मध्य प्रदेश के स्थापना के 70 साल पूरे हुए है

मध्य प्रदेश के स्थापना के 70 साल पूरे हुए है

श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

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मध्य प्रदेश के स्थापना के 70 साल पूरे हुए है। इन 70 सालों में मध्य प्रदेश ने न सिर्फ राजनीति की उठापटक देखी है, बल्कि लगभग हर मोर्चे पर खुद को साबित भी करके दिखाया है। देश के सबसे साफ शहरों की लिस्ट में पिछले 8 साल से मध्य प्रदेश के ही एक शहर इंदौर का दबदबा है।

भोपाल गैस त्रासदी जैसी कुछ घटनाओं ने भले ही मध्य प्रदेश की छवि पर एक दाग छोड़ा हो, लेकिन बदलते वक्त के साथ एक बार फिर मध्य प्रदेश ने खुद को साबित किया। एक वक्त था, जब मध्य प्रदेश की राजधानी को चुनने के लिए भी खूब विवाद हुआ था। जब भोपाल को राजधानी बनाया गया, तो जबलपुर ने विरोध में दीवाली ही नहीं मनाई थी।

15 अगस्त 1947 को जब देश को आजादी मिली, तब राज्यों के पुनर्गठन को लेकर खींचतान शुरू हो गई। एक वर्ग चाहता था कि देश में राज्यों का निर्माण भाषाई आधार पर हो। वहीं दूसरा वर्ग इससे बिल्कुल उलट राय रखता था और उनका मानना था कि इससे भेदभाव बढ़ेगा। लेकिन 6 साल बाद भाषायी आधार पर प्रांतों के पुनर्गठन के लिए राज्य पुनर्गठन आयोग अस्तित्व में आया।

जहां आज का मध्य प्रदेश है, वह तब मध्य प्रांत, मध्यभारत, विंध्यप्रदेश और भोपाल राज्य में बंटा हुआ था। मध्य प्रांत की राजधानी नागपुर थी। मध्य भारत की दो राजधानियां धीं, शीतकालीन राजधानी ग्वालियर और ग्रीष्मकालीन राजधानी इंदौर। इसके अलावा विंध्य प्रदेश की राजधानी रीवा थी और भोपाल राज्य की राजधानी भोपाल हुआ करती थी।

मध्य प्रदेश का नक्शा देखकर चौंके नेहरू

जैसा कि हमने आपको बताया, मध्य प्रांत, मध्यभारत, विंध्यप्रदेश और भोपाल राज्य को मिलाकर वर्तमान के मध्य प्रदेश राज्य का गठन हुआ। 10 अक्टूबर 1955 को जब राज्य पुनर्गठन आयोग ने प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के सामने अपनी रिपोर्ट पेश की, तो उसमें मध्य प्रदेश के गठन का प्रस्ताव भी था।

लेकिन मध्य प्रदेश के नक्शे को देखकर नेहरू चौंक उठे। उन्होंने तपाक से कहा, ‘अरे! यह क्या अजूबा है। ऐसा लंबा-चौड़ा और बेढंगा प्रदेश कैसे बन सकता है?’ तब कई बड़े नेता मध्य प्रदेश बनने के पक्ष में नहीं थे। नेहरू के रिएक्शन ने उन्हें उम्मीद जग गई। लेकिन आखिरकार 1 नवंबर 1956 को नए मध्य प्रदेश का गठन हुआ।

नमस्कार करने की परंपरा की शुरुआत

17 दिसंबर 1956 को मध्य प्रदेश की विधानसभा का पहला सत्र शुरू हुआ। इस विधानसभा में कुल 328 सदस्य थे, जिसमें 12 महिलाएं भी थीं। इसमें मध्यप्रांत के 150, मध्यभारत के 88, विंध्यप्रदेश के 60 और भोपाल के 30 सदस्य थे। जब सदस्यों को नई विधानसभा में शपथ दिलाई जा रही थी, तो कई लोगों ने इसका विरोध भी किया था। उनका तर्क था कि जब सदस्य अपने मूल राज्य में पहले ही शपथ ले चुके हैं, तो दोबारा शपथ दिलाने का क्या औचित्य है?

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(1 नव‍ंबर,1956 को मध्य प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री के तौर पर पं.रविशंकर शुक्ल का पहला भाषण लाल परेड ग्राउंड पर हुआ था।)

उस वक्त परंपरा थी कि शपथ लेने के बाद सदस्य सभापति से हाथ मिलाते थे। लेकिन विधायक हीरालाल शर्मा ने इस पर आपत्ति जताई। उनका कहना था कि हाथ मिलाना अंग्रेजी सभ्यता का प्रतीक है और इसमें समय व्यर्थ होता है। माना जाता है कि इसके बाद से ही सदस्यों द्वारा शपथ लेने के बाद सभापति को नमस्कार करने की परंपरा की शुरुआत हुई।

राजधानी पर खूब हुई खींचतान

कई अलग-अलग क्षेत्रों से मिलाकर मध्य प्रदेश का गठन तो हो गया था, लेकिन अब समस्या थी कि राजधानी किसे बनाया जाए। दावेदार कई थे, लेकिन चुनना तो किसी एक को ही था। ग्वालियर और इंदौर ने सबसे पहले अपना दावा ठोका था। रायपुर भी प्रतिष्ठित शहर था। जबलपुर ने भी खुद को आगे रखा। राज्य पुनर्गठन आयोग ने जबलपुर को ही राजधानी बनाने का प्रस्ताव रखा था। ऐसे में जबलपुर का मामला लगभग तय माना जा रहा था।

लेकिन तभी खेल पलट गया। उस समय के कुछ अखबारों ने खबर छाप ती कि सेठ गोविंद दास के परिवार ने जबलपुर-नागपुर रोड पर कई एकड़ जमीन खरीद ली है, जिससे जबलपुर के राजधानी बनने के बाद उन्हें अच्छा मुआवजा मिले। ऐसे में जबलपुर को रेस से बाहर कर दिया गया और अचानक भोपाल का नाम सामने आ गया। भोपाल तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को कुछ खास पसंद भी था।

नेहरू को बेहद पसंद था भोपाल

कहते हैं कि जब मध्य प्रदेश बनने से पहले ही भोपाल राज्य के मुख्यमंत्री शंकरदयाल शर्मा ने नेहरू को अपने पाले में कर लिया था। नेहरू भोपाल के ऐसे दीवाने हो गए थे कि साल में 2 बार भोपाल जाते थे। केवल 1956 तक नेहरू बतौर प्रधानमंत्री 18 बार भोपाल आ चुके थे। भोपाल में ट्रैक्टर टेस्टिंग संस्थान, पॉलिटेक्निक और इंजीनियरिंग कॉलेज इसी ‘मोहब्बत’ की देन हैं।

जबलपुर को अस्वीकार करने और भोपाल को राजधानी बनाने की कई जानकार अलग-अलग वजहें बताते हैं। कुछ का मानना है कि विंध्य समाजवादी आंदोलन का गढ़ था। ऐसे में अगर जबलपुर राजधानी बन जाता, तो विंध्य राजनीति का केंद्र बन जाता। एक तर्क ये भी दिया गया कि जबलपुर में सरकारी इमारतें बनाने की जगह नहीं थी। इसके उलट भोपाल नवाबों और महलों वाला शहर था। कहा गया कि भोपाल में बहुत जगह खाली है, जहां सरकारी इमारतें बन सकती हैं। बाद में भोपाल के महलों को ही सरकारी दफ्तरों के तौर पर इसतेमाल किया गया।

भोपाल को राजधानी बनाने की एक और वजह सरदार पटेल से जुड़ी है। कहते हैं कि भोपाल के तत्कालीन नवाब हमीदुल्लाह खां हैदराबाद के नवाब के साथ मिलकर भारत विरोधी गतिविधियों में लिप्त हो गए थे। पटेल नहीं चाहते थे कि देश के मध्य भाग ऐसी गतिविधियों का केंद्र बने। ऐसे में भोपाल पर नजर रखने के लिए उसे राजधानी बना दिया गया।

खैर, जब भोपाल राजधानी बना, तो जबलपुर से एक प्रतिनिधिमंडल अपनी बात मनवाने के लिए दिल्ली में जवाहरलाल नेहरू, मौलाना आजाद, लालबहादुर शास्त्री और गोविंदवल्लभ पंत से मिला। लेकिन इसे मायूस होकर ही लौटना पड़ा। इसके विरोध में उस साल पूरे जबलपुर ने दीवाली नहीं मनाई।

राजधानी बनने के 16 साल बाद जिला बना भोपाल

भोपाल जब राजधानी बना, तब वहां की आबादी महज 50 हजार थी। इसमें भी ज्यादातर अल्पसंख्यक थे। भोपाल वैसे तो राजधानी था, लेकिन तब यह सीहोर जिले का हिस्सा था। राजधानी बनने के 16 साल बाद 1972 में जाकर भोपाल को अलग जिला बनाया गया। सीएम आवास के लिए आईजी एसएन आगा के बंगले को चुना गया, जो आज वीआईपी गेस्ट हाउस है।

मध्य प्रदेश के गठन से पहले भोपाल राज्य के मुख्यमंत्री शंकरदयाल शर्मा थे। मध्य प्रदेश के गठन के बाद उन्हें राज्य का शिक्षा मंत्री बना दिया गया। शर्मा धर्मनिरपेक्षता के कट्टर पक्षधर थे। उन्होंने अपने विचार को मध्य प्रदेश की शिक्षा में भी उतारा। किताबों में ग से गणेश पढ़ाया जाता था, लेकिन शर्मा ने इसे बदलवाकर ग से गधा करवा दिया था।

 

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