था।
उनकी सात दशकों की उनकी बेदाग़ राजनीतिक यात्रा, विवेक और करुणा का अद्भुत संगम रही। वे जानते थे कि नीति बिना मूल्य के बंजर होती है। संवाद बिना संवेदना खोखला। उनका हर भाषण किसी नीतिगत घोषणा से पहले एक आत्मीय स्पर्श था। यही तो भारतीय राजनीति की वह धरती थी, जिसे अटल जी ने फिर से उपजाऊ बनाया। विचारों में शालीनता, नेतृत्व में विनम्रता। विरोध में आदर का बीज बोकर।
कवि अटल राजनीति में उतरे तो वह राजनीति भी कविता की तरह सुगंधित हुई। उनकी दृष्टि में राष्ट्र किसी नक्शे की रेखा नहीं, एक जीवंत देह थी। राष्ट्र उनके लिए अनुच्छेदों में बँधा विधान नहीं, सम्बन्धों में बुना हुआ परिवार था। वे बोलते थे, तो भारत बोलता था। उसकी माटी, उसकी गंध, उसका दर्द। वही संवेदनशीलता उन्हें भीड़ में भी अकेला बनाती थी। शिखर पर भी विनम्र रखती थी।
संसद में उनकी मौजूदगी को जरा देखें। संवाद उनका स्वभाव था। वे विरोधी से बहस करते थे। पर दुश्मनी नहीं पालते थे। राजनीति को उन्होंने प्रतियोगिता नहीं, सभ्यता का संस्कार माना। मतभेद को उन्होंने सदैव ‘विचार की महक’ बना रखा, ‘विच्छेद की कटुता’ नहीं बनने दिया। इसी संयम में उनका व्यक्तित्व असाधारण होता गया।
प्रधानमंत्री के रूप में लिए गए उनके निर्णयों में कवित्व की गहनता थी। पोखरण का विस्फोट शक्ति का उद्घोष नहीं, आत्मविश्वास का संकेत था। लाहौर की यात्रा किसी कूटनीति की चाल नहीं, संवाद की पुकार थी। वे जानते थे। शक्ति तभी शुभ है जब उसमें संयम हो। यही तो कवि का अनुशासन है। जो ऊँचाई पर रहकर भी धरती से छूटता नहीं।
आज जब राजनीति शब्दों का शोर बन गई है, अटल जी की चुप्पी एक वाणी बनकर लौट आती है। वह मौन जिसमें अर्थ है, मर्यादा है, माधुर्य है। उनकी मुस्कान संवाद की वह शेष बची दीपशिखा है, जो अंधेरे में भी राह दिखाती है। आज जब उनकी जन्मशती पर हम उन्हें याद कर रहे हैं, तो यह सिर्फ़ श्रद्धा नहीं, आत्मपरीक्षण का क्षण है। क्या हम राजनीति में संवेदना बचा पा रहे हैं?

