समान नागरिक संहिता सहमति से लागू हो, विभाजन न हो-संघ प्रमुख मोहन भागवत

समान नागरिक संहिता सहमति से लागू हो, विभाजन न हो-संघ प्रमुख मोहन भागवत

श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर संघचालक मोहन भागवत ने कहा है कि समान नागरिक संहिता (यूसीसी) का विचार देश की एकता के लिए अच्छा है। लेकिन इसे सबकी सहमति से और सभी को विश्वास में लेकर ही बनाया जाना चाहिए। मोहन भागवत मुंबई में संघ के शताब्दी समारोह के उपलक्ष्य में आयोजित दो दिवसीय व्याख्यानमाला में बोल रहे थे।

रा.स्व.संघ द्वारा अपने शताब्दी वर्ष में देश के चार महानगरों में अपने सर संघचालक मोहन भागवत की दो दिवसीय व्याख्यानमाला का आयोजन किया था। कोलकाता, बेंगलूरू और दिल्ली के बाद अंतिम व्याख्यानमाला मुंबई में शनिवार और रविवार को आयोजित की गई। शनिवार को मुंबई में नेहरू सेंटर में हुए दो सत्रों में मोहन भागवत ने संघ का परिचय एवं संघ की कार्ययोजना पर विस्तार से प्रकाश डाला था।

आयोजित दो सत्रों में उन्होंने कार्यक्रम में आमंत्रित श्रोताओं के प्रश्नों का उत्तर दिया। इसी क्रम में मोहन भागवत से देश में समान नागरिक संहिता लागू करने के बारे में पूछा गया था। जिसका उत्तर देते हुए उन्होंने कहा कि यह एक अच्छा विचार है। लेकिन इसे सभी को विश्वास में लेकर करना चाहिए।

उन्होंने उत्तराखंड सरकार का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां की सरकार ने यूसीसी के मसौदे पर राज्य के लोगों की राय ली, और व्यापक जनसमर्थन जुटाकर इसे लागू किया। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि यूसीसी के क्रियान्वयन से समाज में विभाजन पैदा नहीं होना चाहिए। कानून का ढांचा ऐसा होना चाहिए, जो लोगों को जोड़ने का काम करे, ना कि बांटने का।

इसी क्रम में जब मोहन भागवत से पूछा गया कि क्या कभी कोई अनुसूचित जाति या जनजाति का व्यक्ति भी संघ का सर संघचालक बन पाएगा। इसका उत्तर देते हुए संघ प्रमुख ने संघ में जाति व्यवस्था की अवधारणा को पूरी तरह से नकारते हुए कहा कि संघ का सर संघचालक कोई ब्राह्मण नहीं बन सकता, कोई क्षत्रिय नहीं बन सकता, कोई अन्य जाति का भी नहीं बन सकता, हां जो कोई भी बनेगा वह हिंदू ही होगा।

उन्होंने कहा कि संघ में सभी वर्गों के लोग काम करते हैं। इसमें सर संघचालक बनने के लिए एससी-एसटी होना कोई अयोग्यता नहीं है, और ब्राह्मण होना कोई योग्यता नहीं है। संघ में सेवानिवृत्ति की आयु को भी स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि वैसे तो 75 वर्ष की आयु के बाद व्यक्ति को बिना कोई दायित्व लिए काम करना चाहिए।

75 वर्ष का होने के बाद मैंने भी निवृत्त होने का प्रस्ताव रखा था। लेकिन लोगों ने यह कहकर मुक्त नहीं किया कि अभी तो आप स्वस्थ हैं। घूम रहे हैं। फिर निवृत्त होने की जरूरत क्या है।

आरक्षण व्यवस्था पर भी संघ की स्थिति स्पष्ट करते हुए मोहन भागवत ने संघ की स्पष्ट भूमिका है कि जब तक जातीय भेदभाव की भावना जाती नहीं, तब तक आरक्षण व्यवस्था चालू रहनी चाहिए। उन्होंने कहा कि जातीय भेदभाव को कानून से ठीक नहीं किया जा सकता, इसे इच्छाशक्ति से ही ठीक किया जा सकता है। जातीय भेदभाव के लिए बने कानूनों के दुरुपयोग पर भी चिंता जताते हुए संघ प्रमुख ने कहा कि ऐसे कानूनों का दुरुपयोग भी होता है। यह भी रुकना चाहिए।

देश में आबादी के बढ़ते असंतुलन पर बोलते हुए मोहन भागवत ने एक बार फिर हर परिवार में तीन बच्चों के संतानों के सिद्धांत का समर्थन करते हुए कहा कि इसके अलावा देश में हो रही घुसपैठ एवं मतांतरण भी जनसंख्या असंतुलन का बड़ा कारण बन रहे हैं।

उन्होंने कहा कि एक तरफ जबरन होनेवाला मतांतरण बंद होना चाहिए, और जो लोग मतांतरित हो गए हैं, यदि वे चाहें तो उनकी घरवापसी भी करवाई जानी चाहिए। दूसरी ओर देश में बड़े पैमाने पर हो रही घुसपैठ भी रुकनी चाहिए। इसके लिए नागरिकों को भी सतर्क रहना चाहिए। जहां कोई संदिग्ध व्यक्ति दिखे, उसकी रिपोर्ट सक्षम अधिकारी को करनी चाहिए।

उन्होंने किसी विदेशी व्यक्ति को रोजगार देने से बचने की भी सलाह दी। पड़ोसी देश बंग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचार संबंधी एक प्रश्न का उत्तर देते हुए सर संघचालक ने कहा कि बंग्लादेश में अभी सवा करोड़ हिंदू हैं। वे यदि एकजुट होकर खड़े हो जाएं तो हम लोग और दुनिया भर में रह रहे हिंदू अपनी मर्यादा में रहकर जितनी उनकी मदद हो सकेगी, वह करेंगे।

2047 तक भारत को पुनः तोड़ने की साजिश किए जाने संबंधी एक प्रश्न पर मोहन भागवत ने कहा कि हमें 2047 का भय पालने के बजाय 2047 में अखंड भारत की कल्पना करनी चाहिए। ये मंसूबे पालनेवालों का सपना कभी पूरा नहीं होगा। अब भारत को तोड़नेवाले खुद टूट जाएंगे। संघ प्रमुख ने एक बार फिर दोहराया कि दुष्प्रचार या दूसरों के विचारों से संघ के प्रति कोई धारणा न बनाएं। संघ के बारे में जो भी धारणा बनाएं, अपने अनुभव के आधार पर बनाएं।

सावरकर को भारत रत्न

संघ प्रमुख ने स्वातंत्र्यवीर सावरकर को भारत रत्न देने के प्रश्न पर कहा कि सावरकर को भारत रत्न मिलता है, तो उस सम्मान का ही गौरव बढ़ेगा। वैसे वह बिना भारत रत्न सम्मान के ही लाखों हृदयों में बसे हुए हैं।

व्यापारिक समझौतों पर

मोहन भागवत ने भारत के दुनिया के कई देशों के साथ हो रहे व्यापारिक समझौतों पर बोलते हुए कहा कि आज की दुनिया में कोई देश अकेले नहीं चल सकता। व्यापारिक समझौते सभी को करने पड़ते हैं। पिछले 10 वर्षों में हमने देखा है कि वर्तमान प्रशासन देश का हित देखकर ही समझौते कर रहा है। हमें ऐसी डील करनी चाहिए, जिसमें अपना नुकसान न हो।

धुरंधर जैसी फिल्म पर

मोहन भागवत ने कहा कि ऐसी फिल्मों के बारे में संघ के स्वयंसेवक कानाफूसी करके एक-दूसरे को बताते हैं, जिसके कारण अधिक से अधिक लोग ऐसी फिल्में देखने के लिए प्रेरित होते हैं। कभी-कभी संघ की शाखाएं योजना बनाकर भी ऐसी फिल्में देखने जाती हैं।

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