बिहार का संदेश है:कुछ बनना नहीं, कुछ करना हैं
114 वें बिहार दिवस पर विशेष आलेख
✍🏻 राजेश पांडेय
श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

बिहार का अतीत गौरवशाली रहा है, वैभवशाली रहा है। सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में बिहार का इतिहास हमारे लिए असीम ऊर्जा का स्रोत रहा है। निश्चित तौर पर वर्तमान में बिहार कई सारी चुनौतियों का सामना कर रहा है। कई समस्याएं चिंताएं उत्पन्न कर रही है। परंतु कई ऐसे तथ्य भी हैं जो बिहार में संभावनाओं की प्रबल बयार बहाते दिखते हैं। समर्पित कलेवर, संवेदनशील प्रयास, सुनियोजित रणनीति की त्रिवेणी बिहार के गौरव को वापस ला सकती है। बस आवश्यकता प्रयासों में समन्वय और संतुलन की है। आवश्यकता सार्थक चिंतन की है।
बिहार शब्द की उत्पत्ति बौद्धों के मठ विहार से हुई है। जहां कई सौ बौद्ध भिक्षु अपने ज्ञान को पुनर्जीवित व प्रशिक्षित करने हेतु आपस में विचार-विमर्श के लिए एकत्रित होते थे। एक तरह से आप कह सकते हैं कि यह एक बहुत बड़ा ट्रेनिंग स्थल था जिसे हम आज के रिफ्रेशमेंट केन्द्र भी कह सकते हैं तब से बिहार का अस्तित्व है और यह विहार आगे चल के बिहार में बदल गया।
बिहार के प्राचीन काल पर ध्यान दिया जाए तो सारण जिले का चिरांद है, जहां 4500 ईसा पूर्व की वस्तुएं प्रान्त हुई हैं। पूरे बिहार पर चर्चा करने के दौरान हम इसे इसके प्राचीन युग, मध्यकालीन युग व वर्तमान युग में राजनीति, सामाजिक, सांस्कृतिक व साहित्यिक उदय पर विचार करेंगे।
हमारी राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर लिखते हैं
“वैशाली जन का प्रतिपालक
गण का आदि विधाता
जिसे पूजता विश्व आज
उस प्रजातंत्र की माता
रुको एक क्षण पथिक यहां
इस मिट्टी पर शीश नवाओ
राज सिद्धियों की समाधि पर फूल चढ़ाते जाओ”।
महाजनपद काल अर्थात 600 ईसा.पूर्व में अंग, मगध, मिथिला और करुष (शाहाबाद) नामक राज्यों के सम्मिश्रण से यह बिहार बना है। 725 ईसा पूर्व से 484 ईसा पूर्व तक प्रथम लिचछवी गणराज (वृजी संघ) रहा, जिसे हम प्रथम गणराज्य के रूप में मानते हैं।
कौटिल्य के अर्थशास्त्र में वर्णित है कि इस भूमि पर यूनानी यात्री मेगास्थनीज 300 ईसापूर्व में पाटलिपुत्र की धरती पर आया था और उसने अपनी पुस्तक इंडिका में ‘सभा’ और ‘समिति’ का उल्लेख किया तथा नगरीय प्रशासन का भी उल्लेख हुआ था।
सम्राट अशोक के शासन काल में मगध पूरे साम्राज्य का केंद्र रहा और इसके सुदूर प्रांत गंधार अफगानिस्तान तक फैले हुए थे। आज भी चंपारण के लौरिया, नंदनगढ़, रमपुरवा,केसरिया में अशोक स्तंभ एवं स्तूप देखे जा सकते हैं जो बिहार की वैभव की कहानी सुनाते हैं।
इतिहास पर हम गौर करेंगे तो भारत के पहले हर्यक वंश के राजा जिसमें बिंदुसार,अजातशत्रु व उदयीन हुए इसमें से उदयीन ही राजगृह से राजधानी पाटलिपुत्र लाया, क्योंकि राजगृह पांच पहाड़ियों से घिरा हुआ क्षेत्र था और पाटलिपुत्र पांच नदियों से घिरा हुआ था।
मध्य काल में ‘आईने अकबरी’ के अनुसार 11 मार्च 1580 को इसे अकबर के काल में एक सुबा का स्वरूप मिला और यह प्रान्त मुगल बादशाह के अंतर्गत रहा।
लेकिन इससे पहले शेरशाह सूरी जो बाबर के एक सैनिक के रूप में काम शुरू किए थे, वह आगे पदोन्नत होकर सेनापति बने और बाद में बिहार के राज्यपाल नियुक्त हुए।
1537 में हूमायूॅ के कमजोर होने पर शेरशाह ने बंगाल पर कब्जा कर सूरी वंश की स्थापना की और 1539 एवं 1540 में चौसा और कन्नौज की लड़ाई में हूमायूॅ को हराया। शेरशाह ने 1540 से 1545 तक शासन किया। शेरशाह के गृहनगर सासाराम में उनका मकबरा स्थापत्य कला का बेजोड नमूना है।
वहीं हम बिहार में इस्लाम के प्रचार प्रसार की बात करें तो यह सूफी संतों के द्वारा हुआ। जैसा कि आप सभी को जानकारी है कि पूरे भारतवर्ष में चार संप्रदायों ने सूफी परंपरा को आगे बढ़ाया, जिसमें चिश्ती संप्रदाय, सुहारवर्दी संप्रदाय, कादरी संप्रदाय, और नक्शबंदी संप्रदाय थे । इसमें चिश्ती संप्रदाय के एक सूफी शेख हसन के द्वारा 1325 में सीवान के हसनपुरा में उनका आगमन हुआ। उन्होंने इस क्षेत्र में इस्लाम का प्रचार प्रसार किया ।
वहीं बिहार की बात की जाए तो सुहारवर्दी संप्रदाय में एक सूफी संत हजरत मखदूम या याहिया मनेरी जिनका निधन 1291 ईस्वी में होता है। आज भी आप पटना के निकट मनेर जाएंगे तो वहां पर बडकी दरगाह के नाम से इनका दरगाह है।
शाह दौलत या मखदूम दौलत जिनका निधन 1608 में होता है यह छोटी दरगाह के नाम से मनेर में स्थित है। आज इस्लाम में जो नमस्कार और सलाम करने की जो विधि है। अस्सलाम वालेकुम व मूल रूप से सुहारवर्दी संप्रदाय की है वालेकुम सलाम। इसी के तहत ही फिरदौसी संप्रदाय सुहारवर्दी की एक शाखा है।
बिहार की धरती वीरों की धरती है और ऐसे में सिख धर्म के दशमेश गुरु श्री गुरु गोविंद सिंह जी महाराज की यह जन्म धरती भी है। आपका जन्म 22 दिसंबर 1666 को पटना में भी हुआ था। आज यहां हम तख्त हरमंदिर गुरुद्वारा देख सकते हैं।
1757 में प्लासी के युद्ध के बाद और खासकर बक्सर का युद्ध जो 1764 में होता है उस समय से बिहार बंगाल और उड़ीसा की दीवानी अंग्रेजों को मिलती है,और अब बिहार से मुगलों का वर्चस्व समाप्त होता है और यहीं से अलग तरह की कहानी प्रारंभ होती है।
स्वतंत्रता की लड़ाई में प्रथम अप्रतिम योद्धा फतेह बहादुर शाही, बाबू कुंवर सिंह, पीर अली, अमर सिंह को कौन भुला सकता है। वहीं बिहार के गांधी जगलाल चौधरी, जननायक कर्पूरी ठाकुर, संपूर्ण क्रांति के जनक जय प्रकाश नारायण, डॉ राजेंद्र प्रसाद,मौलाना मजरूल हक, नारायण सिंह, ब्रज किशोर प्रसाद,जे.पी. कृपलानी, जैसे कितने नेताओं को याद किया जा सकता है। यह बात हमें माननी पड़ेगी कि वर्तमान समय में सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से बिहार की सांस्कृतिक धरोहर का क्षरण हुआ है।
बिहार में प्रमुख रूप से भोजपुरी, मगही और मैथिली बोलियों में होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रम अब केवल सरकारी धरोहर बन कर रह गए हैं।नई पीढ़ी को अपने सांस्कृतिक धरोहर में कोई उत्साह नहीं है लड़कियां मांगलिक कार्यक्रमों में होने वाले गीत को भुला चुकी हैं।
मैथिली में कहा गया है
“पग-पग पोखरी माछ मखान
सरस बोली मुस्की मुख पान
विद्या वैभव शांति प्रतीक
ललित नगर दरभंगा थीक”।
बिहार के विरासत की मूल्य क्षीण हुई है। वह मूल्य जिन्होंने बिहार के वैभव को निर्मित किया है वह आज दिखाई नहीं पड़ती। आज बिहार में सारे संसाधन बाहर से आते हैं, स्थिति यहां तक है कि सरकार भी केंद्र के ऊपर निर्भर है।
हमारे जीवन में नकारात्मकता इतना बढ़ गया है इसे हम निकाल नहीं पा रहे हैं और इसलिए विकास कहीं ना कहीं अवरुध्द हुआ है। बिहार का वैभव एक टावर के रूप में स्थापित हो गया है। हम केवल वैभव की चर्चा करते हैं लेकिन वह वैभव कैसे प्राप्त हुआ है उसके लिए कितने लोगों ने अपनी आहुति दी है, उस कदम पर हम नहीं चला करते हैं।
आज हम उपभोक्ता बाजार हो गये है। इन सभी से निजात पाने के लिए हमें अच्छे नेतृत्व की आवश्यकता है। विडंबना यह है कि जिन्हें अपने को बदलना होता है वह बिहार से बाहर चले जाते हैं। जबकि बच्चों के मस्तिष्क में अच्छी बातों को भरना होगा जिससे वह हमारे प्रांत, जिले का नाम रोशन करें। क्योंकि आप अध्ययन करेंगे तो पाएंगे कि बिहार ने पूरे भारत का ही नहीं विश्व का भी विकास किया है।
इसे आप प्राचीन युग, मध्यकालीन युग और वर्तमान युग में भी देख सकते हैं। यहां के लोग कहां नहीं गए,आज पूरे भारत में बिहार के श्रमिक विनिर्माण क्षेत्र में लगे हुए हैं। पूरे देश में आईएएस अधिकारी बिहार के हैं। कई राज्यों में बिहार के शिक्षक बच्चों को पढ़ाने का काम कर रहे हैं।
हम बिहार रहवासी तब तक विकास नहीं कर सकते जब तक हम अपने अतीत को समझ नहीं लेते है। क्योंकि जिस समाज को अपने अतीत की जानकारी नहीं होती वह भविष्य में क्या करेगा इसकी भी उसे कोई सूचना नहीं होती। हमारा भूतकाल काफी गौरवशाली रहा है यहां तक कि हमारे जिले का भी विगतयुग ऐसा है जिस पर हम गर्व कर सकते हैं।
हमें सबसे पहले नई पीढ़ी को स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों को, महाविद्यालय में अध्ययन करने वाले छात्रों को बिहार के भूगोल, सभ्यता, सांस्कृतिक विविधता व सामाजिक ताना-बाना को बताना होगा। उन्हें अध्यापकों द्वारा इसकी अच्छी शिक्षा देनी होगी तभी हमारा बिहार आगे बढ़ सकता है, विकसित राज्य बन सकता है।
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