परंपरागत पत्रकारिता के समक्ष कई चुनौतियां : प्रो. सिंह

परंपरागत पत्रकारिता के समक्ष कई चुनौतियां : प्रो. सिंह

सूचना और संचार प्रौद्योगिकी के तीव्र विकास से समाज का हर क्षेत्र प्रभावित

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ख्यातिलब्ध पत्रकार स्व. राम गोविन्द प्रसाद गुप्ता जी की 30वीं पुण्यतिथि पर संगोष्ठी आयोजित

श्रीनारद मीडिया,  दरभंगा (बिहार):

बिहार के जाने-माने वरिष्ठ पत्रकार प्रो० हरिनारायण सिंह ने लोकतंत्र में डिजिटल मीडिया के सकारात्मक एवं नकारात्मक पहलुओं की चर्चा करते हुए सोमवार को कहा कि जहाँ डिजिटल मीडिया ने एक ओर सूचना के प्रसार को लोकतांत्रिक बनाया है, वहीं दूसरी ओर इसने परम्परागत पत्रकारिता की विश्वसनीयता, प्रासंगिकता और आर्थिक स्थिरता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाए हैं।

प्रो. सिंह ने आज यहां वरिष्ठ पत्रकार स्व० रामगोविन्द प्रसाद जी की 30वीं पुण्यतिथि पर दोनार स्थित सागर रेस्टोरेंट के सभागार में “डिजिटल युग मे परम्परागत पत्रकारिता की विश्वसनीयता” विषयक सेमिनार को संबोधित करते हुए कहा कि आधुनिक युग में सूचना और संचार प्रौद्योगिकी के तीव्र विकास ने समाज के हर क्षेत्र को प्रभावित किया है, और पत्रकारिता भी इससे अछूती नहीं रही। परम्परागत पत्रकारिता, जो कभी समाचार पत्रों, रेडियो और टेलीविजन के माध्यम से जनता तक सूचनाएँ पहुँचाने का प्रमुख साधन थी, अब डिजिटल युग की पत्रकारिता के उदय के साथ नई चुनौतियों का सामना कर रही है। डिजिटल मीडिया ने जहाँ एक ओर सूचना के प्रसार को लोकतांत्रिक बनाया है, वहीं दूसरी ओर इसने परम्परागत पत्रकारिता की विश्वसनीयता, प्रासंगिकता और आर्थिक स्थिरता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाए हैं।

उन्होने कहा कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स जैसे फेसबुक, ट्विटर ( X), इंस्टाग्राम और यूट्यूब ने सूचना के उत्पादन, वितरण और उपभोग के तरीके को पूरी तरह बदल दिया है। पहले जहाँ समाचार संगठनों के पास सूचना के प्रसार का एकाधिकार था, वहीं अब कोई भी व्यक्ति अपने स्मार्टफोन के माध्यम से समाचार बना सकता है और उसे विश्व भर में फैला सकता है। यह लोकतंत्रीकरण जहाँ सकारात्मक है, वहीं इसके कई नकारात्मक प्रभाव भी हैं।

 

परम्परागत पत्रकारिता में समाचारों की विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के लिए सख्त सम्पादकीय प्रक्रियाएँ और तथ्य-जाँच के मानक होते थे। समाचार संगठनों में प्रशिक्षित पत्रकार और सम्पादक यह सुनिश्चित करते थे कि जनता तक केवल सत्यापित और सटीक जानकारी ही पहुँचे। इसके विपरीत, सोशल मीडिया पर सूचनाएँ बिना किसी सम्पादकीय निगरानी के प्रसारित होती हैं। यहाँ झूठी खबरें (फेक न्यूज़), अफवाहें और गलत सूचनाएँ तेजी से फैलती हैं।

मुख्य अतिथि राजकीय शेखपुरा अभियंत्रण महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ० सन्दीप तिवारी ने सेमिनार को संबोधित करते हुए कहा कि सोशल मीडिया ने समाचार चक्र को अत्यधिक तीव्र कर दिया है। पहले समाचार पत्र अगले दिन छपते थे, और टेलीविजन समाचार भी कुछ घंटों के अंतराल पर प्रसारित होते थे। लेकिन अब सोशल मीडिया पर समाचार सेकंडों में विश्व भर में फैल जाता है। इस तीव्रता ने परम्परागत पत्रकारिता पर दबाव डाला है कि वे भी तुरंत समाचार प्रदान करें। इस जल्दबाजी में तथ्यों की जाँच और गहन विश्लेषण की प्रक्रिया अक्सर प्रभावित होती है, जिससे पत्रकारिता की गुणवत्ता पर असर पड़ता है।

किसी बड़ी घटना के तुरंत बाद सोशल मीडिया पर उससे संबंधित अपुष्ट जानकारी और वीडियो वायरल हो जाते हैं, जबकि परम्परागत समाचार संगठन उस जानकारी को सत्यापित करने में समय लेते हैं। इस बीच, जनता पहले से ही सोशल मीडिया की जानकारी पर प्रतिक्रिया दे चुकी होती है, जिससे परम्परागत पत्रकारिता की प्रासंगिकता कम होती प्रतीत होती है।
डिजिटल युग की पत्रकारिता ने परम्परागत पत्रकारिता के आर्थिक मॉडल को भी हिला दिया है। पहले समाचार संगठन विज्ञापनों और ग्राहकों की सदस्यता के माध्यम से अपनी आय अर्जित करते थे। लेकिन अब अधिकांश विज्ञापन राजस्व डिजिटल प्लेटफॉर्म्स जैसे गूगल और फेसबुक की ओर चला गया है।

विषय प्रवेश करते हुए वरिष्ठ पत्रकार रविभूषण चतुर्वेदी ने कहा कि परम्परागत पत्रकारिता में बदलाव होना ही था, पर ये बदलाव सकारत्मक है या नकारात्मक है ये नई पीढ़ी को समझना होगा। उन्होंने कहा कि डिजिटल पत्रकारिता ने पाठकों के समाचार उपभोग के तरीके को भी बदला है। आज के पाठक छोटी, आकर्षक और दृश्यात्मक सामग्री को प्राथमिकता देते हैं। लंबे, गहन विश्लेषणात्मक लेखों की माँग कम हो रही है। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो, मीम्स और संक्षिप्त पोस्ट्स ने पाठकों का ध्यान खींच लिया है।

इसके विपरीत, परम्परागत पत्रकारिता में गहन शोध और विस्तृत लेखन पर जोर दिया जाता है। यह बदलता व्यवहार परम्परागत पत्रकारिता के लिए एक चुनौती है, क्योंकि समाचार संगठनों को अब पाठकों को आकर्षित करने के लिए सोशल मीडिया या डिजिटल युग की पत्रकारिता की शैली को अपनाना पड़ रहा है। उन्होंने पत्रकारिता के मुख्य छह बिदुयों को विस्तार से समझाते हुए कहा कि डिजिटल युग में पत्रकारों पर कई तरह के दबाव बढ़े हैं। एक ओर, उन्हें तीव्र गति से समाचार प्रदान करने की अपेक्षा की जाती है, और दूसरी ओर, उनकी सामग्री को सोशल मीडिया पर वायरल होने योग्य बनाना पड़ता है। इन चुनौतियों के बावजूद, परम्परागत पत्रकारिता के लिए कई रास्ते उपलब्ध हैं, जिनके माध्यम से यह अपनी प्रासंगिकता और प्रभाव को बनाए रख सकती है।

संगोष्ठी को संबोधित करते हुए वरिष्ठ पत्रकार गंगेश मिश्र ने कहा कि पत्रकारिता कभी वृद्ध नहीं होती वो बदलती रहती है। सूचना, उपयोगिता और रोचकता ये तीन पहले भी थे और आज के डिजिटल युग मे भी उसी तरह से विद्यमान है। परम्परागत पत्रकारिता में खबरों को उल्टा पिरामिड की तरह परोसते थे।आज के डिजिटल युग मे सीधा पिरामिड की तरह परोसते है ये अंतर आया है, जो बाजार वाद के चलते हुआ है।
सोशल मीडिया पर गलत सूचनाओं के प्रसार को रोकने के लिए परम्परागत पत्रकारिता को अपनी विश्वसनीयता को और मजबूत करना होगा। तथ्य-जाँच इकाइयों की स्थापना और पारदर्शी सम्पादकीय प्रक्रियाएँ इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं।

सोशल मीडिया की सतही और त्वरित सामग्री के विपरीत, परम्परागत पत्रकारिता को गहन और विश्लेषणात्मक सामग्री पर ध्यान देना चाहिए। लंबे लेख, खोजी पत्रकारिता और डेटा-आधारित कहानियाँ पाठकों को आकर्षित कर सकती हैं, जो डिजिटल मीडिया के युग मे उपलब्ध नहीं होतीं।

डिजिटल मीडिया का उदय परम्परागत पत्रकारिता के लिए एक दोधारी तलवार साबित हुआ है। जहाँ इसने सूचना के प्रसार को लोकतांत्रिक बनाया है, वहीं इसने विश्वसनीयता, आर्थिक स्थिरता और पत्रकारों की स्वतंत्रता पर गंभीर चुनौतियाँ खड़ी की हैं। फिर भी, परम्परागत पत्रकारिता के पास अभी भी वह गहराई, विश्वसनीयता और नैतिकता है, जो डिजिटल मीडिया को चुनौती दे सकती है। डिजिटल परिवर्तन को अपनाकर, तथ्य-जाँच को मजबूत करके और नए राजस्व मॉडल्स की खोज करके परम्परागत पत्रकारिता न केवल इन चुनौतियों का सामना कर सकती है, बल्कि सूचना के इस नए युग में अपनी प्रासंगिकता को और सशक्त बना सकती है।

डिजिटल मीडिया के युग में पत्रकारिता और परम्परागत पत्रकारिता के बीच एक संतुलित सह-अस्तित्व संभव है, बशर्ते दोनों एक-दूसरे के पूरक बनें और जनता तक सटीक, विश्वसनीय और उपयोगी सूचनाएँ पहुँचाने के साझा लक्ष्य की ओर काम करें।सेमिनार की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ पत्रकार डॉ कृष्ण कुमार ने कहा कि लोकतंत्रीकरण जहाँ सकारात्मक है, वहीं इसके कई नकारात्मक प्रभाव भी हैं।

परम्परागत पत्रकारिता में समाचारों की विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के लिए सख्त सम्पादकीय प्रक्रियाएँ और तथ्य-जाँच के मानक होते थे। समाचार संगठनों में प्रशिक्षित पत्रकार और सम्पादक यह सुनिश्चित करते थे कि जनता तक केवल सत्यापित और सटीक जानकारी ही पहुँचे। इसके विपरीत, सोशल मीडिया पर सूचनाएँ बिना किसी सम्पादकीय निगरानी के प्रसारित होती हैं। यहाँ झूठी खबरें (फेक न्यूज़), अफवाहें और गलत सूचनाएँ तेजी से फैलती हैं।

स्वर्गीय रामगोविन्द प्रसाद गुप्ता के तैल चित्र पर अतिथियों ने पुष्प अर्पित कर उन्हें श्रद्धांजलि दी।
सेमिनार का सफल संचालन एवं अतिथियों का स्वागत अपने सधे हुए शव्दों में डॉ ए० डी० एन० सिंह ने किया। अतिथियों का स्वागत वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप कुमार गुप्ता ने किया वहीं, धन्यवाद ज्ञापन पत्रकार प्रमोद गुप्ता ने किया।

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