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सऊदी अरब की रिफाइनरी पर हमले से वैश्विक तेल बाजार में उथल-पुथल मच गई

सऊदी अरब की रिफाइनरी पर हमले से वैश्विक तेल बाजार में उथल-पुथल मच गई

श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

 वैश्विक तेल बाजार के लिए किसी बुरे सपने से कम नहीं रही। भारत से हजारों किलोमीटर दूर सऊदी अरब का एक अहम रिफाइनरी केंद्र अचानक ठप हो गया और दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण तेल जलडमरूमध्य हॉर्मुज में जहाजों की आवाजाही लगभग रुक गई।

नतीजा यह हुआ कि कच्चे तेल की कीमतों में एक ही दिन में जोरदार उछाल आ गया, जिसकी गूंज सीधे भारत के शेयर बाज़ार और मौद्रिक नीति तक पहुंची। ड्रोन और मिसाइल मलबे के खतरे के चलते सऊदी अरामको को रास तनुरा में स्थित 5.5 लाख बैरल प्रतिदिन क्षमता वाली रिफाइनरी और निर्यात केंद्र में परिचालन रोकना पड़ा।

साथ ही, ईरान पर अमेरिका और इजराइल के हमलों के बाद बढ़े तनाव के कारण जहाज मालिकों ने हॉर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने से परहेज करना शुरू कर दिया। यह रास्ता दुनिया की लगभग 20% तेल आपूर्ति के लिए जीवनरेखा माना जाता है।

क्रूड ऑयल के किमत में भारी उछाल

इन घटनाओं के बाद ब्रेंट क्रूड एक दिन में 9–13% उछलकर 70 डॉलर के ऊपरी और 80 डॉलर के निचले स्तर तक पहुंच गया, जबकि अमेरिकी डब्ल्यूटीआई क्रूड 9% से अधिक चढ़कर 70 डॉलर के आसपास आ गया।

टोरंटो स्थित वित्त विशेषज्ञ शाह फैसल शाह ने इसे वैश्विक महंगाई का न्यूक्लियर बम बताया और चेतावनी दी कि तेल में 10% की छलांग एक महीने में उपभोक्ता महंगाई को 0.5% तक बढ़ा सकती है। भारत के लिए यह समय बेहद नाज़ुक है। हाल के महीनों में महंगाई तेजी से घटी थी। अक्टूबर 2025 में यह ऐतिहासिक रूप से 0.25% तक आ गई और जनवरी में 2.75% रही।

क्या पड़ेगा असर?

तेज आर्थिक वृद्धि के साथ कम महंगाई का यह संतुलन अब महंगे तेल से बिगड़ सकता है। ऊंची ऊर्जा लागत परिवहन, खाद्य और विनिर्माण कीमतों को ऊपर धकेल सकती है, जिससे भारतीय रिजर्व बैंक के लिए ब्याज दरों में कटौती मुश्किल हो जाएगी।

रुपया भी दबाव में आ सकता है। फरवरी में यह डॉलर के मुकाबले मजबूत होकर 90.97 पर बंद हुआ था, लेकिन बैंकों का मानना है कि कच्चा तेल महंगा होने पर यह 91–93 के दायरे में जा सकता है। एक अनुमान के मुताबिक, तेल की कीमत में हर 10 डॉलर की बढ़ोतरी से भारत का चालू खाता घाटा 40–50 आधार अंक बढ़ सकता है।

भारत के पास कितना स्टॉक

हालांकि भारत के पास लगभग 74 दिनों की खपत के बराबर रणनीतिक तेल भंडार है और वह रूस या अमेरिका से आपूर्ति बढ़ा सकता है, लेकिन लंबे समय तक हॉर्मुज़ में बाधा या व्यापक क्षेत्रीय संघर्ष की स्थिति में तेल 90–100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर जा सकता है। तब इसका असर केवल तेल तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि गैस, सोना, हीरे और समूची अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।

दरअसल, ईरान पर हमले के बाद वैश्विक तेल और गैस बाजार में जबरदस्त उथल-पुथल का माहौल है. मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव का सीधा असर ऊर्जा कीमतों और ऊर्जा कंपनियों के शेयरों पर पड़ा है. कहा जा रहा है कि ईरान के ड्रोन हमले के बाद सऊदी की अरामको ने रास तनुरा रिफाइनरी को एहतियातन बंद कर दी है. यह जगह सऊदी की सबसे बड़ी और सबसे स्ट्रैटेजिक एनर्जी साइट्स में से एक है. इस हमले की खबर के ब्रेंट क्रूड के भाव अचानक उछाल देखने को मिल रहा है.

रूसी मार्केट में तेजी के क्या कारण?

इस तेजी के पीछे कच्चे तेल की सप्लाई को लेकर गहराता संकट है, मध्य पूर्व की स्थिति ने ब्रेंट क्रूड की कीमतों में करीब 15% तक की तेज बढ़ोतरी कर दी. अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क Brent Crude लगभग 79.50 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार करता देखा गया. बाजार में भारी अस्थिरता बनी हुई है और विश्लेषकों का मानना है कि अगर संघर्ष और गहराता है तो भाव में और तेज उछाल आ सकता है.

दरअसल, युद्ध के बीच टेंशन की सबसे बड़ी वजह Strait of Hormuz है, जो दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री तेल मार्गों में से एक है. खाड़ी क्षेत्र से निकलने तेल का वाला बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से वैश्विक बाजार तक पहुंचता है. अगर युद्ध के कारण टैंकर यातायात बाधित होता है, तो आपूर्ति में गंभीर रुकावट आ सकती है.

क्या हुआ रास तनुरा में?

रॉयटर्स ने सूत्रों के हवाले से बताया कि सऊदी अरब के खाड़ी तट पर स्थित रास तनुरा परिसर को एहतियात के तौर पर बंद किया गया। यह रिफाइनरी मध्य पूर्व की बड़ी रिफाइनरियों में गिनी जाती है और इसकी क्षमता लगभग 5.5 लाख बैरल प्रतिदिन है। यही परिसर सऊदी कच्चे तेल के लिए एक अहम निर्यात टर्मिनल भी है।

सऊदी रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता ने अल अरबीया टीवी पर बताया कि दो ड्रोन को इंटरसेप्ट कर लिया गया। ड्रोन के मलबे से सीमित स्तर पर आग लगी, जिसे काबू में कर लिया गया। किसी के घायल होने की सूचना नहीं है।

सऊदी अरब की ऊर्जा अवसंरचना पहले भी निशाने पर रही है। सितंबर 2019 में अबकैक और खुरैस संयंत्रों पर ड्रोन और मिसाइल हमलों से सऊदी उत्पादन का आधे से ज्यादा हिस्सा अस्थायी रूप से प्रभावित हुआ था और वैश्विक बाजार में भारी उथल-पुथल मच गई थी।

 

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