नए समय की राजनीति : विचार नहीं, प्रभाव चाहिए
श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

आज की राजनीति का सबसे बड़ा परिवर्तन शायद यही है कि उसका वैचारिक केंद्र लगातार धुँधला होता जा रहा है और “शक्ति” उसका एकमात्र स्थायी आकर्षण बनती जा रही है। पहले राजनीतिक दलों के बीच मतभेद केवल चुनावी नहीं होते थे, वे विचार, समाज-दृष्टि और इतिहास-बोध के स्तर पर भी होते थे। कोई समाजवाद की भाषा बोलता था, कोई गांधीवाद की, कोई वाम राजनीति की, कोई सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की। मतभेद तीखे थे लेकिन उनके पीछे कुछ वैचारिक संरचनाएँ थीं। आज वह संरचना धीरे-धीरे पिघल रही है।
अब राजनीति का बड़ा हिस्सा विचार से अधिक “सत्ता की दिशा” पढ़ता है। जहाँ शक्ति दिखाई देती है, वहाँ लोगों का झुकाव तेज़ी से होने लगता है। दल बदलना अब वैचारिक घटना नहीं रह गया, वह प्रबंधन की तकनीक बन गया है। नेता पहले यह नहीं देखता कि किस दल की विचारधारा उसके निकट है, वह यह देखता है कि किसके पास संसाधन, प्रभाव, संरक्षण और चुनावी मशीनरी अधिक है।
इसलिए आज के अनेक राजनेता किसी स्थायी वैचारिक भूमि पर खड़े हुए नहीं दिखाई देते। वे तरल हैं। सत्ता की धूप जिधर जाती है, उनका राजनीतिक शरीर उधर मुड़ने लगता है। यह केवल व्यक्तियों की समस्या नहीं, पूरे लोकतांत्रिक चरित्र का परिवर्तन है। राजनीति अब धीरे-धीरे नैतिक या वैचारिक प्रतिबद्धता से हटकर “पावर मैनेजमेंट” की कला बनती जा रही है।
जो दल अपने को अत्यंत शक्तिशाली मान रहे हैं, उनकी शक्ति भी कई बार केवल जनविश्वास से निर्मित नहीं होती। उसमें प्रशासनिक नियंत्रण, मीडिया प्रभाव, संसाधनों की असमानता, चुनावी प्रबंधन, डिजिटल प्रचार, संस्थागत पहुँच और भय की अदृश्य संरचनाएँ भी शामिल होती हैं। इसलिए उनकी सफलता हमेशा वैचारिक विजय नहीं होती। वह कई बार सिस्टम की गहरी मैनेजमेंट क्षमता का परिणाम होती है।
यही कारण है कि आज लोकतंत्र में “लोक” से अधिक “तंत्र” दिखाई देने लगा है। चुनाव अब केवल जनमत का उत्सव नहीं रह गया, वह डेटा, इमेज, नैरेटिव, संसाधन और मनोवैज्ञानिक नियंत्रण का जटिल तंत्र बन चुका है। जनता वोट देती है, लेकिन उसके पहले उसके मन तक पहुँचने वाली सूचनाओं का पूरा संसार नियंत्रित किया जाता है।
इस राजनीति का केंद्र विचार नहीं, शक्ति है। शक्ति ही उसकी नैतिकता बनती जा रही है। जो जीत रहा है, वही सही मान लिया जाता है। सफलता स्वयं विचारधारा का स्थान लेती जा रही है। यही कारण है कि आज अनेक दलों में वैचारिक विरोध के बावजूद व्यवहारिक समानताएँ बढ़ती दिखाई देती हैं। भाषा अलग होती है, लेकिन सत्ता प्राप्ति की तकनीकें लगभग एक जैसी।
इस परिघटना का सबसे बड़ा संकट यह है कि राजनीति से नैतिक जोखिम धीरे-धीरे गायब होने लगता है। पहले कोई नेता किसी विचार के लिए सत्ता खो भी सकता था। अब बहुत कम लोग किसी सिद्धांत के लिए राजनीतिक नुकसान उठाने को तैयार दिखते हैं। विचारधारा अब कई बार केवल चुनावी मंच का वस्त्र रह गई है, जिसे परिस्थिति के अनुसार बदला जा सकता है।
लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि विचार पूरी तरह समाप्त हो गए हैं। समाज में अब भी वैचारिक आकांक्षाएँ जीवित हैं। लोग अब भी न्याय, समानता, पहचान, संस्कृति, धर्म, भाषा और अधिकार के प्रश्नों से प्रभावित होते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि राजनीतिक नेतृत्व इन प्रश्नों को भी कई बार शक्ति-समीकरण के औजार की तरह इस्तेमाल करने लगा है।
आज की राजनीति को समझने के लिए केवल भाषण सुनना काफी नहीं। यह देखना होगा कि शक्ति की संरचना कहाँ बन रही है, कौन-सी संस्थाएँ किसके पक्ष में झुक रही हैं, संसाधनों का प्रवाह किस दिशा में है, और कौन-सा नैरेटिव लगातार स्थापित किया जा रहा है। राजनीति अब केवल विचारों का संघर्ष नहीं, प्रभाव-निर्माण की विशाल तकनीक भी बन चुकी है।
और शायद यही हमारे समय की सबसे गहरी विडंबना है कि लोकतंत्र का बाहरी उत्सव जितना भव्य हुआ है, उसके भीतर की वैचारिक आत्मा उतनी ही अस्थिर होती गई है। सत्ता अब केवल शासन नहीं, एक मनोवैज्ञानिक उपस्थिति भी बन चुकी है। लोग कई बार विचार से नहीं, विजेता की तरफ जाते हैं। क्योंकि मनुष्य को शक्ति हमेशा आकर्षित करती है। इतिहास बदलता है, तकनीक बदलती है, नारे बदलते हैं, लेकिन शक्ति का सम्मोहन बहुत कम बदलता है।
शक्ति का यह सम्मोहन केवल नेताओं तक सीमित नहीं रहता। धीरे-धीरे समाज भी उसी की भाषा सीखने लगता है। विश्वविद्यालय, मीडिया, साहित्य, कला, व्यापार, यहाँ तक कि निजी संबंधों तक में एक नया व्यावहारिक यथार्थवाद फैलने लगता है। लोग यह देखना शुरू करते हैं कि किसके साथ खड़े होने में लाभ है, सुरक्षा है, दृश्यता है। नैतिकता धीरे-धीरे “सफलता” की परिभाषा के भीतर समा जाती है।
यही कारण है कि आज राजनीतिक दलों के आसपास बड़ी संख्या में ऐसे लोग दिखाई देते हैं जिनका किसी विचारधारा से गहरा संबंध नहीं रहा, लेकिन वे सत्ता की दिशा को पहचानने में दक्ष हैं। वे मौसम वैज्ञानिकों की तरह राजनीति का तापमान पढ़ते हैं। उन्हें पता होता है कि किस समय कौन-सा नारा बोलना है, किस समय किस नेता के साथ तस्वीर खिंचवानी है, किस समय पुरानी प्रतिबद्धताओं को चुपचाप बदल देना है।
यह पूरी प्रक्रिया लोकतंत्र को एक विचित्र रंगमंच में बदल देती है। मंच पर विचार दिखाई देते हैं, लेकिन मंच के पीछे गणित चलता रहता है। जनता भावनाओं में विभाजित होती है, जबकि सत्ता-संरचनाएँ बेहद व्यावहारिक तरीके से गठित होती हैं। विरोध भी कई बार वास्तविक वैचारिक संघर्ष से अधिक नियंत्रित प्रतीत होने लगता है।
आज राजनीति में “इमेज” ने चरित्र की जगह ले ली है। पहले नेता अपने लंबे सार्वजनिक जीवन से पहचाने जाते थे। अब छवि बहुत तेज़ी से निर्मित की जाती है। डिजिटल माध्यमों ने इस प्रक्रिया को और तीखा बना दिया है। कोई नेता एक दिन में राष्ट्रवादी, अगले दिन विकासवादी, तीसरे दिन गरीबों का मसीहा और चौथे दिन सांस्कृतिक प्रतीक बना दिया जाता है। विचार अब स्थायी दर्शन नहीं, परिस्थितियों के अनुसार बदले जाने वाले दृश्य बनते जा रहे हैं।
इसलिए जो दल अपने विस्तार को पूर्ण जनसमर्थन मान रहे हैं, उन्हें भी यह समझना होगा कि आधुनिक सत्ता का बड़ा हिस्सा संस्थागत और प्रबंधकीय नियंत्रण से बनता है। मीडिया की दृश्यता, चुनावी पूँजी, प्रशासनिक प्रभाव, सोशल मीडिया नैरेटिव, जाँच एजेंसियों का भय, गठबंधनों की इंजीनियरिंग, डेटा का उपयोग और मनोवैज्ञानिक प्रचार, सब मिलकर एक “सत्ता-आभा” तैयार करते हैं। जनता कई बार केवल उस आभा को देखती है।
लेकिन इतिहास की एक गहरी विडंबना यह भी है कि शक्ति पर अत्यधिक केंद्रित राजनीति भीतर से धीरे-धीरे असुरक्षित भी होने लगती है। क्योंकि उसका आधार विश्वास से अधिक नियंत्रण पर टिका होता है। नियंत्रण टिकाऊ दिखता है, लेकिन उसमें आत्मीयता कम होती है। इसलिए ऐसी राजनीति लगातार अपने प्रभाव को बनाए रखने के लिए और अधिक संसाधन, और अधिक प्रचार, और अधिक केंद्रीकरण की ओर बढ़ती जाती है।
यहाँ लोकतंत्र का संकट शुरू होता है। लोकतंत्र केवल चुनाव का नाम नहीं। वह असहमति की गरिमा, संस्थाओं की स्वतंत्रता, और नागरिक की नैतिक स्वतंत्रता पर भी टिकता है। लेकिन जब राजनीति का केंद्र केवल शक्ति बन जाए, तब असहमति को भी कई बार “अवरोध” की तरह देखा जाने लगता है। फिर विचार-विमर्श की जगह नैरेटिव लेने लगता है। संवाद की जगह प्रचार।
आज के समय में सबसे अधिक संकट शायद वैचारिक ईमानदारी का है। बहुत कम लोग हैं जो हारने का जोखिम उठाकर भी अपने विचार पर टिके रहना चाहते हैं। अधिकांश राजनीति “विजेता के साथ” खड़ी होने की प्रवृत्ति से संचालित हो रही है। यही कारण है कि दलों के भीतर भी वैचारिक बहस कम होती जा रही है। नेतृत्व के आसपास सहमति का एक कृत्रिम वातावरण तैयार किया जाता है। असहमति को धीरे-धीरे संगठनात्मक अनुशासन के नाम पर सीमित कर दिया जाता है।
फिर भी राजनीति पूरी तरह यांत्रिक नहीं हो सकती। समाज के भीतर दबे हुए प्रश्न बार-बार लौटते हैं। बेरोजगारी, असमानता, सामाजिक न्याय, क्षेत्रीय असंतोष, भाषा, संस्कृति, पहचान, किसान, मजदूर, शिक्षा, स्वास्थ्य, सब अंततः अपनी जगह माँगते हैं। शक्ति उन्हें कुछ समय तक प्रबंधित कर सकती है, पूरी तरह समाप्त नहीं।
इसलिए यह मान लेना भी भ्रम होगा कि केवल मैनेजमेंट हमेशा राजनीति को चला लेगा। इतिहास में कई बार ऐसे क्षण आते हैं जब जनता अचानक उस चमकदार संरचना के पीछे की खाली जगह देख लेती है। तब बड़े से बड़ा राजनीतिक आत्मविश्वास भी दरकने लगता है।
लेकिन फिलहाल समय शक्ति का समय है। लोग विचारों से अधिक विजेताओं की ओर आकर्षित हो रहे हैं। राजनीति नैतिकता से अधिक प्रभाव की भाषा बोल रही है। और इस पूरी प्रक्रिया में लोकतंत्र धीरे-धीरे एक विशाल दृश्य-व्यवस्था में बदलता जा रहा है, जहाँ वास्तविक संघर्ष कई बार पर्दे के पीछे होता है, जबकि सामने केवल निर्मित छवियाँ चमकती रहती हैं।
शायद यही हमारे समय का सबसे कठिन प्रश्न है कि क्या राजनीति फिर कभी विचार की ओर लौटेगी, या शक्ति ही उसका अंतिम धर्म बन जाएगी। क्योंकि जब सत्ता स्वयं विचारधारा बन जाती है, तब लोकतंत्र बाहर से बहुत जीवित दिखाई देता है, लेकिन भीतर उसकी आत्मा धीरे-धीरे थकने लगती है।
आभार~ परिचय दास
