बिहार में आगे भी चलेगा नीतीश मॉडल
श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

बिहार में 15 अप्रैल को बनने जा रही भाजपा नेतृत्व वाली सरकार किसी बड़े प्रयोग के बजाय निरंतरता का रास्ता चुनती दिख रही है। संकेत साफ हैं कि सत्ता का चेहरा बदले, लेकिन शासन की दिशा वही रहेगी, जो वर्षों से नीतीश कुमार ने तय की है। भाजपा बिहार में चौंकाने वाले फैसला लेने से बचते हुए स्थापित सामाजिक और राजनीतिक संतुलन को बनाए रखने पर जोर दे रही है और इसके केंद्र में सम्राट चौधरी का नाम उभर रहा है।
कौन बनेगा मुख्यमंत्री?
नई सरकार में सम्राट की भूमिका की आधिकारिक घोषणा भले बाकी हो, लेकिन शीर्ष सूत्र स्पष्ट संकेत दे रहे हैं कि उन्हें आगे बढ़ाकर भाजपा यह संदेश देना चाहती है कि शासन नीतीश मॉडल पर ही आगे बढ़ेगा। यह रणनीति केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक समीकरणों को साधने का प्रयास भी है।
बिहार की राजनीति में कुर्मी-कोइरी (लव-कुश) गठजोड़ लंबे समय से निर्णायक रहा है। इसी समीकरण के सहारे लालू प्रसाद के मुस्लिम-यादव (माय) आधार को चुनौती मिली थी।
भाजपा अब उसी सामाजिक फार्मूले को नए नेतृत्व के साथ बनाए रखना चाहती है।दरअसल, भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल सरकार बनाना नहीं, बल्कि नीतीश कुमार के स्थिर वोट बैंक को अपने साथ बनाए रखना है। यह वोट बैंक विपरीत परिस्थितियों में भी उनके साथ खड़ा रहा है। ऐसे में पार्टी कोई भी ऐसा कदम नहीं उठाना चाहती, जिससे यह संतुलन बिगड़े।सम्राट चौधरी इस लिहाज से उपयुक्त माने जा रहे हैं, क्योंकि वे कोइरी समुदाय से आते हैं और लव-कुश समीकरण को मजबूती देते हैं।
भाजपा के एक शीर्ष नेता ने बताया कि पार्टी की रणनीति सत्ता परिवर्तन को ‘सिस्टम चेंज’ की बजाय ‘लीडरशिप ट्रांजिशन’ के रूप में पेश करने की है। यानी सरकार का चेहरा बदलेगा, लेकिन नीति, सामाजिक संतुलन और शासन शैली में निरंतरता बनी रहेगी।सम्राट चौधरी का राजनीतिक सफर भी इस सोच को बल देता है। पिछले नौ वर्षों में वे भाजपा के प्रमुख चेहरों में शामिल हुए हैं और संगठन व सरकार में अपनी उपयोगिता साबित की है।
नेता प्रतिपक्ष से लेकर डिप्टी सीएम तक की भूमिकाओं में उन्होंने सहयोगी दलों के साथ संतुलन बनाए रखा और नीतीश कुमार के भरोसेमंद भी बने रहे। भाजपा नेतृत्व ने भी उन्हें इसी संतुलन को बनाए रखने की जिम्मेदारी दी थी, जिसे उन्होंने प्रभावी ढंग से निभाया।
यही कारण है कि जो नेता कभी नीतीश के आलोचक थे, वही अब उनके करीबी माने जाते हैं।नीतीश कुमार ने भी समय-समय पर सम्राट को लेकर सकारात्मक संकेत दिए हैं। अपनी ‘समृद्धि यात्रा’ के दौरान उन्होंने कई मंचों से उन्हें भविष्य का नेता बताया। इससे उनके समर्थकों के बीच संदेश गया कि नेतृत्व परिवर्तन के बावजूद नीति की दिशा में कोई बड़ा बदलाव नहीं होगा।
भाजपा की सामाजिक विस्तार की रणनीति भी इस निर्णय में महत्वपूर्ण है। पार्टी ‘सर्वसमाज’ की बात करते हुए पिछड़े वर्ग को केंद्र में रखना चाहती है। बिहार में यादवों के बाद कुशवाहा जाति की बड़ी आबादी है, जिसका प्रतिनिधित्व सम्राट करते हैं। ऐसे में लव-कुश समीकरण को बनाए रखना भाजपा के लिए राजनीतिक रूप से फायदेमंद माना जा रहा है।
जदयू की भी इच्छा है कि सत्ता परिवर्तन में नीतीश कुमार की सहमति और संतुलन बना रहे। इसलिए मुख्यमंत्री का चेहरा ऐसा हो, जिसमें उनकी पसंद झलके। सम्राट चौधरी इस कसौटी पर खरे उतरते नजर आते हैं।
नई सरकार के गठन के फार्मूले के बाद सबसे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि अगला विधानसभा अध्यक्ष कौन होगा? वर्तमान में भाजपा कोटे से डाॅ. प्रेम कुमार विधानसभा अध्यक्ष हैं। राजनीतिक गलियारे में यह चर्चा है कि भाजपा कोटे से मुख्यमंत्री होने के बाद जदयू द्वारा विधानसभा अध्यक्ष के पद पर दावेदारी की जा सकती है।
हाल के दिनों में एनडीए में यह परंपरा रही है कि जदयू से मुख्यमंत्री रहे हैं तो विधानसभा अध्यक्ष भाजपा का रहा है।
तब दोनों पद थे जदयू के पास
मुख्यमंत्री का नाम 14 अप्रैल तक तय होने के बाद साथ ही साथ नए विधानसभा अध्यक्ष का नाम तय हो जाएगा। हाल के दिनों में एनडीए सरकार में यह परंपरा रही है कि एनडीए में विधानसभा अध्यक्ष का पद भाजपा को मिलता रहा है।यह स्थिति तब थी जब मुख्यमंत्री जदयू से थे। इसी फाॅर्मूले के तहत नंदकिशोर यादव, विजय कुमार सिन्हा और डाॅ. प्रेम कुमार विधानसभा अध्यक्ष बने।
नीतीश कुमार ने जब महागठबंधन के साथ मिलकर सरकार बनाई तो राजद के अवध बिहारी चौधरी को विधानसभा अध्यक्ष बनाया गया।वैसे आरंभिक दिनों में बिहार में जब एनडीए की सरकार बनी तो सीएम और विधानसभा अध्यक्ष दोनों जदयू से थे। इस क्रम में जदयू कोटे से उदय नारायण चौधरी दो बार विस अध्यक्ष रहे। विजय चौधरी भी एक टर्म विधानसभा अध्यक्ष रहे।
जदयू की चाहत दो अन्य महत्वपूर्ण पदों की भी
विधानसभा अध्यक्ष पद को ले एनडीए में जदयू ने अपनी चाहत को स्पष्ट कर दिया है। इसके अलावा जदयू की इच्छा यह है कि गृह विभाग का जिम्मा भी उसके पास रहे।
पूर्व में मुख्यमंत्री रहते हुए लंबी अवधि तक गृह विभाग का जिम्मा नीतीश कुमार के पास था। बाद में नई सरकार के गठन के बाद यह विभाग उप मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के पास चला गया।इस संदर्भ को केंद्र में रख जदयू यह चाहता है कि गृह विभाग जदयू कोटे से जाे दो उप मुख्यमंत्री होंगे उन्हें दिया जाए। दो उप मुख्यमंत्री के रूप में विजय चौधरी व निशांत का नाम चर्चा में है।
विजय चौधरी के उप मुख्यमंत्री बनने की स्थिति में विधानसभा अध्यक्ष का पद जदयू के किसी अतिपिछड़ा वर्ग के नेता को जा सकता है।
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