जंतर-मंतर पर सन्नाटा छा गया है
सन्नाटे में भी सुनाई दे रहे नारे…
श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

दोपहर का वक्त है। बादलों और सूर्य में लुकाछिपी चल रही है। हल्की हवा से उमस में राहत है। जंतर-मंतर, कुछ ऐसा जैसे कोई भारी सा सांस छोड़कर चुप हो गया हो। लंबे जागरण के बाद गहरी नींद में सोया हो। किसी बड़े आयोजन के बाद का नजारा।
कल तक जहां हजारों युवा बैठे थे, नारे लगा रहे थे, झूम, गा रहे थे। कुछ आक्रोश की अभिव्यक्ति कर रहे थे। पोस्टर थामे खड़े थे, वहां आज खामोशी, इतनी कि अपनी सांस भी सुनाई दें। नीचे से गुजरती मेट्रो ट्रेन की थरथराहत सड़क ऊपर तक महसूस की जा रही है। चारों ओर बैरिकेड्स का घेरा आज भी सख्त है। उसके साथ सचेत, कुछ ऊंघते सुरक्षाकर्मी। मोबाइल फोन में तल्लीनता भी।
झाड़ू लगाते और कूड़े इकट्ठा करते सफाई कर्मी। धीरे-धीरे, जैसे कोई पुरानी यादें साफ कर रहा हो। बाकी सब शांत।टूटे बैरिकेड्स, मेटल डिटेक्टर गेट, डिवाइड व फुटपाथ किनारे टूटी टहनियां, कुचले पौधे और घासे।दीवारों पर नारे और फुटपाथों की टूटी टाइल्स। जिसे दुरुस्त कर कर्मी फिर से उसे पुराने रंगरोगन में लौटाने में जुटे हैं। जनपथ की बाजारें खुली है पर ग्राहक नहीं है। जनपथ लेन की दुकानों को फिर किसी अंदेशे में बंद करा दिया गया है।
पिछले एक महीने मेरे साथ टालस्टाय रोड व संसद मार्ग जेन जी का मैदान बनी हुई थी। नीट पेपर लीक, परीक्षाओं में धांधली, नौकरियों की चिंता-ये सब लेकर कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के नाम से युवा यहां इकट्ठा हुए थे। मीम, व्यंग्य, क्रिएटिव पोस्टर, सोशल मीडिया की भाषा में चुटिला विरोध, जो विरोध के तरीके पर मुस्कुराहट ला दें।
कुछ चुभते से पोस्टर और अश्लील नारे, जो मुझे भी अच्छे नहीं लगे। आंदोलन में कोई नामचीन नेता नहीं था। सिर्फ युवा। कई दिन वर्षा व उमस भरी गर्मी में भी बैठे रहे। कुछ भूख हड़ताल पर थे। पुलिस के साथ टकराव भी हुए। फिर मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा। सरकार से बातचीत। और शनिवार शाम आंदोलन वापस लेने का ऐलान। आज वह सब याद आ रहा है जैसे कोई फिल्म का अंतिम सीन।
एक लड़की फोन पर वीडियो बनाते हुए कहती है कि अब लग रहा है जैसे सब खत्म हो गया है। तभी उसका दोस्त हंसकर जवाब देता है कि खत्म नहीं, जीतकर गए हैं। उसके चेहरे पर थकान थी, लेकिन आंखों में एक हल्की चमक। एक और लड़का बैग कंधे पर डाले खड़ा था। उसने बताया कि वो चार दिन से यहां था। घरवाले परेशान थे, लेकिन अब जब मांग मन गई तो अच्छा लग रहा है। लेकिन ये जगह खाली देखकर अब अजीब लग रहा है। उसकी बातें सुनी और चुप रहा। कुछ बातें जवाब नहीं मांगतीं।
आंदोलन के दौरान जो ऊर्जा थी, वो गायब हो गई थी। लेकिन वो गायब होना खालीपन नहीं था। जैसे किसी लंबे तूफान के बाद आसमान साफ हो जाता है। युवा अपनी मांग मनवाकर घर लौट गए। कुछ खुश, कुछ थके, कुछ अभी भी सवाल लिए हुए। लेकिन जगह अब फिर से उसी दिल्ली की एक सड़क जैसी लग रही थी, जहां विरोध होता है, फिर शांति लौट आती है।
जंतर मंतर के पुराने यंत्र, जो सदियों से समय माप रहे, आज वे भी शांत लग रहे। जैसे कह रहे हों कि इतिहास में कई आंदोलन आए और गए। इस बार जेन जी ने अपनी भाषा में बात की, जो उसके लिए भी कौतूहल था। कुछ नारे अभी भी दीवारों से झांकते हुए इसकी तस्दीक करते हैं।
एक बुजुर्ग पास से गुजरते हुए कहते हैं, मैंने कई आंदोलन देखे हैं। लेकिन ये अलग था। कोई नेता नहीं, सिर्फ बच्चे। और उन्होंने काम कर दिखाया। उनकी आवाज में गर्व था। ये आंदोलन सिर्फ एक मांग नहीं था। ये एक पीढ़ी का अपना अंदाज था-मजाक में, मेम में, लेकिन गंभीरता के साथ।
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