ईंटों के पीछे का आदमी
मजदूर दिवस पर विशेष
श्रीनारद मीडिया स्टेट डेस्क

मजदूर दिवस केवल एक तारीख नहीं है, यह कैलेंडर के भीतर छिपा हुआ एक ऐसा प्रश्न है जो हर साल अपने आप दोहराया जाता है—कि जिन हाथों ने दुनिया को खड़ा किया, उनके अपने जीवन की नींव कितनी मजबूत है। यह प्रश्न किसी भाषण में तालियों के बीच थोड़ी देर के लिए चमकता है और फिर अक्सर व्यवस्था की फाइलों में दबकर शांत हो जाता है। पर धरती शांत नहीं होती, वह जानती है कि उसके ऊपर जो शहर खड़े हैं, वे किसी अदृश्य श्रम की रीढ़ पर टिके हैं।
मजदूर दिवस सिर्फ उत्सव नहीं है, यह स्मृति है—एक ऐसी स्मृति जिसे मनुष्य भूलने की कोशिश करता है और हर बार उसे फिर से याद दिलाया जाता है। यह दिन उन लोगों का है जिनके नाम इमारतों की दीवारों पर नहीं लिखे जाते लेकिन जिनके बिना दीवारें खुद नहीं खड़ी हो सकतीं। यह उन हथेलियों का दिन है जिनमें अक्सर घाव अधिक और आराम कम होता है।
सुबह जब शहर अपनी सामान्य गति में जागता है, तब मजदूर बहुत पहले से जाग चुके होते हैं। उनके लिए सुबह कोई रोमांटिक दृश्य नहीं होती, वह एक जिम्मेदारी होती है। चाय की भाप में दिन का अनुमान नहीं लगाया जाता, दिन पहले ही शरीर में प्रवेश कर चुका होता है—थकान के रूप में, तैयारी के रूप में और कभी-कभी मजबूरी के रूप में भी।
मजदूर शब्द अपने भीतर एक पूरा संसार रखता है। उसमें केवल ईंट, सीमेंट, लोहे और मिट्टी का अर्थ नहीं है। उसमें धूप है, बारिश है, ठंडी हवा है और सबसे अधिक वह धैर्य है जो किसी किताब में नहीं लिखा जाता। यह धैर्य किसी साधना से कम नहीं, बल्कि कई बार उससे अधिक कठिन है क्योंकि इसमें कोई आध्यात्मिक पुरस्कार घोषित नहीं होता, केवल जीवित रहने की शर्त होती है।
शहर की ऊँची इमारतें जब सूरज को छूती हैं, तब नीचे कहीं जमीन पर एक आदमी झुका हुआ होता है। वह झुकना केवल शरीर का नहीं होता, वह समय का भी होता है। समय उसके सामने सीधा नहीं चलता, वह अक्सर भारी होकर गुजरता है और फिर भी वह आदमी उसे उठाए रहता है, जैसे यह उसका ही काम हो—दुनिया के वजन को अस्थायी रूप से अपने कंधों पर रखना।
कभी-कभी यह भी लगता है कि सभ्यता का पूरा अर्थ ही इस संतुलन पर टिका है—कुछ लोग ऊपर दिखाई देते हैं और कुछ लोग नीचे रहकर उन्हें संभालते हैं। यह कोई सरल विभाजन नहीं है, यह एक लंबा ऐतिहासिक निर्माण है, जिसमें श्रम को अक्सर अदृश्य बना दिया गया है ताकि सुविधा दिखाई देती रहे।
मजदूर दिवस इसी अदृश्यता को थोड़ी देर के लिए दृश्य बनाता है लेकिन दृश्यता भी सीमित होती है। भाषणों, पोस्टरों और औपचारिक आयोजनों के बीच श्रम का वास्तविक अनुभव अक्सर कहीं पीछे छूट जाता है क्योंकि अनुभव को केवल देखना पर्याप्त नहीं होता, उसे महसूस करना पड़ता है और महसूस करना आधुनिक गति में सबसे कठिन कार्यों में से एक है।
एक मजदूर की हथेली केवल पकड़ने का माध्यम नहीं होती, वह इतिहास का एक जीवित दस्तावेज होती है। उसमें पसीना भी है, मिट्टी भी है और समय की रगड़ भी है। यह रगड़ धीरे-धीरे त्वचा को बदल देती है लेकिन उसके भीतर की संवेदना को समाप्त नहीं करती। शायद यही सबसे आश्चर्यजनक बात है—इतनी कठोर परिस्थितियों में भी मनुष्य पूरी तरह मशीन नहीं बनता।
शहर की संरचना में मजदूर वह मौन आधार हैं जिन पर शोर खड़ा होता है। बाजारों की चमक, सड़कों की चौड़ाई, पुलों की लंबाई—इन सबके पीछे अनगिनत ऐसे हाथ हैं जिनकी कोई सूची नहीं बनती। सूची बनाने की संस्कृति हमेशा ऊपर से शुरू होती है, नीचे की परतें अक्सर केवल उपयोग के रूप में दर्ज होती हैं।
फिर भी मजदूर केवल पीड़ा का नाम नहीं है। उसमें एक तरह की जीवटता है जो किसी भी विपरीत परिस्थिति में रास्ता खोज लेती है। यह जीवटता किसी प्रेरक वाक्य से नहीं आती, यह रोजमर्रा की अनिवार्यता से जन्म लेती है। जब विकल्प सीमित हों, तब मनुष्य अपने भीतर विकल्प पैदा करना सीखता है।
कभी निर्माण स्थल पर खड़े होकर देखें तो समझ में आता है कि ईंटें केवल दीवार नहीं बनातीं, वे किसी जीवन की अनकही परतें भी बनाती हैं। हर ईंट के पीछे एक श्रम की कहानी होती है जो दर्ज नहीं होती और शायद दर्ज न होना ही उसकी सबसे बड़ी विशेषता है—वह बिना किसी पहचान के दुनिया को पहचान देती है।
मजदूर दिवस पर जो सम्मान दिखता है, वह कभी-कभी वास्तविकता से थोड़ा दूर लगता है। जैसे किसी बहुत पुराने घाव पर थोड़ी देर के लिए रंगीन पट्टी लगा दी जाए और मान लिया जाए कि दर्द समाप्त हो गया। पर घाव अपनी जगह बना रहता है, बस उसे देखने का तरीका बदल जाता है।
श्रम केवल आर्थिक क्रिया नहीं है, वह मानव अस्तित्व का मूल स्वर है लेकिन आधुनिक व्यवस्था में इसे अक्सर उत्पादन के आँकड़ों में बदल दिया जाता है। आँकड़े सुरक्षित रहते हैं, मनुष्य की थकान नहीं। यह असंतुलन धीरे-धीरे समाज की संवेदना को बदल देता है।
फिर भी, हर दिन कहीं न कहीं कोई दीवार उठ रही होती है, कोई सड़क बन रही होती है, कोई पुल आकार ले रहा होता है और इन सबके बीच कोई न कोई ऐसा भी होता है जो बिना किसी पहचान के यह काम कर रहा होता है। उसकी उपस्थिति शहर के नक्शे में नहीं होती लेकिन शहर उसके बिना अधूरा होता है।
मजदूरों की दुनिया में समय का अर्थ अलग होता है। वहाँ घड़ी केवल संकेत देती है, नियंत्रित नहीं करती। शरीर ही सबसे बड़ी घड़ी होता है जो थकान और ऊर्जा के बीच अंतर बताता है और यह घड़ी किसी औपचारिक कैलेंडर को नहीं मानती, वह केवल आवश्यकता को मानती है।
कभी-कभी लगता है कि यदि श्रम को पूरी तरह से गायब कर दिया जाए तो सभ्यता भी अपनी चमक खो देगी।
चमक हमेशा किसी न किसी अंधेरे पर आधारित होती है और यह अंधेरा केवल अनुपस्थिति नहीं है, यह वह जगह है जहाँ सबसे अधिक जीवन घटित होता है। मजदूर दिवस हमें यह याद दिलाने आता है कि सुविधा कोई स्वाभाविक स्थिति नहीं है, वह एक लंबे और सतत श्रम का परिणाम है लेकिन स्मृति अक्सर चयनात्मक होती है। हम परिणाम को तो याद रखते हैं, प्रक्रिया को नहीं।
श्रम की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि वह जितना अधिक दिखाई देता है, उतना ही कम समझा जाता है और जितना अधिक अदृश्य होता है, उतना ही अधिक आवश्यक होता है। यह विरोधाभास ही आधुनिक दुनिया का मौन आधार है।
फिर भी, किसी निर्माण स्थल की धूल में खड़ा एक आदमी जब मुस्कुराता है तो उसमें एक अलग तरह की रोशनी होती है। वह रोशनी किसी उत्सव की नहीं बल्कि जीवित रहने की होती है। और शायद यही सबसे सच्चा उत्सव है—हर दिन को पार कर जाना।
मजदूर दिवस अंततः किसी एक वर्ग का उत्सव नहीं है, यह मनुष्य की उस क्षमता का स्मरण है जो कठिन परिस्थितियों में भी दुनिया को बनाती रहती है। बिना अधिक शब्दों के, बिना अधिक मान्यता के और अक्सर बिना किसी प्रतीक्षा के।
और इसी बिना प्रतीक्षा के भीतर एक पूरा इतिहास चलता रहता है जो हर साल एक दिन के लिए थोड़ा दृश्य हो जाता है और फिर फिर से अपनी मौन गति में लौट जाता है।
आभार~ परिचय दास
