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अब मेरा क्या होगा- पकड़ी का पेड़

अब मेरा क्या होगा- पकड़ी का पेड़

निबंधन कार्यालय में गिरे पेड़ की आत्मव्यथा

फूल लिए… फल लिए… मनुष्य के हम अग्रज है

✍🏻 राजेश पाण्डेय

श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

 

मैं पकड़ी के पेड़ के रूप में समाज में संबोधित होता हूं। मैं सीवान जिले में महाराजगंज अनुमंडल के तहत महाराजगंज स्थित अवर निबंधक कार्यालय में वर्षों से अवस्थित था। लेकिन बंगाल की खाड़ी में उठे तूफान ने महाराजगंज में केंद्रित होकर लगभग 300 मिलीमीटर बारिश किया। परिणाम यह हुआ कि मैं यहां गिर पड़ा। मेरी जड़ बिल्कुल गीली हो गई थी और एक हवा के झोंके ने मुझे गिरा दिया।

आप थोड़े पीछे जाएंगे तो बिहार मौसम विभाग के पोर्टल पर यह देख सकते हैं कि पूर्वांचल क्षेत्र में वर्षा का सबसे बड़ा संकेंद्रण महाराजगंज में ही हुआ था, परन्तु अब यक्ष प्रश्न यह है कि मुझे यहां से हटाए कौन, और मैं कैसे हटूंगा? क्योंकि मैं किसी के निजी परिसर में तो नहीं गिरा हूं, ना ही सड़क पर गिरा हूं।

अगर सड़क पर गिरा होता‌ तो जनता काट-काटकर सड़क साफ कर देती और नीचे का धड़ वन विभाग उठा ले जाता,अपनी कागज़ी खानापूर्ति करने के लिए। लेकिन हम अत्यधिक, अति सुरक्षित अवर निबंधक कार्यालय के परिसर में गिर गये है तो इसके लिए विभागीय कार्रवाई प्रारंभ हो गई है।


इस पर मुझे याद आता है कृष्णचंदर जी की कालजयी कहानी ‘जामुन का पेड़’ जिसमें प्रशासन की नकारात्मक तत्वों को उजागर करते हुए यह संकेत दिया गया था कि किसी भी कार्य को त्वरित गति से किया जाए। बहरहाल पिछले चार महीना से मैं यहां पड़ा हूं। अब यह सब आपको देखना होगा कि कब तक मुझे यहां से मुक्ति मिलती है। परन्तु एक बात और बताऊं कि मेरे नीचे की जो टहनियां है वह सूख रही हैं उपर की शाखाओं पर पत्तियां हरी है क्योंकि बकरियां निचे पड़े शाखाओं में उग आये मेरे पत्तों को खा जाती है, लेकिन ये बकरियां ऊपर नहीं चढ़ सकती तो ऊपर के शाखों में पत्तियां हरी यानी अभी भी मेरा जड़ थोड़ा बहुत भूमि से लगा हुआ है,

परन्तु अब मुझे कोई उठाकर खड़ा नहीं कर सकता और व्यक्तिगत रूप से इसके बारे में हमारे पदाधिकारी की यह चाहत भी नहीं है। इसलिए उन्होंने आवेदन के माध्यम से यह बात शासन को सूचित कर दिया है कि कृपया कर इस पेड़ का निस्तारण किया जाए।
अंततः मैं पकड़ी का पेड़ हूं जो अब इतिहास बन जाऊंगा लेकिन आप याद रखिये मेरी ही शाखाओं के नीचे हजारों की संख्या में आपके भूमि की रजिस्ट्री व निबंधन हुआ है जिसकी मैं साक्षी रही।

अलविदा मेरे मित्र राजेश पाण्डेय जो तूने मेरी मन की व्यथा को जनमानस के समक्ष रखा।

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