विश्व पुस्तक मेले की चहल-पहल में ‘मसरखिया मेल’ अब शामिल होने जा रही है
श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

मुँह दिखाई तो हो ही जाए। ‘मसरखिया मेल’ अब विश्व पुस्तक मेले की चहल-पहल में शामिल होने आ रही है। टिकट कंफर्म है। प्रकाशक की मुहर लग चुकी है। इसकी मंज़िल अब आप पाठकों की हथेलियाँ हैं।
यह किताब किसी दूर देश की फैंटेसी नहीं, कस्बाई जीवन की वही माटी है जो बरसों से जूतों, चप्पलों और नंगे पाँवों से परिचित रही है। टूटे-फूटे चबूतरे, बुढ़वा पीपर की छाँह, स्टेशन की चाय और गुमटी पर ठिठकती शामें। सबने मिलकर इन पृष्ठों को अपना-अपना हिस्सा दिया है।
यह स्मृति आख्यान उतना ही है जितना आत्मकथा, फर्क बस इतना कि यहाँ ‘मैं’ अलग से बाहर खड़ा नहीं, गलियों के शोर में घुला हुआ चलता है। बचपन के बीते लम्हें, दूर जाती किसी पैसेंजर की आख़िरी झाँव, स्टेशन मास्टर की रौबदार सीटी और अपनों की पुकार, भीड़ भरा बाज़ार, मेला-ठेला, सब मिलकर ‘मसरखिया मेल’ के डिब्बे बन गए हैं।
आज 2025 के चंद घंटे ही शेष हैं। साल के कैलेंडर पर तारीख़ें बदलीं। सेमिनार, यात्राएँ, नयी नौकरी, पुरस्कार और अनगिन उपलब्धियाँ दर्ज होती रहीं। पर जाते-जाते इस साल ने हाथ में जो सबसे चमकदार कंचा छोड़ दिया, वह ‘मसरखिया मेल’ ही है।
लगता है जैसे अब तक लिखी गई हर रेखा कहीं न कहीं आकर इसी कस्बे की पटरियों पर आ रुकी हो और यहीं से फिर नई दिशा पकड़ने को तैयार हो।
कस्बे के इस साधारण से जीवन को भी अगर इतनी गरिमा मिली है, तो वह उसी परंपरा की देन है, जो लोक-जीवन की साधारण बूंदों में भी अर्थ की समुद्री गहराई देखती है। वही शांत, आत्मीय और गुनगुनी लय, जो अपने ही अनुभवों के चबूतरों पर बैठकर धीमे स्वर में बात कर रही है।
इस सबके बीच मन किसी विजेता की तरह नहीं, एक साधारण सहयात्री की तरह चुपचाप खड़ा है, कृतज्ञ का भाव; कि शब्दों ने साथ नहीं छोड़ा; प्रीत से भरा, कि कस्बा अब केवल स्मृति नहीं, पुस्तक के रूप में भी साँस ले रहा है। लगता है जैसे ‘मसरखिया मेल’ के साथ-साथ खुद जीवन भी एक और फेरा लगा आया हो। उसी पुराने स्टेशन, उसी परिचित भीड़ और उसी अनकहे अपनापे के बीच। उम्मीद है, आप सभी भी ‘मसरखिया मेल’ के सहयात्री बनेंगे।
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