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राहुल सांकृत्यायन का किसान आंदोलन

राहुल सांकृत्यायन का किसान आंदोलन

जन्मदिन पर विशेष

श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

स्वतन्त्रता संग्राम के समय दो विचारधाराएं सक्रिय थीं। एक पहली विचारधारा के अनुसार अँग्रेजों को भारत से भगाना एक मात्र लक्ष्य था । दूसरे किसी भी समस्या को उठाना कतई स्वीकार नहीं था। दूसरी विचारधारा के लोग न सिर्फ अँग्रेजों को भगाने के हिमायती थे वरन् शोषण और भेदभाव पर आधारित व्यवस्था को भी खत्म करना चाहते थे।

वे नहीं चाहते थे कि अंग्रेजों के जाने के बाद भी भारत की बहुसंख्यक जनता शोषण और दमन की चक्की में पीसती रहे। इस विचारधारा के लोगों ने जमींदारी प्रथा, छुआछूत आदि के खिलाफ अभियान चलाया। इस विचारधारा को स्पष्ट करते हुए भगत सिंह ने कहा था “किसानों को केवल विदेशी शासन ही नहीं बल्कि जमींदारों और पूँजीपतियों के जुए से भी स्वयं को मुक्त कराना होगा…

इससे कोई बहस नहीं है कि ये शोषक शुद्ध रूप से ब्रिटिश पूँजीपति हैं, ब्रिटिश और भारतीय मिलकर शोषण करते हैं या ये शुद्ध रूप से भारतीय हैं।” राहुल ने एक तरफ स्वतन्त्रता संग्राम में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया, वहीं दूसरी तरफ किसानों को उनका अधिकार दिलाने के लिए संघर्ष किया।

सन् 1938-39 का वर्ष, पूरे देश में किसान-मजदूर आन्दोलन तथा भूमिसंघर्ष अपने उभार पर था । शोषण-विहीन समाज की स्थापना का सुनहला स्वप्न सँजोये सीवान में राहुल ने किसान आन्दोलन का नेतृत्व किया। उनके ईमानदार और कर्मठ नेतृत्व के कारण ही किसान आन्दोलन ऐतिहासिक सिद्ध हुआ तथा इससे आस-पास के किसानों में अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता आयी ।

पुराने सारण जिले (सम्प्रति – सीवान, छपरा व गोपालगंज) को विख्यात साहित्यकार राहुल सांकृत्यायन की कर्मभूमि होने का गौरव प्राप्त है। उन्होंने अपने बहुमूल्य जीवन का एक बड़ा हिस्सा सीवान में व्यतीत किया था, यद्यपि सीवान उनकी जन्मभूमि नहीं है ।

राहुल जी का जन्म 9 अप्रैल, सन् 1893 को उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिलान्तर्गत पन्दाहा नामक गाँव में हुआ था। चौदह वर्ष की अल्पायु में ही वे घर छोड़कर ‘घुमक्कड़’ हो गये । अट्ठारह वर्ष की उम्र में वे परसागढ़ वैष्णव मठ में आये । परसागढ़ छपरा जिला के एकमा थानान्तर्गत अवस्थित है। वस्तुत: घटना यह घटी कि जब राहुल जी बनारस में थे,

उनकी मुलाकात परसागढ़ वैष्णव मठ के महन्थ रामदास से हुई । महन्थ रामदास अपने लिए एक ‘सर्वगुण-सम्पन्न’ शिष्य की खोज पर थे। राहुल जी उन्हें पसन्द आ गये और राहुल ने भी उनका प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। वे महन्थ रामदास के साथ परसागढ़ चले आये। राहुल जी के बचपन का नाम केदार पांडेय था तथा वे शैव मतावलम्बी थे। परसागढ़ में उन्होंने विधिवत् वैष्णव धर्म की दीक्षा ली और इसके साथ ही उनका नाम स्वामी रामोदार दास हो गया। इस तरह राहुल जी के जीवन का महत्त्वपूर्ण भाग छपरा से शुरू हुआ।

यद्यपि राहुल जी की पहचान एक साहित्यकार के रूप में है तथापि उनके बहुआयामी व्यक्तित्व का एक पक्ष है, किसान नेता का । अपने रक्त से सींचकर उन्होंने सीवान की धरती पर किसान आन्दोलन का नेतृत्व किया। राहुल जी का जीवन प्रवाहमय नदी के सदृश गतिमान था । सत्य की खोज में वे कभी वैष्णव बने, कभी आर्य समाज को स्वीकार किया तो अन्त में बौद्ध बने । राजनीति के क्षेत्र में राहुल जी पहले काँग्रेस में थे, फिर सीवान में रहकर किसान आन्दोलन का नेतृत्व किया, वे समाजवादी भी हुए और अन्त में साम्यवादी बने ।

सीवान में दो जगहों पर उनके नेतृत्व में चलने वाले किसान आन्दोलन में उन्हें जेल जाना पड़ा तथा एक जगह मार खानी पड़ी। सीवान के अमवारी नामक गाँव में बड़ा जबर्दस्त किसान आन्दोलन हुआ। अमवारी में ‘हरीबेगारी’ नाम की एक प्रथा थी । इस प्रथा के मुताबिक किसान अपने हल- बैल से पहले जमींदार का खेत जोतते, तब अपना खेत जोतते ।

जब किसानों ने इस प्रथा के पालन में, आनाकानी की तो जमींदार ने उनकी पिटाई की तथा किसानों की जमीन छीन ली । किसानों ने राहुल जी से शिकायत की। राहुल जी ने पहले अमवारी तथा उसके आस-पास के गाँवों में जाकर स्थिति का मुआयना किया, फिर सीवान के अँग्रेज एस. डी. ओ. से किसानों के ऊपर हो रहे अत्याचार को रोकने का आग्रह किया, पर एस.डी.ओ. ने कुछ नहीं किया ।

24 फरवरी, सन् 1939 का ऐतिहासिक दिन । प्रात:काल सूर्य अपनी रक्तिम किरणों को वसुन्धरा पर बिखेर रहा था, मानो वह दलितों व शोषितों को सन्देश दे रहा हो कि उन्हें अपने अधिकारों को पाने के लिए रक्त बिखेरना होगा। राहुल जी जैजोरी, जहाँ वे रात में ठहरे थे, से अमवारी की तरफ प्रस्थान कर गये। उन्होंने अपने किसान आन्दोलन को ‘सत्याग्रह’ का नाम दिया। सत्याग्रह के रूप में एक किसान के खेत में, जिसे जमींदार अपना बता रहा था, लगे ईख को ग्यारह-ग्यारह व्यक्तियों का जत्था बनाकर बारी-बारी से काटना था। राहुल जी ने इस सत्याग्रह का प्रचार चार दिन पहले से ही अमवारी के आस-पास के स्थानों जैजोरी, नदियावाँ, देवपुर, हरिनाथपुर, नियती, रघुनाथपुर, आन्दर आदि स्थानों पर सभा के माध्यम से
किया था जिसके कारण चौबीस फरवरी को सैकडो किसान वहाँ उपस्थित थे।

जमींदार ने राहुल जी के किसान सत्याग्रह को कुचलने का हर सम्भव इन्तजाम किया था। शराब पिलाये हुए दो हाथी, सैकड़ों पालतू लठैत जमींदार की तरफ से थे। पुलिस भी पहले से आयी थी ।

राहुल जी ने अपने दस साथियों के साथ खेत से दो ईख काटी ही थी कि थानेदार ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। इसके पश्चात् उन पर बाईं तरफ से लाठी से प्राणघातक प्रहार हुआ जिससे अमवारी की धरती राहुल जी के रक्त से रंजित हो गयी। इस घटना पर साहित्यिक क्षेत्र में भी तीखी प्रतिक्रिया हुई। अपने अधिकारों से विमुख किसानों को राहुल जी ने अपने गर्म रक्त का स्पर्श कराकर जगा दिया। अमवारी की घटना पर ही ‘फिरंगिआ’ के गायक प्राचार्य मनोरंजन की लेखनी से मुखरित हुआ –

“राहुल के सिर से खून गिरे फिर क्यों वह खून उबल न उठे साधु के शोणित से

फिर क्यों सोने की लंका जल न उठे । ”

अमवारी में पुलिस ने घायल राहुल जी तथा उनके सहयोगियों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। गिरफ्तार होने वाले उनके सहयोगियों में प्रमुख थे- नागार्जुन, मुहम्मद जलील, मजहर हुसैन, वासुदेव नारायण, महाराज पांडे इत्यादि । मुकदमा न्यायालय में आया तो न्यायालय ने पक्षपात पूर्ण ढंग से जमींदार का पक्ष लिया और राहुल जी को दफा 143 तथा 379 के तहत छ: महीने की कड़ी कैद सजा तथा तीस रुपये जुर्माने की सजा सुनाई। जेल में राहुल जी को अनेक आवश्यक सुविधाओं से वंचित रखा गया। इसके खिलाफ राहुल जी ने आमरण अनशन किया, जिसके कारण दस दिनों के पश्चात् सरकार ने उन्हें रिहा कर दिया।

जेल से रिहा होने के बाद राहुल जी पुन: किसान जागरण में लग गये।
सीवान के छितौली का किसान आन्दोलन अपना विशेष महत्त्व रखता है। छितौली के जमींदार ने अँग्रेज निलहे से पाँच सौ नवासी बीघा जमीन खरीदी थी। उस जमीन को जोतने बोने के लिए बाहर से चौदह असामियों को बसाया गया। असामी खेत जोतते तथा जमींदार उनसे मनमाना मालगुजारी वसूलते। पर बाद में जमींदार ने उन किसानों से जमीन वापस ले ली। राहुल जी ने छितौली में सत्याग्रह के लिए सत्याग्रह आश्रम खोला। उन्होंने वहाँ के जमींदार से बातचीत के द्वारा सुलह का प्रयास किया, ताकि किसानों को खेत मिल जाये। पंचायत भी हुई, पर जमींदार नहीं माना।

20 जून, सन् 1939 को राहुल जी ने छितौली में किसानों की सभा बुलाई। सभा के नियत समय से पहले ही सभास्थल पर जमींदार के आदमियों ने कब्जा जमा लिया था। राहुल जी जब सभास्थल पर गये तो जमींदार के लठैतों ने उनके राजभुवन और अखिलानन्द नामक सहयोगियों को पीटा, पर राहुल जी पीछे नहीं हटे। किसानों ने अपनी जमीन पर कब्जा कर लिया, जमींदार रोक नहीं पाया।

इस घटना के तीसरे दिन थानेदार ने धोखा देकर राहुल जी को गिरफ्तार कर लिया। इस बार उन्हें नौ महीने की सख्त कैद तथा तीस रुपये जुर्माना की सजा हुई । इस बार उन्हें हजारीबाग जेल में रखा गया, जहाँ उन्होंने अनशन किया। अनशन के फलस्वरूप 9 जुलाई को उन्हें रिहा किया गया ।, -1939 सन्

सीवान में राहुल जी के नेतृत्व में हुआ किसान आन्दोलन कई मायने में महत्त्वपूर्ण रहा। अमवारी सत्याग्रह में राहुल जी के सिर पर जो चोट लगी थी, वही उनकी मृत्यु का कारण बनी। उनके नेतृत्व के कारण किसान आन्दोलन ने बुद्धिजीवी वर्ग का ध्यान किसानों की दयनीय स्थिति की तरफ खींचा। उनके द्वारा चलाये गये संघर्ष में सीवान के अनेक लोगों ने कन्धा-से-कन्धा मिलाकर साथ दिया । डॉ. बाँके बिहारी मिश्र एवं डॉ. सियावर शरण (जामो) ने आन्दोलन के समय राहुल जी की बड़ी मदद की ।

देश के अन्य भागों की तरह ही सीवान में भी जमींदारों का जुल्म जोरों पर था। अँग्रेजों की चाटुकारिता करना, स्वतन्त्रता सेनानियों को पकड़वाना, अय्याशी करना तथा निरीह जनता पर अधिक-से-अधिक अत्याचार करना उनका परम कर्तव्य था। सीवान के जमींदारों की स्थिति की एक झलक राहुल जी के शब्दों में

“सिसवन थाना राजनीतिक काम के लिए मरुभूमि जैसा था । वहाँ का सबसे बड़ा और धनी गाँव चैनपुर था, जिसकी ही शाखा छितौली भी थी। यहाँ बड़े-बड़े धनी जमींदार रहते थे, जिनकी आमदनी पहले लाखों तक पहुँचती थी। लेकिन कई उनमें बिगड़ गये थे। बिगड़े हुए जमींदार भी अपने दिमाग को आसमान में ही रखते थे। कैसे वह अपने लिफाफे को कायम रखते यह हमारे जैसों के लिए समझना भी मुश्किल था ।

कितनों के महल अच्छी हालत में थे और कितने ही अपनी-अपनी हवेलियों के दरवाजे और कड़ियों को बेचकर पी रहे थे। शराब पीने का उनमें बहुत रिवाज था । नीति के तौर पर शराब के वर्जित रहने पर भी उसे छोड़ने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। लोग झट गोस्वामी जी की पाँती बोल देते हैं- ‘समरथ को नहिं दोष गुसाईं’ ।

चैनपुर के बाबू लोग अँग्रेजों के परम भक्त थे । बड़े जमींदारों का अंग्रेजों के राज्य के भीतर स्वतन्त्र अलग राज्य था । वह कानून से ऊपर थे, अपनी निरीह रियाया पर चाहे जो भी अत्याचार कर सकते थे।

उनकी मर्जी के खिलाफ कोई काँग्रेस का काम करने के लिए तैयार हो सकता था? चैनपुर में या तो जमींदार के लग्गू-भग्गू थे या उनके आसामी (प्रजा), कुछ थोड़े-से छोटी-मोटी दुकान करने वाले बनिये थे। बाबू लोगों की छाया के कारण वहाँ काँग्रेस का बिरवा पनपने नहीं पाता था।”

राहुल जी ने सीवान, छपरा तथा गोपालगंज के गाँव-गाँव में जाकर किसानों को संघर्ष के लिए प्रेरित किया। इस दौरान वे पूर्णत: किसान नेता बन गये थे। उनकी निष्कपट, घुमक्कड़ व फक्कड़ प्रवृत्ति ने उन्हें साधारण किसानों से जुड़ने में मदद की। राहुल जी को किसान आन्दोलन का नेतृत्व करता देख, भोजपुरी के सुविख्यात कवि महेन्द्र शास्त्री ने लिखा

“आराम जिन्दगी – भर तुमने नहीं किया है, अविराम काम का ही हठ ठान-ठान राहुल ! मुस्कान, पर, निरन्तर मुख पर रही तुम्हारे, विषपान आप कर-कर जीये किसान राहुल !”

जमींदारी-प्रथा के सम्बन्ध में किया गया उनका प्रण काफी दिलचस्प है। राहुल जी के शब्दों में ही

“उस दिन मैंने प्रतिज्ञा की कि जब तक जमींदारी प्रथा रहेगी, तब तक मैं परसा में नहीं आऊँगा। यह प्रतिज्ञा बिल्कुल चुपचाप की गयी थी और कभी परसा चलने की बात पर ही किसी-किसी को इसका पता लगा । लेकिन वर्षों न
जाने से इसका प्रचार हो गया। जमींदारी उठने के बाद परसा के बन्धुओं का आग्रह हुआ, तीस वर्ष बाद इस साल मैं वहाँ गया।”2 परसा से तात्पर्य परसागढ़ से है जो छपरा जिले में अवस्थित है।

राहुल जी ने स्वतन्त्रता संग्राम में भाग लिया, 15 अगस्त, 1947 को स्वतन्त्रता मिली भी । पर राहुल जी की दृष्टि ‘इस स्वतन्त्रता का कोई मतलब नहीं था। उनके अनुसार- “मेरे लिए देश की आजादी का मतलब था किसानमजदूर राज्य।”3

राहुल जी ने न केवल साहित्य के माध्यम से किसान-मजदूर को संघर्ष के लिए प्रेरित किया वरन् अपने प्राण की बाजी लगाकर उनके संघर्ष का सफलतापूर्वक नेतृत्व भी किया। इसके पीछे राहुल जी की करनी और कथनी में एकरूपता का महान आदर्श छुपा था। समकालीन परिवेश में चलाये जा रहे किसान-आन्दोलन के नेतृत्व को राहुल जी की कथनी और करनी में एकरूपता के महान आदर्श का अनुसरण करना चाहिए।

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