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मनभोग: लोकगंध, श्रद्धा और स्मृति का प्रसाद

मनभोग: लोकगंध, श्रद्धा और स्मृति का प्रसाद

श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

गोरक्ष क्षेत्र की यात्रा में हूँ। पथ जैसे बाहर कम, भीतर अधिक खुलता जाता है। ऐसे ही एक पड़ाव पर पंकज भैया का फ़ोन आया। बक्सर से। सहज कुशल-क्षेम के बाद, बातों की धारा जाने कैसे भोजन और प्रसाद की ओर मुड़ गई। और तभी ‘मनभोग’ का नाम आया। मानो किसी ने स्मृति-कानन का एक गुप्त द्वार खोल दिया हो। भारतीय खान-पान की परंपरा में कितने ही ऐसे नाम हैं, जो केवल व्यंजन नहीं, अपने भीतर सांस्कृतिक अर्थ-संपदा लिए हुए हैं।

राजभोग, मोहनभोग, अमृतभोग… और इन्हीं में एक है यह सरल, आत्मीय, ‘मनभोग’। जैसे किसी दूर के आँगन से आती हुई घी-भुने आटे की सुवास, स्मृतियों के किवाड़ खटखटाने लगती है। यह केवल एक पकवान नहीं, न ही मात्र प्रसाद; यह मन का भोग है। मन का अर्पण, मन का तृप्त होना और मन का ही प्रसन्न हो उठना। ‘ठाकुर जी’ के सम्मुख चढ़ाया गया यह साधारण-सा दिखने वाला दानेदार पीसान, वस्तुतः भारतीय लोकजीवन की उस गहरी सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा है, जहाँ भोजन केवल देह-पालन का साधन नहीं, बल्कि आत्मा के संयोग का सेतु है।

और इस ‘मनभोग’ के साथ ही स्मृति एकदम से बचपन के उस आँगन में उतर आई, जहाँ सर्दियों की हल्की धूप में दादी पीतल की कढ़ाही चढ़ाए बैठी हैं। चूल्हे की धीमी आँच, पास में रखी सोंधी गंध देता गेहूँ का पीसान, और एक कटोरी में रखा देसी घी, जिसे वे सावधानी से कढ़ाही में डालती हैं। घी गरम होते ही उसकी सुवास पूरे आँगन में फैल जाती है। हम बच्चे थोड़ी दूरी पर बैठे, उस प्रक्रिया को एक उत्सव की तरह देखते रहते, मानो कोई अनुष्ठान घट रहा हो।

नानी लकड़ी के पलटा से पीसान को धीरे-धीरे भूनती जातीं। उनकी कलाई की गति में एक लय होती थी, जैसे कोई मौन संगीत बज रहा हो। बीच-बीच में वे कहतीं, ‘धीर राखऽ, प्रसाद तैयार होखे, समय लागेला।” तब यह वाक्य केवल हँसी का कारण लगता था, पर आज लगता है, यह जीवन का सूत्र था।

यह दृश्य प्रायः पूर्णमासी की संध्या का होता था। गाँव में हर पूर्णमासी को ‘कथा’ सुनने की परंपरा थी। सूर्यास्त के बाद, आँगन में या दुआर पर लोग इकट्ठा होते, बुज़ुर्ग, महिलाएँ, बच्चे। पुरोहित बाबा आते या घर का ही कोई वरिष्ठ व्यक्ति कथा कहता। कभी सत्यनारायण की, कभी किसी लोकदेवता की, तो कभी किसी पुरानी जनश्रुति की। कथा केवल धार्मिक आख्यान नहीं होती थी; वह लोकजीवन की स्मृतियों, नैतिकताओं और सामूहिक अनुभवों का जीवित संकलन होती थी।

कथा के साथ-साथ ही नानी की कढ़ाही में ‘मनभोग’ तैयार होता रहता। जैसे कथा शब्दों में पकती थी, वैसे ही मनभोग आग पर। दोनों की प्रक्रियाएँ समानांतर चलती थीं। एक मन को संस्कारित करती, दूसरी स्वाद को। और जब कथा पूर्ण होती, तब ‘मनभोग’ प्रसाद के रूप में बाँटा जाता। उस क्षण में कथा और प्रसाद एक हो जाते। श्रवण और स्वाद, दोनों का समापन ‘तृप्ति’ में होता।

यहाँ एक गहरा सांस्कृतिक सूत्र है, भोग लगाने की वह परंपरा, जिसमें उपलब्ध सामग्री ही पर्याप्त मानी जाती है। नानी के घर में कोई विशेष वैभव नहीं था; जो था, उसी से मनभोग बनता। और वही पहले ठाकुर जी को अर्पित होता। इस अर्पण में कोई प्रदर्शन नहीं, केवल भाव था। यही भारतीय संस्कृति का सहज सत्य है, ईश्वर साधनों से नहीं, भाव से प्रसन्न होते हैं।

गेहूँ का पीसान (जो धरती की उर्वरता, किसान के श्रम और ऋतुओं के चक्र का संचित सार है) जब शुद्ध देसी घी में धीरे-धीरे भुना जाता है, तो वह एक साधारण अन्न से रूपांतरित होकर ‘मनभोग’ बन जाता है। यह रूपांतरण केवल पदार्थ का नहीं, संस्कार का भी है। भुनाई की वह प्रक्रिया, जिसमें आँच का संयम, हाथ का धैर्य और मन की एकाग्रता आवश्यक है, हमें भारतीय साधना की याद दिलाती है। यहाँ भी कोई उतावलापन नहीं; कोई जल्दबाज़ी नहीं। जैसे तपस्या में समय लगता है, वैसे ही मनभोग में भी।

भुनते हुए आटे का रंग जब ललछाऊँ होने लगता है, तो उसमें एक प्रकार की सौम्य आभा प्रकट होती है। न अधिक चटख, न अधिक फीकी। यह रंग भारतीय सौंदर्य-बोध का प्रतीक है, जहाँ संतुलन ही सौंदर्य है। इस क्षण में रसोई केवल रसोई नहीं रहती; वह एक लघु-यज्ञशाला में परिवर्तित हो जाती है। घी की सुवास, आटे की महक और आग की उष्णता, ये सब मिलकर एक ऐसा वातावरण रचते हैं, जो इंद्रियों को बाँध लेता है, परंतु बाँधते हुए भी मुक्त करता है।

फिर उसमें डाली जाती है चीनी या गुड़। यह चयन भी अपने आप में सांस्कृतिक अर्थ रखता है। चीनी आधुनिकता का प्रतीक हो सकती है। परिष्कृत, उज्ज्वल, एकरस; जबकि गुड़ लोक का, परंपरा का, विविधता का। जिसमें माटी की गंध है, गन्ने के खेतों की स्मृति है। जब गुड़ मनभोग में घुलता है, तो वह केवल मिठास नहीं देता; वह इतिहास का स्वाद भी घोल देता है। उसमें किसानों की मेहनत, बैलों की चाल, कोल्हू की चर्र-चर्र और लोक की धुन सब कुछ समाहित हो जाता है।

लेकिन मनभोग की सबसे बड़ी विशेषता है, उसकी ‘दानेदारता’। उसे हलवा नहीं बनना है। यह ‘न बनने’ का आग्रह ही उसे विशिष्ट बनाता है। जीवन में भी तो सब कुछ एकरस, चिकना और गला-गला सा हो जाए, तो उसमें रस कहाँ रह जाता है? दानेदारपन जीवन के उन छोटे-छोटे अनुभवों की तरह है, जो अलग-अलग होकर भी एक साथ मिलकर संपूर्णता रचते हैं। हर दाना अपनी स्वतंत्रता को बनाए रखते हुए भी एक सामूहिक स्वाद का हिस्सा है, जैसे समाज में व्यक्ति।

मनभोग की गंध, वह तो जैसे किसी अदृश्य सूत्र से मन को बाँध लेती है। यह गंध केवल नासिका तक सीमित नहीं रहती; वह स्मृतियों के उस गहरे तहखाने में उतर जाती है, जहाँ बचपन के उत्सव, घर की रसोई, माँ या दादी-नानी के हाथों की गर्माहट और मंदिर की घंटियों की ध्वनि सब एक साथ संग्रहीत हैं। यह गंध हमें हमारे अतीत से जोड़ती है। उस अतीत से, जो केवल समय में नहीं, संस्कारों में भी जीवित है।

वस्तुतः इसे केवल खाद्य पदार्थ के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति के एक जीवित प्रतीक के रूप में देखना श्रेयस्कर होगा। यह प्रसाद उस परंपरा का प्रतिनिधि है, जहाँ ‘अर्पण’ का भाव प्रधान है। यहाँ भोजन ‘मैं खाऊँ’ से पहले ‘मैं चढ़ाऊँ’ है। यह ‘पहले ईश्वर, फिर मैं’ का संस्कार ही भारतीय जीवन-दृष्टि की रीढ़ है।

मनभोग, वस्तुतः ‘भोग’ और ‘त्याग’ के बीच की उस सूक्ष्म रेखा पर स्थित है, जहाँ दोनों एक हो जाते हैं। जब हम ठाकुर जी या सत्यनारायण भगवान को भोग लगाते हैं, तो हम अपने अहंकार का त्याग करते हैं। और जब वही प्रसाद बनकर लौटता है, तो वह केवल अन्न नहीं रहता; वह कृपा का प्रतीक बन जाता है। यह द्वैत का अद्भुत संयोग है। जहाँ देने वाला भी वही है और पाने वाला भी वही।

लोकभाषा में इसे ‘प्रसादी’ कहा जाता है। इस शब्द में एक आत्मीयता है। एक अपनापन। ‘प्रसाद’ थोड़ा औपचारिक है; ‘प्रसादी’ में घर का स्पर्श है। जैसे कोई बुज़ुर्ग स्नेह से कहे, “लो, प्रसादी ले लो।” इस संबोधन में जो सहजता है, वही भारतीय लोकजीवन की आत्मा है।

वस्तुतः मनभोग की उपस्थिति केवल मंदिर तक सीमित नहीं रहती। वह घर के उत्सवों में, व्रत-त्योहारों में, यहाँ तक कि साधारण दिनों में भी बनता है। यह हमें याद दिलाता है कि पवित्रता किसी विशेष अवसर की मोहताज नहीं; वह हमारे दैनिक जीवन का हिस्सा हो सकती है। एक साधारण दिन को भी असाधारण बनाया जा सकता है, यदि उसमें अर्पण का भाव हो।

इस संदर्भ में मनभोग भारतीय समय-बोध का भी परिचायक है। यहाँ समय केवल घड़ी की सूइयों से नहीं मापा जाता; वह ऋतुओं, पर्वों और संस्कारों से मापा जाता है। जब सावन आता है, जब नवरात्रि होती है, जब जन्माष्टमी की रात में ठाकुर जी के लिए भोग बनता है, तब मनभोग केवल एक व्यंजन नहीं रहता; वह समय का उत्सव बन जाता है।

यदि हम इसे थोड़ा व्यापक संदर्भ में देखें, तो मनभोग भारतीय सभ्यता के उस गहरे विश्वास को भी व्यक्त करता है कि ‘सुख’ बाहर से नहीं आता; वह भीतर से उपजता है। ‘मन-भोग’, अर्थात् मन का तृप्त होना। यह तृप्ति केवल स्वाद से नहीं आती; वह उस भाव से आती है, जो इसे बनाते और बाँटते समय उपस्थित होता है।

आज के समय में, जब भोजन भी बाज़ार की वस्तु बनता जा रहा है, मनभोग हमें उस खोई हुई आत्मीयता की याद दिलाता है। यहाँ कोई पैकेजिंग नहीं, कोई ब्रांड नहीं, कोई विज्ञापन नहीं। केवल स्वाद है, सुगंध है और स्नेह है। यह सादगी ही उसकी सबसे बड़ी समृद्धि है।

अंततः, मनभोग हमें यह सिखाता है कि जीवन की असली मिठास भव्यता में नहीं, बल्कि सादगी में है; जटिलता में नहीं, बल्कि सहजता में है। गेहूँ का पीसान, थोड़ा-सा घी, थोड़ी-सी चीनी या गुड़ और बहुत सारा मन। यही तो है ‘मनभोग’।

और शायद इसी कारण इसका स्वाद ‘शब्दातीत’ कहा गया है। क्योंकि कुछ अनुभव ऐसे होते हैं, जिन्हें भाषा बाँध नहीं पाती; वे केवल महसूस किए जा सकते हैं। मनभोग भी वैसा ही एक अनुभव है, जो जीभ से अधिक हृदय पर उतरता है, और वहीं अपनी स्थायी जगह बना लेता है।

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