Headlines

गर्मी की छुट्टियाँ और हमारा समाज

गर्मी की छुट्टियाँ और हमारा समाज

श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

गर्मी की छुट्टियाँ, शैक्षणिक कैलेंडर के साथ आती थीं। वे सीधे मन में उतरती थीं। जैसे आम के बौर अचानक हवा में घुल जाते हैं और घर-आँगन को एक अनकही मिठास से भर देते हैं। तब छुट्टियाँ मतलब नानी का घर होता था। वही खुला आँगन। वही माटी की गंध। वही दोपहर की लंबी नींद, जो कभी पूरी नहीं होती थी, और वही शामें, जो जल्दी ढल जाती थीं।

हम जाते थे। छोटी बहन साथ होती थी। छोटा भाई भी। रास्ता लंबा लगता था, पर मन आगे भागता था। नानी के घर पहुँचते ही समय का हिसाब छूट जाता था। वहाँ घड़ी नहीं थी, या थी भी तो चलती नहीं थी। वहाँ दिन सूरज से तय होते थे और रातें कहानी से।

बहन तब साथी थी। खेल की, झगड़े की, मनाने की। भाई पीछे-पीछे चलता था। कभी रोता, कभी हँसता। हम तीनों मिलकर एक छोटा-सा संसार थे। उस संसार में बड़े नहीं थे। वहाँ न जिम्मेदारियाँ थीं, न भूमिकाएँ। बस होना था। और होना ही काफी था।

समय चुपचाप चलता रहा। जैसे सूखे तालाब की मिट्टी के भीतर कहीं पानी अपनी राह बनाता रहता है। ऊपर से सब स्थिर दिखता है, भीतर बहुत कुछ बदलता रहता है। हम बड़े हो गए। घर बदल गए। शहर बदल गए। और रिश्तों के अर्थ भी धीरे-धीरे बदलते गए।

अब गर्मी की छुट्टियाँ आती हैं, पर वे मन में नहीं उतरतीं। वे कैलेंडर में दर्ज रहती हैं। उनके साथ योजनाएँ जुड़ती हैं। समय का हिसाब जुड़ता है। आने-जाने की तारीखें तय होती हैं। और इन सबके बीच कहीं वह सहजता छूट जाती है, जो कभी बिना बुलाए आ जाती थी।

इस बार छुट्टियाँ आईं, तो दिशा बदल गई। अब हम जाने वाले नहीं थे। अब कोई हमारे पास आया। बहन आई। सपरिवार। दोनों भांजे साथ थे। बहनोई भी। घर अचानक भर गया। जैसे सूखे आँगन में अचानक पानी आ जाए और मिट्टी अपनी प्यास भूल जाए।

बहन अब वही नहीं थी, जो कभी खेल में हारकर रूठ जाती थी। वह अब माँ थी। उसके चेहरे पर एक अलग-सी गंभीरता थी। पर उस गंभीरता के भीतर कहीं वही पुरानी हँसी छिपी थी। वही अपनापन, जो बिना कहे समझ में आता था।

दक्ष और दक्षित। दो छोटे-छोटे नाम, दो अलग-अलग स्वभाव। घर में उनके कदम पड़े, तो जैसे हवा बदल गई। कमरों में आवाजें गूँजने लगीं। खिलौनों की खनक, हँसी की लहर, और बीच-बीच में छोटे-छोटे झगड़े। घर अब घर नहीं रहा, एक जीवित जगह बन गया।

मैं टूर गाइड बना। दिल्ली दिखानी थी। यह वही दिल्ली थी, जिसमें मैं रोज रहता हूँ। पर उन दिनों वह नई लगने लगी। जैसे किसी और की आँखों से उसे देख रहा हूँ। इंडिया गेट पर खड़े होकर मैंने पहली बार उसकी चौड़ाई देखी। कुतुब मीनार के सामने खड़े होकर उसकी ऊँचाई को महसूस किया। लाल किले की दीवारें अब इतिहास नहीं, अनुभव लगने लगीं।

दक्ष सवाल पूछता था। दक्षित दौड़ता था। बहन पीछे से आवाज देती थी। बहनोई मुस्कुराते थे। और मैं इन सबके बीच कहीं अपना बचपन खोजता था। वह बचपन, जो कभी इसी तरह सवाल करता था। इसी तरह दौड़ता था। और किसी के पीछे-पीछे चलता था।

चार दिन। बस चार दिन। पर इन चार दिनों में समय फिर से पिघल गया। वह घड़ी की सुइयों से निकलकर हमारे बीच बैठ गया। हमने खेला। खूब खेला। हँसे। देर तक बैठे रहे। बिना किसी खास वजह के बातें कीं। जैसे पहले किया करते थे।

रात को जब सब सो जाते थे, तो घर में एक हल्की-सी शांति उतरती थी। उस शांति में दिन भर की आवाजें तैरती रहती थीं। मुझे लगता था, यह घर फिर से वैसा ही हो गया है, जैसा कभी नानी का घर होता था। जहाँ लोग आते थे और घर भर जाता था।

पर हर भराव के भीतर एक खालीपन छिपा होता है। यह बात शायद उम्र के साथ समझ में आती है। हमें पता होता है कि यह सब स्थायी नहीं है। यह समय भी जाएगा। ये दिन भी बीतेंगे। और फिर घर वैसा ही हो जाएगा, जैसा पहले था! साफ, सुथरा, पर थोड़ा-सा खाली।

आज बहन विदा हुई। भांजे भी। बहनोई भी। दरवाज़ा बंद हुआ, तो घर में एक अजीब-सी गूँज रह गई। जैसे आवाजें अभी भी दीवारों से टकरा रही हों। कमरे वैसे ही हैं। चीजें अपनी जगह पर हैं। पर कुछ बदल गया है।

यह खालीपन अचानक नहीं आता। यह धीरे-धीरे उतरता है। पहले आवाजें कम होती हैं। फिर कदमों की आहट गायब होती है। फिर हँसी कहीं दूर चली जाती है। और अंत में एक सन्नाटा रह जाता है, जो सुनाई नहीं देता, पर महसूस होता है।

मैं बैठा हूँ। वही कमरा। वही दीवारें। पर मन कहीं और चला गया है। नानी का घर याद आता है। वह आँगन। वह नीम का पेड़। और हम तीनों—मैं, बहन, और छोटा भाई। तब हमें नहीं पता था कि यह सब एक दिन स्मृति बन जाएगा।

अब समझ में आता है कि घर दीवारों से नहीं बनता। वह उन लोगों से बनता है, जो उसमें आते-जाते रहते हैं। उनकी हँसी, उनकी आवाजें, उनके छोटे-छोटे झगड़े, यही घर को जीवित रखते हैं। जब वे नहीं होते, तो घर भी थोड़ा-सा ठहर जाता है।

बहन चली गई है। पर वह अपने साथ कुछ नहीं ले गई। उसने यहाँ बहुत कुछ छोड़ दिया है। बच्चों की हँसी। अपने होने का अहसास। और यह याद कि रिश्ते समय के साथ बदलते हैं, पर उनका मूल नहीं बदलता।

अब हम नानी के घर कम ही जा पाते है। पर शायद हम अपने-अपने घरों में वही नानी का घर बना रहे हैं। जहाँ कभी हम मेहमान थे, आज कोई और आता है। और हम उसके लिए वही बनते हैं, जो कभी हमारे लिए कोई था।

समय का यह चक्र बड़ा सरल है। इसमें कोई शोर नहीं है। यह धीरे-धीरे चलता है। और हमें बदलता रहता है। हम देखते रहते हैं, समझते रहते हैं, और कभी-कभी इन छोटे-छोटे क्षणों में उसे छू भी लेते हैं।

आज घर खाली है। पर यह खालीपन भी पूरा है। इसमें चार दिनों की हँसी भरी है। इसमें दौड़ते कदमों की धूल है। इसमें बहन की आवाज है। और इसमें वह बचपन भी है, जो कहीं गया नहीं, बस रूप बदलकर हमारे सामने खड़ा है।

शायद यही छुट्टियाँ हैं। जो आती नहीं, बनती हैं। जो बीतती नहीं, रह जाती हैं। जो बाहर नहीं, भीतर घटती हैं। और हमें यह सिखाती हैं कि जीवन में सबसे स्थायी चीज वही है, जो क्षणिक है।

घर फिर से शांत है। पर इस शांति में एक गहरी गूँज है। जैसे किसी सूखे तालाब के तल में पानी अब भी कहीं बह रहा हो। दिखता नहीं, पर है। और वही इस घर को, इस मन को, जीवित रखे हुए है।

Leave a Reply

error: Content is protected !!