स्वतंत्रता सेनानी पंडित विश्वनाथ शर्मा की 47वीं पुण्यतिथि पर नमन
घोर उपेक्षा के घटाटोप अँधियारे में भुला दिये गये निष्प्रीह सरल स्वतंत्रता सेनानी पंडित विश्वनाथ शर्मा
सीवान में आन्दर प्रखंड अंतर्गत अर्कपुर गांव के लाल व स्वत्रंता सेनानी पं. विश्वनाथ शर्मा
श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

अपनी पूर्वजों के कार्य को भुला देना हमारी नियति बन चुकी है परन्तु इन पूर्वजों ने राष्ट्र के लिए अपने कर्तव्य निष्ठा से हमें स्वतंत्रता प्रदान की है। इन्हीं में से एक सीवान के लाल पंडित विश्वनाथ शर्मा थे।
आप मूल रूप से आन्दर प्रखण्ड में ग्राम अर्कपुर के थे। पराशर ऋषि के कुल-परम्परा में श्रद्धेय पं० नवजादिक पाण्डेय के यहाँ माता अतिराजो देवी के गर्भ से 19-08-1909 ई० को धराधाम पर इस महामानव का आगमन हुआ। अपने संघर्षपूर्ण जीवन-काल में वे जनमानस में आदर के साथ “शर्मा जी” उपनाम से विख्यात रहे। पराधीन भारत के स्वाधीनता आन्दोलन में इन्होंने क्या-कुछ नहीं खोया ? तीन-तीन मासूम पुत्रोंकी परवरिश उनकी मां के भरोसे छोड़ कूद पड़े थे आन्दोलन की दहकती ज्वाला में।

प्रथम राष्ट्रपति “देशरत्न” डॉ राजेन्द्र प्रसाद जी के साथ भूमिगत रहे, लाठियां खाये, जेल गये, और अन्ततः सन् 1942 में घर को तब आग के हवाले भी कर दिया गया जब इन्हें पटना जेल में रखा गया था। ईश्वरीय प्रेरणा से घर “स्वाहा” होने के कुछ क्षण पूर्व ही माता रामकली देवी अपने मासूम बच्चों को ले सुरक्षित बाहर निकल चुकी थीं। देश स्वाधीन होते ही आचार्य विनोबा भावे के आह्वान पर “राष्ट्रीय कांग्रेस” की सदस्यता का परित्याग कर “भूदान आन्दोलन” से जुड़ भूमिहीन एवं दलितों के कल्याणकारी कार्यक्रमों में स्वयं को अर्पित कर दिये और फिर प्रारम्भ हो गयी देशाटन व पदयात्रा प्रधान इनकी यायावरी-जीवन प्रणाली ….. ।
आजीवन खादी परिधान व चर्महीन काष्ठ निर्मित पादुका का ही व्यवहार करते रहे। इसी अवधि में तत्कालीन समाज ने इनके आध्यात्मिक स्वरूप का भी स्पष्ट दर्शन किया। नित्य-प्रति सुबह-शाम ईश्वरनाम संकीर्तन में आप तल्लीन रहा करते थे। हालांकि परम कृपालु ईश्वर के प्रति इस आस्था की नींव तो वर्षों पूर्व ही पड़ चुकी थी, जब जेल से छुटने के बाद आप अपने परिजनों को जीवित व सुरक्षित देख लिये थे।

स्वाधीन भारत में अपने गैर राजनीतिक जीवन में भी तबाही ने इनका पीछा नहीं छोड़ा। सत्ता सुख की चकाचौंध से कोसों दूर रहनेवाले ऋषि परम्परा के इस गृही संन्यासी को भारतीय इतिहास में कलंकित “आपातकाल” के दौरान भूदान सम्बन्धी पदयात्रा व कार्यक्रम में अकारण बिना किसी आक्षेप के ही तत्कालीन वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा मौके पर ही गिरफ्तार कर इन्हें सीवान कारा में डाल दिया गया।
सुनते हैं “साधुओं पर संकट पड़ने से शुभ दिन आते हैं”। विचित्र हलचल हुई, सम्पूर्ण सारण मण्डल में इस दुर्नीति की पुरजोर भर्त्सना हुई। परम श्रद्धेय “शर्मा जी” की गिरफ्तारी के विरोध में भड़के छात्र आंदोलन की दहकती ज्वाला को शान्त करने हेतु विशेष प्रशासनिक हस्तक्षेप पर जनहित में इन्हें अगले ही दिन बाइज्जत रिहा करना पड़ा। ऐसे निष्प्रीह महान स्वतंत्रता सेनानी की स्मृति में स्थानीय इनके ग्रामीण, प्रखण्डीय, जिला या प्रान्तीय स्तर पर किसी स्मृति चिह्न का आजतक निर्माण नहीं किया जा सका है। केेवल आन्दर प्रखण्ड कार्यालय परिसर स्थित शिलापट्ट पर इनके नामांकन है। आज ऐसे महान स्वतंत्रता सेनानी की 47वीं पुण्यतिथि पर निस्सीम आकाश के अनन्त विस्तार जितना ….. सश्रद्ध अशेष नमन !
आभार- श्रीनिवास मिश्रा, दया छपरा, रघुनाथपुर, सीवान
