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संवेदना सच्ची हो तो हृदय में उतर जाती है- राहुलजी 

संवेदना सच्ची हो तो हृदय में उतर जाती है- राहुलजी 

राहुल सांकृत्यायन की जयंती पर विशेष

महापंडित राहुल सांकृत्यायन
9 अप्रैल 1893 — 14 अप्रैल 1963

श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

संविधानसभा ने अपने सच्चे हृदय और विवेक से भारत के भविष्य के लिये लोकतन्त्र के मार्ग का वरण किया था, किन्तु महात्मागान्धी की मृत्यु के बाद जनता के बीच कोई इतना सशक्त विचारक और मार्गदर्शक नहीं रहा,जो सरकार तथा जनता : दोनों से खरी-खरी कह सके। इसलिये सरकार तथा जनता में जो सामन्ती- मानसिकता के अवशेष थे, वे बने ही रहे ! सत्ता में जो थे, वे चाहते थे कि दरबार लगे और जो साहित्य में लगे हुए लोग थे, वे दरबार में जाने को पहले से ही आतुर बैठे थे।एक नये तरीके का दरबारी- युग आ गया और आकर के फ़िर गया नहीं, जम गया।

यद्यपि इस अन्तराल में महापंडित राहुल सांकृत्यायन जैसे स्वाभिमानी कवि- साहित्यकार भी मौजूद थे, जिन्होंने स्वयं आजादी की लडाई लड़ी थी, जेलयात्रा की थी, यातना सही थी लेकिन दरबारी-पन से उन्हें नफरत थी। स्वतन्त्रविचारक थे।

महापंडित राहुल सांकृत्यायन श्रीलंका में विश्वविद्यालय के सम्मानित प्रोफेसर बने तो क्या भारत-सरकार उन्हें अपने देश में प्रोफेसर नहीं बना सकती थी? उनकी जोड का आचार्य था कौन ? [ तुलना की बात नहीं है, श्रमसाधना और प्रतिभा को सम्मान देने की बात है } हालाँकि नेहरूजी उनसे भली भाँति परिचित थे, साहित्य- अकादमी में महापंडित राहुल सांकृत्यायन पँहुचे तो पं. नेहरू ने इस आत्मीयता के साथ उनका अभिनन्दन किया। वे उनकी पुस्तकें पढ़ चुके थे। उन्होंने अपने शिक्षामन्त्री से संकेत भी किया था, परन्तु शिक्षामन्त्री बेचारा क्वालिफ़िकेशन पर अटक गया, कैसे बात बनेगी?

श्रीलंका में उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं रहा, आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी तथा राजबलीपांडेय ने उनके सामने प्रस्ताव रखा कि कि वे नागरी – प्रचारिणी वाले विश्वकोश का काम स्वीकार कर लें, वे मान भी गये और चाहने भी लगे कि यह काम उन्हें मिल जाय।

यह निर्णय भारत के तत्कालीन गृहमन्त्री को करना था, लेकिन वहां दरबारी पहले से ही लगे थे। राहुलजी को काम नहीं मिला।
राहुलजी आर्थिक संकट में थे, प्रकाशक से उन्होंने 500 रुपये महीने मांगा था, उसने 2-4 महीने दे करके हाथ खींच लिया।

इन बातों का ध्यान आता है, तो आज का यह साहित्यिक-परिदृश्य रीतिकाल का स्मरण करा देता है, यों क्रान्ति का मुखौटा लगा कर राजवैभव और सत्ता का आनन्द लेने वाले तथा क्रान्तिकारी दिखने वाले बहुत से आये थे, लेकिन दिखने और होने में बड़ा अन्तर है। जो राहुलजी को इसलिए निकाल दे कि वे पार्टी लाइन पर चलें , वह काहे का जनवाद? आज का मार्क्सवादी -समीक्षक?

भारत की संस्कृति के नाम से ही उसे न जाने क्या ऐलर्जी हो जाती है?

और जो राहुलजी के द्वारा किये गये भारत के अनुसंधान को न समझ सके, वह काहे का संस्कृतिवाद? राहुलजी का जीवन ही भारत की सांस्कृतिक-थाती को सहेजने में समर्पित रहा।

राहुलसांकृत्यायन ने अपनी “विश्व की रूपरेखा ” में हेराक्लीज के साथ आर्यभट्ट, कोपर्निकस के साथ भास्कराचार्य, सापेक्षता-सिद्धान्त के साथ शून्य के साथ कालजयी हो गए आर्यभट्ट तथा धर्मकीर्ति आदि की भी चर्चा की है।

भारत का कितना हस्तलिखित साहित्य वे तिब्बत से लेकर के आये? कुछ लोग वैज्ञानिक दृष्टिकोण का कोलाहल करते हैं, वैज्ञानिकदृष्टिकोण का प्रयोजन यदि लोकजीवन नहीं है तो काहे का वैज्ञानिक दृष्टिकोण।

राहुलजी की साहित्य साधना या तपस्या की सबसे बड़ी उपलब्धि उनका लोकोन्मुखी दृष्टिकोण है। उन्होंने न कभी सामान्य जन को भुलाया, न परम्परा को, न समष्टिभाव को और न लोकमंगल को।

१९३३ में गंगा के पुरातत्त्व विशेषांक में महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने एक निबन्ध लिखा था, जिसमें उन्होंने लोकसाहित्य के संकलन की प्रेरणा दी थी और उसके महत्त्व का प्रतिपादन किया था।

हिन्दी में लोकसाहित्य के प्रति जागरण का यह सबसे पहला स्वर था। उन्हॊने स्वयं भी कौरवी के लोकगीतों और लोककथाओं का संकलन किया , जो. “आदि हिन्दी के गीत और कथाएं ” नाम से प्रकाशित हुआ।

उनकी घुमक्कड़ी का प्रयोजन लोकजीवन से जुड़ा हुआ है। काशी नागरी प्रचारिणी सभा ने जब हिन्दी साहित्य के वृहद इतिहास की योजना बनाई तो आपने हिन्दी की लोक भाषाओं और उनके साहित्य का प्रश्न उठाया, परिणाम-स्वरूप सोलहवें खंड को हिन्दी की लोकभाषा और साहित्य पर केन्द्रित किया गया।

उसके प्रधान संपादक राहुलजी ही थे, हालाँकि इस बीच वे चीन की यात्रा पर चले गये थे और डा. कृष्णदेव उपाध्याय को अपना सहायक नियुक्त कर दिया था।

इस ग्रन्थ में उन्होंने कुलुई, चंबियाली और काँगड़ी जैसी लोकभाषाओं को भी स्थान दिया था।लोकसाहित्य को लेकर लिखे गये अनेक शोधप्रबन्धों की भूमिका उन्होंने लिखी।

वे लोकसाहित्य की शब्दावली को लेकर बहुत सावधान थे और चाहते थे कि इस प्रकार की शब्दावली के कोश तैयार किये जायें। वे स्वयं भी अपने लेखन में इस प्रकार के शब्दों का प्रयोग करते थे। लोक संबंधी उनका दृष्टिकोण इसके भी आगे बढ़ चुका था, उन्होने लोकभाषाओं को और लोकसाहित्य को जागरण का माध्यम बनाया।

उन्होंने स्वयं भी भोजपुरी में 8 नाटकों की रचना की और उनमें लोकधुन के आधार पर स्वयं भी गीत लिखे। लोक से उनका संबंध अकादमिक ही नहीं था, इस बात को किसान – आन्दोलन में उनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका से जाना समझा जा सकता है।

पंडित विद्यानिवास मिश्र बहुत समय तक महापंडित राहुल सांकृत्यायन के साथ रहे थे। एक दिन वे कुशीनगर गये। वहाँ भगवान्‌ बुद्ध की प्रतिमा है, जिसमें वे महानिर्वाण की मुद्रा में लेटे हुए हैं ।राहुल सांकृत्यायन ने प्रतिमा के चरणों में माथा नवाया। मिश्रजी ने भी नवाया। लेकिन मिश्रजी माथा नवाने के बाद थोड़े मुसका दिये। राहुलबाबा ने उनके मुसकाने को देखा भी और समझ भी लिया, आखिर बाबा कम्यूनिस्ट थे। राहुल बाबा बाहर आकर बोले – पंडित। तुमने सोचा होगा कि मैंने बौद्ध चीवर छोड़ दिया है, बुद्ध का मेरे लिये क्या महत्त्व ?

देखो पंडित ! सच यह है कि मनुष्य कहीं न कहीं झुकना चाहता है, वह भले ही किसी ग्रन्थ के आगे झुके, किसी ढूह के आगे झुके, कहीं भी झुके !झुकने में उसकी हेठी नहीं होती। झुकने के कारण ही उसके मन में ऊंचे उठने का एक नया संकल्प उभर आता है। महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने कहा था कि विगत ढाई हजार साल के अन्तराल में संसार में बुद्ध से बडा कोई विचारक नहीं हुआ, जिसने मनुष्यता को बहुत दूरतक प्रभावित किया। राहुल की लोकोन्मुखी दृष्टि थी।

बहुत से लोग यह सोचते थे कि राहुल जैसा महापंडित क्यों निपट गंवार लोगों के बीच इतना समय नष्ट कर देता है ?

एक दिन विद्यानिवासमिश्र जी ने उनसे पूछ ही लिया, विद्यानिवासमिश्र जी उन दिनों राहुलजी के साथ पारिभाषिक- शब्दावली के काम में लगे थे, युवा थे ।राहुलजी ने ज्ञान का एक सूत्र देते हुए कहा कि – “देखो, हरेक आदमी के पास जीवन का अनुभव होता है, उसमें एक अद्वितीयता होती है और उसे विनम्र भाव से ग्रहण करना चाहिये।”

एक दिन विद्यानिवास मिश्र जी के गांव के एक चाचा उनसे मिलने आये, वे दो दर्जा पास थे, किताब पढ लेते थे।उन्होंने अज्ञेय का उपन्यास “शेखर : एक जीवनी” भी पढा था ।उस दिन वे राहुलजी से बतिया रहे थे कि अज्ञेयजी राहुलजी से मिलने आ गये ।राहुलजी ने अज्ञेयजी के सामने ही गांव के चाचा से पूछा कि आपने ” शेखर : एक जीवनी” पढा है?

उन्हें क्या पता था कि उपन्यास का लेखक सामने ही आया हुआ है, वे बोले -का बताई, अज्ञेय मिलते त उनके दुइ हाथ लगवतीं , शेखर के कहीं क त नाहीं रख लें। राहुलजी खिलखिला कर हंस पडे और अज्ञेयजी मुसकाने लगे ।जब चाचा ऊपर चले गये तब अज्ञेयजी ने कहा कि -देखिये मुझे मंजूरी मिल गयी , इतने कम पढे आदमी तक शेखर संवेदना जगा सका।

राहुलजी ने भी कहा कि संवेदना सच्ची हो तो हृदय में उतर जाती है।

कुछ दिन पहले फ़ेसबुक पर सवाल था कि साहित्यकार जनता की लड़ाई क्यों लड़े ? लेकिन राहुलसांकृत्यायन ने जनता की लड़ाई लड़ी।

राहुल सांकृत्यायन ने भोजपुरी में नाटक लिखा था जोंक। इसमें राहुलसांकृत्यायन ने जमींदार को खून चूसने वाले जोंक के रूप में चित्रित किया था।

दुर्दिनमां के हलक हरान, रे फ़िकिरिया मारलक जान !बैल बेच रजवा के दे लूँ छोड़इ नहिं बेईमान। जमींदार के जुलुम होइबे चेतइ भाइ किसान।

अमवारी में जमींदार के गुंडों ने राहुलबाबा को पीटा था, जमींदार का हाकिमों पर असर था, परिणाम-स्वरूप राहुलजी को जेल की हवा भी खानी पड़ी !जिस साहित्य में जनता की लड़ाई नहीं है, जिस साहित्य में करुणा नहीं है, जिस साहित्य में लोकजीवन की संवेदना नहीं है, वह साहित्य नहीं,कचरा है।

महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने मातृभाषा शीर्षक निबन्ध लिखा था और भारत में लोक भाषाओं के जनतन्त्र का सवाल उठाया था।

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