बैसरन की घास पर 26 बेजान शरीर
श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

तारीख… 22 अप्रैल 2025, लिद्दर नदी अपने शांत बहाव में थी, पहलगाम की बैसरन वैली जिसे मिनी स्विट्जरलैंड कहा जाता है। उस दिन यहां सैकड़ों पर्यटक मौजूद थे। कोई घुड़सवारी कर रहा था, कोई फोटो खींच रहा था, तो कोई अपने परिवार के साथ सुकून के पल बिता रहा था।
पहलगाम की वही शांत वादियां…
जहां कुछ देर पहले तक हंसी गूंज रही थी…
अचानक गोलियों की आवाज़ से कांप उठीं
सुबह 9 बजे…
बैसरन घाटी में भीड़ बढ़ने लगी, लोग घोड़े किराए पर लेकर ऊपर पहुंच रहे थे। मैदान में बच्चे खेल रहे थे, कपल्स फोटोशूट कर रहे थे और स्थानीय लोग सैलानियों को गाइड कर रहे थे। किसी को अंदाज़ा नहीं था कि आसपास के जंगलों में छिपे कुछ लोग इस भीड़ को निशाना बनाने की तैयारी कर रहे हैं।
करीब साढ़े दस से ग्यारह बजे के बीच…
पहली गोली की आवाज़ गूंजी। शुरुआत में किसी को समझ नहीं आया… क्या हुआ है। लेकिन कुछ ही सेकंड में, चीखें और अफरातफरी उस सन्नाटे को तोड़ चुकी थीं। अचानक जंगल की तरफ से 4 से 5 हथियारबंद आतंकी सामने आए। उनके हाथों में AK-47 और M4 जैसे आधुनिक हथियार थे। शुरुआत में लोगों को लगा कि शायद यह कोई मज़ाक है या शूटिंग चल रही है।
हमले के बाद कुछ आई विटनेस के बयान सामने आए….
यह मंजर रूह कंपा देने वाला था। एक पिता अपने बच्चे को सीने से चिपकाए कांप रहा था, एक मां अपने आंचल में अपनी बेटी को छुपाने की कोशिश कर रही थी। आतंकी एक-एक करके लोगों के पास जा रहे थे। जब कोई अपना नाम बताता, तो वे उसकी आंखों में देखते और फैसला करते कि उसे छोड़ना है या उसकी छाती में गोली उतारनी है।
“मेरा नाम…” एक युवक की आवाज लड़खड़ाई। नाम सुनते ही आतंकी के चेहरे पर एक नफरत भरी मुस्कान आई और पलक झपकते ही ट्रिगर दब गया। गोलियों की तड़तड़ाहट और फिर उस युवक का बेजान शरीर बैसरन की घास पर गिर पड़ा। नाम पूछ-पूछकर मारना उनकी उस सोची-समझी साजिश का हिस्सा था, जो नफरत की आग को सुलगाना चाहती थी। कुछ ही मिनटों में 26 ज़िंदगियां खत्म हो गईं और कई जिंदगियां हमेशा के लिए बदल गईं।
अपनी आंखों के सामने आतंकी हमले में पति को खोने वाली कानपुर की एशान्या ने उन्होंने ने पीड़ाभरी आवाज में बताया कि वो आतंकी सवाल कर रहे थे।
मुसलमान हो या हिन्दू…, एशान्या ने आगे बताया कि दो बार पूछने पर हम लोगों ने समझा कि वह आदमी मजाक कर रहा है, लेकिन कुछ ही सेकेंड में उसने शुभम के सिर पर गोली मार दी। वह खून से लथपथ गिर पड़े, वह चीखी। तभी चारों तरफ से गोलियों की तड़तड़हाट सुनाई देने लगी, जिससे पहलगाम गूंज उठा।
चीख पुकार के बीच चारों तरफ लाशें दिख रही थीं। वह शुभम को उठाने में लगी थीं, लेकिन बहन और मम्मी-पापा उन्हें खींचते हुए गेट से बाहर ले गए। कुछ ही देर में सेना के जवान पहुंचे। पति का शव वहां पड़ा रहा। वह बिलखती रही।
क्यों चुना गया पहलगाम?
कल्पना कीजिए एक ऐसी जगह की जहां इंसान अपनी सारी चिंताएं छोड़कर प्रकृति की गोद में सुस्ताने आता है। आतंकियों को इसी ‘सुकून’ से नफरत थी। उन्होंने पहलगाम को अपनी बिसात का केंद्र इसलिए बनाया क्योंकि पहलगाम कश्मीर का वो चेहरा है जिसे पूरी दुनिया जानती है।
आतंकियों का गणित सीधा था… अगर गुलमर्ग या पहलगाम में पत्ता भी हिलता है, तो उसकी गूंज सात समंदर पार सुनाई देती है। वे अपनी ‘मौजूदगी’ का शोर पूरी दुनिया में मचाना चाहते थे। पहलगाम के जरिए वे न केवल सैलानियों को बल्कि उन लाखों श्रद्धालुओं के भरोसे को भी निशाना बनाना चाहते थे जो यहां से गुज़रते हैं।
जो कुछ उस दिन बैसरन घाटी में हुआ, वह अचानक नहीं था। दरअसल, उस खौफनाक दोपहर की पटकथा कई दिन पहले लिखी जा चुकी थी। चुपचाप, बिना किसी शोर के, बिल्कुल अदृश्य तरीके से।
कहानी शुरू होती है 19 अप्रैल से। उस दिन कुछ लोग आम पर्यटकों की तरह बैसरन घाटी में दाखिल होते हैं। उनके कपड़े, उनका हावभाव, सब कुछ सामान्य था। लेकिन उनकी नजरें कुछ और तलाश रही थीं। वे तस्वीरें नहीं ले रहे थे, वे जगह को पढ़ रहे थे। कहां सबसे ज्यादा भीड़ जमा होती है? किस रास्ते से लोग ऊपर आते हैं? और सबसे अहम, हमले के बाद बचकर निकलने का रास्ता कौन सा होगा? दो दिनों तक 19 और 20 अप्रैल यही चलता रहा।
घाटी में पर्यटक घूमते रहे, घोड़े चलते रहे, बच्चे खेलते रहे… और उन्हीं के बीच बिना किसी शक के आतंकियों की रेकी पूरी हो गई। सबसे दिलचस्प और खतरनाक बात यह थी कि इस दौरान उन्होंने अपने ओवरग्राउंड वर्कर तक को पूरी योजना नहीं बताई। यानी प्लान इतना गोपनीय था कि उनके अपने नेटवर्क के लोग भी पूरी तस्वीर से अनजान थे।
फिर आता है 21 अप्रैल हमले से ठीक एक दिन पहले। यहीं पहली बार पर्दा थोड़ा उठता है। आतंकियों ने अपने ओवरग्राउंड वर्कर से संपर्क किया… लेकिन फिर भी पूरी बात नहीं बताई। बस एक छोटा सी कमांड दी गई
“कल… दोपहर को बैसरन पहुंचना।” कोई सवाल नहीं, कोई विवरण नहीं। सिर्फ एक समय और एक जगह।
लेकिन असली खेल तकनीक के स्तर पर चल रहा था। लेकिन असली खेल तकनीक के स्तर पर चल रहा था। जांच में सामने आया कि आतंकियों ने अल्ट्रा-स्टेट कम्युनिकेशन डिवाइस का इस्तेमाल किया।
यह कोई आम फोन कॉल नहीं था। इस डिवाइस के जरिए बिना सिम कार्ड के, बिना ट्रेस हुए, ऑडियो-वीडियो कॉल और मैसेजिंग की जा सकती है।
सुरक्षा एजेंसियों को ऐसे दो संदिग्ध सिग्नल मिलेजो इस बात का सबूत हैं कि पूरी कार्रवाई के दौरान आतंकी लगातार संपर्क में थे, लेकिन लगभग “अदृश्य” तरीके से। यानी, जमीन पर मौजूद आतंकी, आसपास मौजूद ओवरग्राउंड वर्कर और दूर बैठे हैंडलर सब एक अदृश्य नेटवर्क से जुड़े हुए थे।
ऑपरेशन सिंदूर
हमले के बाद जांच शुरू होती है और मामला पहुंचता है राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) के पास। एनआईए के महानिदेशक सदानंद दाते खुद पहलगाम पहुंचते हैं। बैसरन घाटी का दौरा होता है, गवाहों से बात होती है, हर छोटे-बड़े सुराग को जोड़ा जाता है। और फिर एक अहम कड़ी सामने आती है, इस हमले की जिम्मेदारी लेता है द रेजिस्टेंस फ्रंट (TRF), जिसे पाकिस्तान में मौजूद आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा का प्रॉक्सी माना जाता है।
लेकिन पहलगाम की गोलियों की गूंज ज्यादा दिन खाली नहीं रही… जवाब तैयार हो चुका थाऔर वह जवाब आया एक ऑपरेशन के रूप में, जिसका नाम था ऑपरेशन ‘सिंदूर’।
7 मई 2025 की रात करीब 1 बजकर 44 मिनट… भारतीय सेना ने चुपचाप, बिना शोर के, सीमाओं के पार एक ऐसा वार किया जिसने पूरे इलाके का संतुलन बदल दिया।
ऑपरेशन सिंदूर की शुरुआत हुई और निशाना थे वो ठिकाने जहां से भारत के खिलाफ हमलों की साजिशें रची जाती थीं। PIB की प्रेस रिलीज के मुताबिक, नौ आतंकी ठिकानों को टारगेट किया गया और यह कार्रवाई फोकस्ड और गैर-उत्तेजक” रखी गई, यानी किसी भी पाकिस्तानी सैन्य ठिकाने को निशाना नहीं बनाया गया।
यह सिर्फ बदले की कार्रवाई नहीं थी, यह एक संदेश था। सरकार ने साफ किया कि यह ऑपरेशन ‘आतंक के ढांचे को खत्म करने’ के लिए था, न कि युद्ध छेड़ने के लिए।
लेकिन इस ऑपरेशन की असली ताकत सिर्फ मिसाइल या बम नहीं थे, बल्कि उसकी प्लानिंग थी। कई हफ्तों की मल्टी-एजेंसी इंटेलिजेंस के बाद उन ठिकानों की पहचान की गई, जो सीधे द रेजिस्टेंस फ्रंट और उसके मास्टर नेटवर्क लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े थे। बहावलपुर और मुरीदके जैसे इलाकों में मौजूद कैंप्स को निशाना बनाया गया। यानी सीधे उस जड़ पर वार, जहां से आतंक पनपता है।
और फिर सामने आया ऑपरेशन का दूसरा चेहरा, तीनों सेनाओं का एक साथ खेलना। एयरफोर्स ने सटीक एयर स्ट्राइक की, आर्मी ने जमीन पर सुरक्षा और जवाबी कार्रवाई संभाली, और नेवी ने समुद्र से दबाव बनाया। यह एक ‘ट्राई-सर्विस ऑपरेशन’ था। जहां हर मोर्चे पर तालमेल दिखा।
सरकार ने बाद में साफ कहा ये ऑपरेशन आतंक की नर्सरियों को खत्म करने के लिए था। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। ऑपरेशन के बाद पाकिस्तान की तरफ से ड्रोन और मिसाइल हमलों की कोशिशें हुईं। जम्मू से लेकर पंजाब तक कई सैन्य ठिकाने निशाने पर आए। लेकिन भारत की मल्टी-लेयर एयर डिफेंस सिस्टम ने इन्हें हवा में ही रोक दिया।
