सीवान के लाल चन्द्रशेखर पुन: याद आये!
चन्द्रशेखर प्रसाद ने जेएनयू से एम. फिल की पढाई की थी
29 वीं पुण्यतिथि पर विशेष आलेख
✍🏻 राजेश पाण्डेय
श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

बिहार में सीवान के लाल चंद्रशेखर प्रसाद की जेएनयू से एम.फिल का लघु शोध प्रबंध विषय ‘वंचित आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति: भोजपुरी प्रक्षेत्र की विदेसिया नाटय- रूप का परीक्षण’ था।
चंद्रशेखर प्रसाद का जन्म 20 सितंबर 1964 को हुआ था। माता कौशल्या देवी, पिता जीवन प्रसाद बिहार में सीवान जिले के नगर के समीप बिंदुसार बुजुर्ग गांव के रहने वाले थे। चंद्रशेखर का जन्म मथुरा में हुआ क्योंकि आपके पिता तत्कालीन समय में वहां वायु सेना में पदस्थापित थे। 11 जनवरी 1972 में हृदयाघात होने के कारण गांव पर ही पिता जीवन प्रसाद का देहांत हो गया। गांव से स्कूली शिक्षा के बाद चंद्रशेखर का नामांकन सैनिक स्कूल तिलैया झारखंड में कराया गया, फिर पुणे स्थित राष्ट्रीय रक्षा का अकादमी (एनडीए) में दाखिला लिया, परन्तु दो वर्ष बाद इसे छोड़ दिया और पटना विश्वविद्यालय में नामांकन के लिए आए लेकिन नहीं लिया और सीवान के ही डी.ए.वी महाविद्यालय में राजनीति विज्ञान से स्नातकोत्तर किया।
बकौल चन्द्रशेखर “हम एक ऐसा देश चाहते हैं जहां प्रत्येक कोई खुश हो, जब तक कोई ईमानदार ईमानदारी से नहीं भटकता वह घर, पैसे गाड़ी नहीं खरीद पाता।”चंद्रशेखर 1989 में दिल्ली आए और जेएनयू के सेंटर फॉर पॉलीटिकल स्टडीज में स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में भाग लिया। सेंटर के पॉलिटिकल स्टडी स्कूल आॅफ सोशल साइंसेज में एम.फिल में प्रवेश लिया।
डॉ. किरण सक्सेना के निर्देशन में 1993 में ‘वंचितों की आकांक्षा के अभिव्यक्ति: भोजपुरी प्रक्षेत्र की बिदेसिया नाटक का परीक्षण’ शीर्षक से अपना शोध प्रबंध प्रस्तुत किया। इसके बाद पीएच.डी हेतु नामांकित हुए। आपके शोध का विषय था ‘हिंदी क्षेत्र में भारतीय पुनर्जागरण की समस्या’।चंद्रशेखर 1995 में दक्षिण कोरिया के सियोल में अंतरराष्ट्रीय युवा सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व किया था। वे 1997 में अपने पीएचडी के लिए आगे बढ़े थे।वे अपने गृह जिला सीवान लौटे और की सीपीआई (एम.एल)पार्टी में जिला समिति के सदस्य बने।

उनकी कविता में संवेदनात्मक निर्मित एवं मनुष्य के दुःख एवं उसकी असहायता को लेकर सरोकार गहरे थे, इसकी चर्चा मिलती है। सीवान में 02 अप्रैल 1997 को बिहार बंद करने का आह्वान 31 मार्च 1997को श्याम नारायण यादव ने चंद्रशेखर प्रसाद कर रहे थे उसी समय नगर के जेपी चौक के निकट अंधाधुंध गोलीबारी में चंद्रशेखर, श्याम नारायण यादव, भृगुशरण पटेल, रामदेव राम सहित अन्य आमजन मारे गए। ग़ौरतलब है कि सीवान सांसद श्रीमती विद्यालक्ष्मी देवी के पति व तत्कालीन माले नेता रमेश कुशवाहा ने नगर थाना में प्राथमिकी संख्या 54/1997 से हमलावरों के विरुद्ध मामला दर्ज कराया था।
चंद्रशेखर ने अपने लघु शोध प्रबंध में मूल रूप से भोजपुर क्षेत्र के वंचित वर्गों के बीच के प्रति संवेदनशील, सामंतवादियों एवं उपनिवेशवादियों द्वारा किए गए अन्याय एवं अत्याचार को घोर विरोध का विषय बनाया था।
पुस्तक तीन अध्याय में विभाजित होकर 135 पृष्ठों में संकलित है। शोध प्रबंध के लिए उन्होंने सारण पर उपलब्ध तथ्यों का अध्ययन करते हुए जातिगत एवं आर्थिक सामाजिक स्थितियों का विश्लेषण किया। भूमि और जमींदारी संबंधी कागजातों का अध्ययन किया। उन्होंने अपने अध्ययन में पाया कि सारण के किसान व वंचित वर्गों द्वारा कोई भी भीषण प्रतिरोध की चर्चा नहीं है। शोध हेतु अध्ययन सामग्री की टोह में इतिहास की पुस्तकों से हटकर उन्होंने साहित्य के किताबों का अध्ययन किया।
इसके लिए चंद्रशेखर ने लोकप्रिय संस्कृति का लोक साहित्य को अपने अध्ययन का विषय बनाया। संस्कृति, जन संस्कृति एवं लोकप्रिय संस्कृति के गहन अध्ययन के बाद लेखक ने यह तथ्य प्रस्तुत किया कि बिदेसिया जन संस्कृति के साथ संबंध है, जो उनके आकांक्षाओं , आशाओं एवं मूर्खताओं को अभिव्यक्त करता है। भिखारी ठाकुर की विदेशिया कृति सारण ही नहीं भोजपुरी क्षेत्र के भूगोल, इतिहास, अर्थव्यवस्था एवं सामाजिक-सांस्कृतिक परिदृष्टि का द्योतक है। चंद्रशेखर का मानना है कि भिखारी ठाकुर की बिदेशिया राजनीति का निर्धारक है जो संस्कृति के द्वारा अभिव्यक्त होती है।
तत्कालीन समय में भोजपुरी क्षेत्र के केवल सारण से दो लाख प्रवासी थे। उक्त बिदेशिया कृति में चार पात्र हैं- विदेशी ब्रह्म है, धर्म के रूप में बटोही है तो रखेलीन माया है, वही जीव के रूप में प्यारी सुंदरी है।बिदेसिया के माध्यम से वंचित वर्गों का अपने परिवेश के साथ जुड़ाव एवं दुराव देखा जा सकता है। बिदेसिया सामंती व्यवस्था के विरुद्ध सामाजिक प्रतिरोध का हथियार था। विदेसिया की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति परिहार रूपी प्रतिरोध है।
बिदेशिया के माध्यम से चंद्रशेखर भोजपुरी क्षेत्र की सांस्कृतिक राजनीति को परिभाषित करते हैं, जो वंचित वर्गों एवं राजनीतिक अभियानों के बीच की एक कड़ी है, जो इतिहास निर्माण करते हैं। बिदेशिया का जन्म प्रवासन से हुआ है। पलायन भोजपुरी क्षेत्र में लगभग सौ वर्षों तक उपनिवेशक युग में एक परिघटना थी जो आज तक बनी हुई है।
बिदेसिया लोकप्रिय संस्कृति थी क्योंकि यह रचना औद्योगिक क्रांति की उपज थी, जो यूरोपियों के माध्यम से भारत के कई क्षेत्रों में प्रवेश कर गई थी। क्योंकि लेखक का कहना है कि बिदेसिया पूर्णतः पारंपरिक लोक संस्कृति नहीं था क्योंकि जब उत्पादन में एक बाजार को जन्म दिया तो इस प्रकार की सांस्कृतिक क्षेत्र उभर कर सामने आए। उन्होंने अपने विश्लेषण में रखा की लोकप्रिय संस्कृति के पूर्व लोक संस्कृति थी एवं लोक संस्कृति के बाद जन संस्कृति आई।
बिदेशिया संस्कृति का अभिव्यक्ति का अति लोकप्रिय रूप है। निम्न मध्य वर्ग किसान नहीं है, क्रांतिकारी नहीं है लेकिन पुरातनपंथी हैं। वे अपने वर्तमान का नहीं, वरन भविष्य की हितों की रक्षा करते हैं। बिदेशियों ने कोलकाता जैसे महानगरों में उभरते हुए मध्यम वर्गों पर अपनी पकड़ बनाई।
बिदेशिया परिहार रूपी प्रतिरोध की एक विद्या है। मतलब संस्कृति के क्षेत्र में एक कृत्य है जो क्रांतिकारी नहीं है। क्योंकि यह संचेतन प्रयास से निर्मित होता है जो सत्ता की स्थानीय व्यवस्था से लड़ता है।बिदेशिया एक राजनीतिक विद्या नहीं बन सकी, बल्कि इसे प्रतिकार के संस्कृतिक विद्या का रूप लेना पड़ा।
तृतीय अध्याय में चंद्रशेखर प्रसाद भिखारी ठाकुर के नाटकों का विश्लेषण करते हैं। इस नाटक में विदेशी- ब्रह्म, बटोही- धर्म, रखेलीन- माया एवं प्यारी- सुंदरी जीव है। शोध में विश्लेषण किया गया है कि जैसे एक पति अपनी पत्नी को छोड़कर विदेश चला जाता है, उस तरह परमात्मा भी आत्मा को छोड़ देता है। रखेलीन स्त्री के कारण बटोही धर्म की मध्यस्था से ही आत्मा-परमात्मा से मिलती है। यहां सिद्ध किया गया है कि धर्म झूठी चेतना है और रोजमर्रा के जीवन में अन्तर्निहित नहीं है।
बिदेशिया विद्या समाज की आंतरिक बेचैनी को संबोधित करने और कभी-कभी स्पष्ट समाधान प्रस्तुत करने की साहस करती है। उसे एक राजनीतिक धार देती है। विदेसिया पुरानी व्यवस्था एवं नए विकास को उकेरा है। लेखक उधृत करते हैं कि भोजपुरी क्षेत्र में वंचित वर्गों का एक विरोध ब्राह्मणवादी संस्कृति से था तो दूसरी ओर नगर के जीवन मूल्यों को चुनौती देने वाली व्यवस्था से भी था। साथ ही बिदेसिया के माध्यम से वंचित वर्गों का अपने परिवेश से जुड़ाव एवं दुराव बताया गया है।अंततः बिदेसिया प्रभुत्व के कारण आधिपत्य विरोधी स्वर की बात करता है।
चंद्रशेखर प्रसाद के लघु शोध प्रबंधन में समस्या है। समस्या का नए ढंग से रूपांतरण किया गया है। परन्तु समस्या का समाधान नहीं है। सामंत एवं उसके द्वारा वंचितों के विरुद्ध संघर्ष को मार्क्सवाद के फलक पर विश्लेषित करने का प्रयास किया गया है। इस पर एक कहानी याद आती है की छात्र को परीक्षा में नदी पर लेख लिखने को आ गया जबकि वह लेख हाथी पर याद करके गया था, अब उसने थोड़ा सा परिचय नदी का देते हुए उस नदी में हाथी को खड़ा कर दिया और पूरा लेख हाथी पर लिख दिया। कुछ ऐसा ही चंद्रशेखर ने किया है। परन्तु कोई आलोचना नहीं करेगा क्योंकि शोध प्रबंध जेएनयू का है।
शोध अंग्रेजी में है, शोध समाजवादियों, जनवादियों व मार्क्सवादियों का मुख्य विषय वंचित वर्ग पर है, इसलिए सारा शोध स्तरीय लेखन की दृष्टि से सर्वोच्च करार दिया गया है।
यहां धर्म भेद के रूप में आता है। आत्महत्या करना, सतीदाह करना प्रायश्चित के नाम पर किसी को जीते जी जला देना, कानों में गर्म सीसा पिघला कर डालना, पशु बलि करना, तीर्थ स्थान पर पांडवों एवं पुजारी द्वारा अमानुषिक कृत्य, देवदासियों के नाम पर स्त्रियों से अत्याचार दर्शाया जाता है। जिस दिन हमारे समाज में पंडित-पुरोहितों का धर्म विदा हो जाएगा, उसी दिन यह तपोभूमि भारत वर्ष मानवता का कल्याण करने के लिए विश्वविद्यालय के समान हो जाएगा।
भारतीय संस्कृति को हतोत्साहित करने एवं सारण क्षेत्र में बहुत बार संघर्ष को उभारने की पुरजोर चेष्टा लेखक करता है। परन्तु सफलता नहीं मिलती। महानगर से उपजी सामाजिक कुरीतियां गांव तक पहुंच गई हैं। इसका निदान सभी अपने-अपने स्तर पर कर रहे थे। इस कड़ी में भिखारी ठाकुर ने नाटक लिखकर समस्या समाधान में योगदान दिया।
शोषित व शासित, वंचित व बुर्जुआ, धर्म व अधर्म का भेद निकालते- निकालते यह लघु शोध पूर्ण हो जाता है।
बहरहाल बिदेसिया नाटक का एक आयाम से विश्लेषण अपने आप में अंगूठा है। मुझे कुछ अलग करना था, अपने सारण को आधार बनाकर कर दिया है।
