शुभेंदु अधिकारी ने बंगाल की राजनीति को द्विध्रुवीय बना दिया,कैसे?
श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

भारतीय राजनीति में महत्त्वाकांक्षा केवल विचारधारा से नहीं चलती, वह संकेतों, चेहरों, पारिवारिक निकटताओं, उत्तराधिकार की आशंकाओं और सत्ता के गलियारों में बदलती हुई कुर्सियों की ध्वनियों से भी संचालित होती है। पश्चिम बंगाल की राजनीति में शुभेंदु अधिकारी और अभिषेक बनर्जी के बीच उभरा अंतर्विरोध इसी जटिल सत्ता-व्याकरण का परिणाम था। यह केवल दो नेताओं की प्रतिस्पर्धा नहीं थी, बल्कि एक क्षेत्रीय दल के भीतर उत्तराधिकार, प्रभाव-संतुलन और राजनीतिक भविष्य की बेचैनी का ऐसा प्रसंग था जिसने बंगाल की राजनीति की दिशा ही बदल दी। मनुष्य लोकतंत्र की बात करता है पर दलों के भीतर अक्सर राजदरबार जैसी संरचनाएँ बना लेता है। फिर आश्चर्य करता है कि असंतोष क्यों जन्म लेता है।
ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस लंबे समय तक एक ऐसे राजनीतिक परिवार की तरह चलती रही जिसमें अंतिम निर्णय का केंद्र केवल एक चेहरा था। लेकिन समय के साथ यह स्पष्ट होने लगा कि पार्टी में नई पीढ़ी का प्रतिनिधि कौन होगा। अभिषेक बनर्जी धीरे-धीरे केवल सांसद या संगठनात्मक नेता नहीं रहे; वे पार्टी की रणनीति, चुनाव प्रबंधन, संसाधन नियंत्रण और राष्ट्रीय विस्तार की परियोजनाओं के केंद्र में आने लगे। यह उभार स्वाभाविक भी था और विवादास्पद भी। किसी भी क्षेत्रीय दल में जब उत्तराधिकार की रेखाएँ स्पष्ट होने लगती हैं, तब पुराने शक्ति-केंद्र असुरक्षित महसूस करने लगते हैं।
राजनीति में असुरक्षा वैचारिक शब्दों में व्यक्त होती है लेकिन उसकी जड़ अक्सर शक्ति-संतुलन में होती है।
शुभेंदु अधिकारी का राजनीतिक व्यक्तित्व बंगाल की जमीनी राजनीति से निर्मित हुआ था। वे आंदोलनकारी छवि वाले नेता रहे, विशेषकर नंदीग्राम आंदोलन के बाद उनकी प्रतिष्ठा अत्यंत बढ़ी। नंदी ग्राम आंदोलन ने उन्हें केवल एक स्थानीय नेता नहीं रहने दिया; वे तृणमूल कांग्रेस के संघर्षशील चेहरे के रूप में उभरे। ग्रामीण बंगाल में संगठन खड़ा करने, कार्यकर्ताओं को जोड़ने और चुनावी मशीनरी को सक्रिय रखने में उनकी बड़ी भूमिका मानी जाती रही। ऐसे नेता स्वाभाविक रूप से यह अपेक्षा रखते हैं कि पार्टी में उनका स्थान केवल उपयोगितावादी न रहे बल्कि निर्णायक भी बने।
यहीं से समस्या प्रारंभ होती है। राजनीति में हर दल सार्वजनिक रूप से सामूहिकता की बात करता है पर भीतर शक्ति का प्रवाह बहुत सीमित हाथों में सिमटता जाता है। शुभेंदु अधिकारी जैसे नेता, जिनकी अपनी जनाधार वाली राजनीति थी, वे यह महसूस करने लगे कि निर्णय प्रक्रिया में उनकी जगह क्रमशः सीमित की जा रही है। दूसरी ओर अभिषेक बनर्जी का प्रभाव बढ़ता गया। यह प्रभाव केवल मीडिया दृश्यता का नहीं था; संगठनात्मक नियुक्तियों, चुनावी टिकटों और रणनीतिक फैसलों में भी उनकी भूमिका बढ़ रही थी। यह स्थिति शुभेंदु अधिकारी जैसे नेताओं के लिए संकेत थी कि भविष्य की पार्टी संरचना कैसी होने वाली है।
राजनीतिक विश्लेषण में यह समझना आवश्यक है कि दलों के भीतर संघर्ष केवल व्यक्तिगत ईर्ष्या से नहीं बनते। कई बार नेता अपने समर्थक समूहों के दबाव में भी प्रतिक्रिया करते हैं। शुभेंदु अधिकारी के आसपास जो राजनीतिक-सामाजिक नेटवर्क था, वह स्वयं को धीरे-धीरे हाशिये पर जाता देख रहा था। बंगाल की राजनीति में जिला स्तर के प्रभावशाली नेताओं का महत्त्व बहुत अधिक है। यदि उन्हें लगता है कि पार्टी का केंद्र बदल रहा है तो वे अपनी सुरक्षा के लिए नए विकल्प तलाशने लगते हैं। यही कारण था कि शुभेंदु अधिकारी का असंतोष केवल निजी भावुकता नहीं था; वह एक पूरे शक्ति-समूह की बेचैनी भी था।
अभिषेक बनर्जी की बढ़ती स्थिति ने इस बेचैनी को तीखा किया। वे युवा थे, आक्रामक थे, तकनीकी और मीडिया प्रबंधन में सक्षम थे, तथा पार्टी के भीतर नई पीढ़ी के प्रतिनिधि के रूप में प्रस्तुत किए जा रहे थे। उनकी शैली पारंपरिक जनांदोलनकारी राजनीति से अलग थी। वे संगठन को अधिक केंद्रीकृत और नियंत्रित ढाँचे में ले जाने की कोशिश करते दिखाई दिए। इससे पुराने क्षेत्रीय क्षत्रपों को लगा कि उनकी स्वायत्तता कम होगी। राजनीति में स्वायत्तता खोना कई नेताओं के लिए अस्तित्व संकट जैसा होता है। विचारधारा पर समझौता हो सकता है, पर प्रभाव क्षेत्र पर नहीं।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि शुभेंदु अधिकारी का राजनीतिक स्वभाव अत्यंत महत्वाकांक्षी रहा है। महत्वाकांक्षा राजनीति में दोष नहीं बल्कि ऊर्जा का स्रोत होती है। समस्या तब पैदा होती है जब किसी नेता को लगता है कि उसकी आगे बढ़ने की संभावनाएँ संरचनात्मक रूप से अवरुद्ध की जा रही हैं। तृणमूल कांग्रेस में ममता बनर्जी के बाद यदि कोई चेहरा लगातार उभर रहा था, तो वह अभिषेक बनर्जी थे। इससे यह संकेत गया कि शीर्ष नेतृत्व का उत्तराधिकार लगभग तय दिशा में जा रहा है। शुभेंदु अधिकारी जैसे नेता के लिए यह स्थिति मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर असुविधाजनक थी।
हालाँकि केवल अभिषेक बनर्जी का उभार ही शुभेंदु अधिकारी के टीएमसी से विचलन का कारण था, ऐसा कहना अधूरा विश्लेषण होगा। राजनीति कभी एक कारण से संचालित नहीं होती। कई समानांतर तत्व मिलकर निर्णय बनाते हैं। उदाहरण के लिए, उस समय बंगाल में भाजपा का उभार तेजी से हो रहा था। भाजपा राज्य में एक बड़े विकल्प के रूप में उभर रही थी और उसे ऐसे नेताओं की आवश्यकता थी जिनके पास जमीनी संगठन हो। शुभेंदु अधिकारी इस आवश्यकता के लिए उपयुक्त थे। दूसरी ओर शुभेंदु को भी लगा कि भाजपा में उन्हें अधिक स्वतंत्र और निर्णायक भूमिका मिल सकती है। राजनीति में अवसरवाद और रणनीति के बीच की रेखा बहुत पतली होती है। नेता उसे “विचारधारा” कहता है, विरोधी उसे “स्वार्थ” कहता है और जनता अंततः चुनाव परिणाम देखकर अर्थ निकालती है।
शुभेंदु अधिकारी का टीएमसी छोड़ना इसलिए भी महत्त्वपूर्ण था क्योंकि वे केवल एक विधायक या मंत्री नहीं थे। वे उस संगठनात्मक ढाँचे का हिस्सा थे जिसने बंगाल में वामपंथ को कमजोर करने में बड़ी भूमिका निभाई थी। जब ऐसा नेता पार्टी छोड़ता है तो संदेश केवल व्यक्तिगत नहीं रहता। वह यह संकेत भी देता है कि दल के भीतर शक्ति-संतुलन बदल चुका है। अभिषेक बनर्जी की बढ़ती भूमिका ने इस संदेश को और स्पष्ट किया।
कई राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि शुभेंदु अधिकारी स्वयं को पार्टी के भविष्य के शीर्ष नेताओं में देखना चाहते थे। लेकिन उन्हें लगा कि पारिवारिक निकटता की राजनीति में उनके लिए अंतिम स्थान सुरक्षित नहीं है। क्षेत्रीय दलों में यह समस्या अक्सर देखी जाती है। करिश्माई नेतृत्व के बाद उत्तराधिकार का प्रश्न आते ही पार्टी के भीतर लोकतांत्रिक स्पेस सिकुड़ने लगता है। जो नेता जनाधार के बल पर ऊपर आए होते हैं, वे स्वयं को असहज महसूस करते हैं। यही असहजता धीरे-धीरे असंतोष और फिर विद्रोह में बदलती है।
अभिषेक बनर्जी की राजनीति का एक और पहलू था। वे केवल पार्टी के भीतर प्रभाव नहीं बढ़ा रहे थे बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी स्वयं को प्रस्तुत कर रहे थे। संसद में उनकी सक्रियता, मीडिया में उनकी उपस्थिति और चुनावी रणनीति में उनकी भूमिका लगातार बढ़ रही थी। इससे यह धारणा बनी कि वे तृणमूल कांग्रेस के भविष्य का केंद्रीय चेहरा हैं। राजनीति में धारणा कई बार वास्तविकता से अधिक प्रभावशाली होती है। यदि किसी नेता को यह लग जाए कि उसकी भूमिका भविष्य में सीमित होने वाली है तो वह वर्तमान में ही वैकल्पिक रास्ते खोजने लगता है।
शुभेंदु अधिकारी के मन का विचलन केवल वैचारिक असहमति नहीं था; उसमें सम्मान, हिस्सेदारी और भविष्य की आशंकाएँ भी शामिल थीं। राजनीतिक दलों में सम्मान का प्रश्न अत्यंत महत्त्वपूर्ण होता है। कई नेता पद छोड़ सकते हैं, पर अपमान की अनुभूति नहीं सह पाते। शुभेंदु अधिकारी के बयानों और उनके समर्थकों की प्रतिक्रियाओं में बार-बार यह भाव दिखाई देता था कि पार्टी में कुछ नेताओं को अधिक महत्त्व दिया जा रहा है और पुराने संघर्षशील नेताओं की उपेक्षा हो रही है। यह भावना वास्तविक थी या रणनीतिक, यह अलग प्रश्न है; लेकिन राजनीति में अनुभूति ही अक्सर निर्णय को दिशा देती है।
इसके अतिरिक्त बंगाल की राजनीति का सांस्कृतिक आयाम भी महत्वपूर्ण है। वहाँ क्षेत्रीय अस्मिता, स्थानीय नेटवर्क और व्यक्तिगत प्रभाव बहुत महत्त्व रखते हैं। शुभेंदु अधिकारी का प्रभाव विशेषकर पूर्व मेदिनीपुर क्षेत्र में गहरा था। वे स्वयं को केवल पार्टी का कार्यकर्ता नहीं बल्कि शक्ति-केंद्र मानते थे। जब ऐसा शक्ति-केंद्र किसी दूसरे केंद्र के उभार को देखता है तो टकराव लगभग अपरिहार्य हो जाता है।
यह भी रोचक है कि अभिषेक बनर्जी और शुभेंदु अधिकारी दोनों अलग-अलग राजनीतिक शैलियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। अभिषेक अपेक्षाकृत आधुनिक, मीडिया-उन्मुख और केंद्रीकृत राजनीतिक मॉडल के प्रतीक हैं। शुभेंदु अधिक पारंपरिक जमीनी नेटवर्क, स्थानीय शक्ति-संतुलन और प्रत्यक्ष राजनीतिक संपर्क की शैली से आते हैं। इन दोनों शैलियों का संघर्ष भी तृणमूल कांग्रेस के भीतर दिखाई पड़ा। आधुनिक दलों में तकनीकी चुनाव प्रबंधन बढ़ रहा है, जबकि पुराने नेता व्यक्तिगत संबंधों और क्षेत्रीय संरचनाओं पर भरोसा करते हैं। यह पीढ़ियों का भी संघर्ष था।
फिर भी यह कहना गलत होगा कि शुभेंदु अधिकारी केवल अभिषेक बनर्जी से असुरक्षित होकर टीएमसी छोड़ गए। राजनीति में व्यक्ति कभी अकेले निर्णय नहीं लेता। केंद्रीय एजेंसियों की सक्रियता, भाजपा का विस्तार, बंगाल में ध्रुवीकरण की राजनीति और आगामी चुनावों की संभावनाएँ भी इस निर्णय के पीछे थीं। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि यदि तृणमूल कांग्रेस के भीतर शक्ति-संतुलन अलग होता, यदि शुभेंदु अधिकारी को भविष्य में बड़ी भूमिका का भरोसा मिलता, यदि अभिषेक बनर्जी का उभार इतना स्पष्ट न होता तो शायद स्थिति इतनी जल्दी विस्फोटक नहीं बनती।
दरअसल भारतीय क्षेत्रीय दलों की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि वे लोकतांत्रिक संघर्ष से जन्म लेते हैं लेकिन धीरे-धीरे व्यक्तिकेंद्रित संरचनाओं में बदल जाते हैं। वहाँ निष्ठा का मूल्य होता है, पर उत्तराधिकार की राजनीति अंततः निष्ठा को भी संदेह में बदल देती है। शुभेंदु अधिकारी और अभिषेक बनर्जी का प्रसंग इसी व्यापक राजनीतिक प्रवृत्ति का उदाहरण है। मनुष्य संस्थाएँ बनाता है, फिर उन्हें परिवार, गुट और निजी विरासतों के बीच बाँट देता है। लोकतंत्र बाहर जनता से वोट मांगता है, भीतर दरबारी गणित से चलता है। राजनीति का यह दोहरा चेहरा भारतीय दलों में बार-बार दिखाई देता है।
शुभेंदु अधिकारी का विचलन इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि उसने बंगाल की राजनीति को द्विध्रुवीय बना दिया। तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच जो सीधी लड़ाई बनी, उसमें शुभेंदु अधिकारी भाजपा के सबसे प्रभावशाली बंगाली चेहरों में बदल गए। यदि वे टीएमसी में बने रहते, तो बंगाल की राजनीतिक संरचना संभवतः अलग होती। इस अर्थ में अभिषेक बनर्जी का उभार केवल आंतरिक संगठनात्मक घटना नहीं था; उसका प्रभाव पूरे राज्य की राजनीति पर पड़ा।
कहा जा सकता है कि अभिषेक बनर्जी की बढ़ती स्थिति ने शुभेंदु अधिकारी के मन में असुरक्षा, असंतोष और भविष्य संबंधी बेचैनी अवश्य उत्पन्न की। यह टीएमसी से उनके विचलन का एक महत्त्वपूर्ण कारण था लेकिन अकेला कारण नहीं। सत्ता की राजनीति कई धाराओं से मिलकर बनती है। व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा, संगठनात्मक शक्ति, उत्तराधिकार की आशंका, वैकल्पिक राजनीतिक अवसर और सम्मान की भावना, इन सबने मिलकर शुभेंदु अधिकारी को उस बिंदु तक पहुँचाया जहाँ टीएमसी छोड़ना उन्हें अधिक उपयोगी और संभवतः अधिक सम्मानजनक विकल्प लगा। राजनीति में कोई निर्णय केवल भावनात्मक नहीं होता और कोई निर्णय पूरी तरह वैचारिक भी नहीं। दोनों के बीच जो धुँधला क्षेत्र है, वहीं से अधिकांश राजनीतिक यात्राएँ गुजरती हैं। मानव सभ्यता ने इसे “रणनीति” नाम दिया है ताकि महत्वाकांक्षा थोड़ा सभ्य दिख सके।
आभार~ परिचय दास
