कविता भाषा में आदमी होने की तमीज है-धूमिल
श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

आज ‘विश्व कविता दिवस'(World Poetry Day) है! यूनेस्को ने 1999 में पेरिस में आयोजित तीसवें सम्मेलन में 21 मार्च को विश्व कविता दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की थी, जिसका उद्देश्य कवियों को और इस विधा को सम्मान देना था।
यूनेस्को की तत्कालीन महानिदेशक इरीना बोकोवा (Irina Bokova) ने इस अवसर पर कहा था- ” प्रत्येक कविता अद्वितीय है, लेकिन प्रत्येक मानव अनुभव में सार्वभौमिक को प्रतिबिंबित करता है, रचनात्मकता की आकांक्षा, जो समय के साथ- साथ अंतरिक्ष और सभी सीमाओं को पार करती है, मानवता के निरंतर प्रतिज्ञान में,एकल परिवार के रूप में!(Every poem is unique, but which reflects the universal in human experience, the aspiration for creativity that crosses all boundaries and borders of time as well as space, in the constant of affirmation of humanity as a single family)!
कविता के संबंध में भारतीय काव्यशास्त्र के आचार्यों का चिंतन हो या पाश्चात्य काव्य-चिंतन की परंपरा, ये दोनों समृद्ध भी हैं, प्राचीन भी! संस्कृत के आचार्यों ने कविता और इसकी उपादेयता पर गहन विचार- विमर्श किया है!
हम भाषा के माध्यम से संवाद करते हैं। त्रिलोचन की पंक्तियाँ हैं-
भाषा की लहरों में जीवन की हलचल है,
ध्वनि में क्रिया भरी है और क्रिया में बल है।
.. .. और जहाँ तक कविता की बात है, प्रख्यात कवि धूमिल ने कहा है, “कविता भाषा में आदमी होने की तमीज है”! एतदर्थ, कह सकते हैं कि कविता मनुष्यता की मातृभाषा है।
विश्व कविता दिवस के विषय में शंभूनाथ जी लिखते हैं –
“यह दुनिया के शब्दकारों के लिए एक महान दिन के रूप में देखा जाता है, जब कई जगहों पर लोग कॉफी के साथ कविता का आनंद लेते है या काव्य-गोष्ठियां करते हैं। 2015 में ऑस्ट्रिया की एक कॉफी कंपनी के 1,157 कॉफी हाउसों में इस दिन कॉफी के बदले नगद राशि नहीं ली गई, कैश काउंटर पर एक नई लिखी कविता देना ही काफी था। एक नई लिखी कविता दो, मुफ्त कॉफी लो! इस तरह का उत्सवधर्मी आयोजन दुनिया में कई जगहों पर होता है, यह एक अभियान बन गया है।
21 मार्च को ‘पे विद ए पोयम’ का आनंद आम पब्लिक भी उठाने लगी है। विश्व कविता दिवस पर कोई सरकार या कंपनी विज्ञापन नहीं देती, जिस तरह अन्य अवसरों पर देती है। बिना मीडिया प्रचार के ही लोग विश्व कविता दिवस के बारे में जानने लगे हैं, यह मानवता का उत्सव बन रहा है।
भारतेंदु हरिश्चंद्र ने 1880 के दशक में ‘पेनी रीडिंग क्लब’ बनाया था, जिसमें कविताएँ पढ़ी जाती थीं। शिक्षण संस्थान, सांस्कृतिक केंद्रों, कॉफी शृंखलाओं और खुद कवियों के आगे आने पर भारत में भी विश्व कविता दिवस को लोकप्रिय बनाया जा सकता है” (हिंदी साहित्य ज्ञानकोश, पृष्ठ-३५४३)।
आज काव्य सम्मेलनों और मुशायरों में बड़े-बड़े कवि और शाइर दिखते हैं, जो स्वनामधन्य हैं और नजदीक से देखने पर अनेक तो ऐसे हैं, जिनमें “आदमी होने की तमीज” ही नहीं है! काव्य पाठ करते समय बार-बार यह कहना कि मेरी अगली महत्वपूर्ण पंक्तियाँ सुनिए.., अब मैं जो सुनाने जा रहा हूँ, ऐसी पंक्तियाँ आपने सुनी न होंगी.., अगली पंक्तियों पर ताली बजाइएगा..! यह स्वनामधन्य रचनाकारों की ऐसी बेशर्मी है, जो समझती है कि श्रोता मूर्ख हैं!
अस्तु, किसी भी दिवस को मनाने का प्रतीकात्मक महत्त्व होता है और दिवस की अवधारणा तत्सम्बद्ध विमर्श हेतु प्रेरित करती है! एक पाठक और श्रोता के रूप में कवियों से कहना चाहूँगा कि कथ्य हो तो महत्त्वपूर्ण लिखें, भावपूर्ण लिखें, थोक भाव में न लिखें, ताकि कविता की अकाल-मृत्यु न हो और कविता के प्रति रुचि बनी रहे!
