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सोना और चांदी

सोना और चांदी

सोना सदियों से केवल गहना नहीं रहा, वह साम्राज्यों का अहंकार रहा है

श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्‍क

मनुष्य ने धातुओं को केवल धातु की तरह कभी नहीं देखा। उसने उनमें अपनी इच्छाओं का रंग भरा, भय की चमक भरी, सुरक्षा का भ्रम भरा और भविष्य की काँपती हुई आशाओं को पिघलाकर उनमें ढाल दिया। सोना और चाँदी इस पृथ्वी के दो ऐसे मौन पात्र हैं जिनमें सभ्यताओं ने अपनी भूख, अपनी लालसा और अपनी असुरक्षाएँ रख छोड़ी हैं। एक पीला है, दूसरा श्वेत। एक सूर्य की तरह दीप्त, दूसरा चाँद की तरह शांत। एक में राजसत्ता की अकड़ है, दूसरे में लोकजीवन की नम्रता पर मनुष्य दोनों के सामने लगभग समान श्रद्धा से झुकता है। विचित्र प्राणी है मनुष्य। मिट्टी से जन्म लेता है और चमकती धातुओं के आगे अपने भविष्य का हिसाब लगाता फिरता है।

सोना सदियों से केवल गहना नहीं रहा, वह साम्राज्यों का अहंकार रहा है। राजाओं ने अपने मुकुटों में उसे जड़ा, मंदिरों ने उसे देवताओं पर चढ़ाया, व्यापारियों ने उसे तिजोरियों में बंद किया और गृहस्थों ने उसे बेटियों की विदाई के साथ बाँध दिया। सोना वस्तु कम, प्रतिष्ठा अधिक रहा। भारतीय समाज में तो उसका अर्थ केवल आर्थिक नहीं है।

वह विवाह का संस्कार है, कुल की इज्जत है, माँ की चुप चिंता है, पिता की अनकही तैयारी है। किसी घर में सोना होना केवल धनी होने का संकेत नहीं माना गया बल्कि स्थिर होने का भी संकेत माना गया। जैसे जीवन की अनिश्चितताओं के बीच पीली धातु एक स्थायी आश्वासन बनकर रख दी गई हो।

पर समय के भीतर हर चमक थकती है। इतिहास का यह भी एक नियम है कि जो चीज बहुत अधिक प्रतिष्ठित हो जाती है, वह धीरे-धीरे भय का कारण भी बनने लगती है। सोना अब केवल अलंकार नहीं रहा, वह चिंता भी बन गया है। उसकी कीमत जितनी बढ़ी है, उसके साथ जुड़ी हुई असुरक्षा भी उतनी ही बढ़ी है।

बैंक लॉकरों के भीतर बंद चमक कभी-कभी अपने मालिकों की नींद खा जाती है। मनुष्य जितना अधिक संग्रह करता है, उतना ही अधिक भयभीत होता जाता है। धन का एक विचित्र मनोविज्ञान है। वह सुरक्षा देने के साथ-साथ असुरक्षा भी बढ़ाता है। यही कारण है कि आज बहुत से लोग चुपचाप सोने से थोड़ा हटकर चाँदी की ओर देखने लगे हैं। जैसे लंबे समय तक सूर्य की ओर देखने के बाद आँखें चाँद की शीतलता खोजने लगती हों।

चाँदी का स्वभाव अलग है। उसमें सोने जैसी राजसी अकड़ नहीं है। वह अधिक घरेलू है, अधिक मानवीय है। गाँवों के पुराने घरों में चाँदी पायल बनकर बजती रही, करधनी बनकर चमकती रही, पूजा की थाली बनकर देवताओं के सामने रखी जाती रही। गरीब घरों में जहाँ सोना पहुँच नहीं पाता था, वहाँ चाँदी अपनी शांत उपस्थिति से सम्मान बचा लेती थी। भारतीय लोकजीवन में चाँदी का रिश्ता वैभव से कम और आत्मीयता से अधिक रहा है। उसमें चकाचौंध कम है, अपनापन अधिक है। शायद इसी कारण उसकी चमक आँखों को घायल नहीं करती।

यह प्रश्न कि सोने के बदले चाँदी खरीदी जानी चाहिए या नहीं, केवल बाजार का प्रश्न नहीं है। यह मनुष्य की मानसिकता का प्रश्न भी है। जब कोई समाज अत्यधिक असमानताओं, महँगाई, असुरक्षा और आर्थिक तनाव से गुजरता है, तब उसकी दृष्टि धीरे-धीरे वैभव से हटकर उपयोगिता की ओर जाने लगती है।

चाँदी उपयोगिता की धातु है। वह उद्योगों में जाती है, मशीनों में जाती है, चिकित्सा में जाती है, तकनीक में जाती है। मोबाइल फोन से लेकर सौर ऊर्जा तक, आधुनिक सभ्यता के अनेक उपकरणों में उसकी मौन उपस्थिति है। सोना अधिकतर तिजोरी में सोता है, चाँदी मशीनों के भीतर काम करती है। एक संग्रह की वस्तु है, दूसरा प्रवाह की वस्तु। एक स्थिर है, दूसरा गतिशील। और समय हमेशा गतिशील वस्तुओं को नए अर्थ देता है।

फिर भी केवल आर्थिक तर्कों से मनुष्य निर्णय नहीं करता। यदि ऐसा होता तो लोग कविताएँ न लिखते, स्मृतियाँ न सँजोते, पुराने खत न बचाते। सोने के साथ भारतीय मानस का भावनात्मक रिश्ता बहुत गहरा है। माँ की चूड़ियों की आवाज, दादी की नथ, विवाह की मंगलसूत्र, कन्यादान के समय पिता की काँपती आँखें, इन सबमें सोना केवल धातु नहीं रहता। वह पीढ़ियों की स्मृति बन जाता है। चाँदी अभी उस ऊँचाई तक भावनात्मक प्रतीक नहीं बन पाई, हालाँकि लोकजीवन में उसका स्थान अत्यंत आत्मीय रहा है। इसलिए जो लोग केवल लाभ देखकर सोने से चाँदी की ओर जाना चाहते हैं, वे शायद मनुष्य की उस भावनात्मक संरचना को भूल जाते हैं जिसमें वस्तुएँ भी रिश्तेदार बन जाती हैं।

लेकिन यह भी सच है कि हर युग अपनी धातु चुनता है। कभी नमक साम्राज्य हिलाता था, कभी मसाले समुद्रों में युद्ध करवाते थे, कभी तेल ने विश्व राजनीति बदल दी। आज तकनीक का युग है और तकनीक उन धातुओं को महत्व देती है जो उपयोगी हैं, प्रवाहमान हैं, औद्योगिक हैं। चाँदी का भविष्य इसलिए केवल आभूषणों में नहीं, मशीनों की धड़कनों में भी छिपा हुआ है। आने वाले समय में संभव है कि उसकी कीमत केवल उसकी चमक से नहीं, उसकी उपयोगिता से तय हो। संसार धीरे-धीरे सौंदर्य से अधिक कार्यक्षमता का दास बनता जा रहा है। मनुष्य अब फूल कम सूँघता है, स्क्रीन अधिक छूता है। ऐसे समय में चाँदी की प्रासंगिकता बढ़ना कोई आश्चर्य नहीं।

फिर भी जीवन केवल निवेश नहीं है। हर चीज को लाभ-हानि के तराजू पर रख देने से मनुष्य का भीतर सूखने लगता है। यदि कोई केवल इसलिए चाँदी खरीदना चाहता है कि वह भविष्य में अधिक लाभ दे सकती है, तो यह भी उसी अंतहीन लालसा का हिस्सा है जिसने मनुष्य को कभी संतुष्ट नहीं होने दिया। जिसने सोने के पीछे भागते हुए पृथ्वी खोदी, वही अब चाँदी के पीछे भागेगा।

इच्छाओं का बाजार कभी शांत नहीं होता। वहाँ हमेशा कोई न कोई धातु अधिक चमकदार घोषित कर दी जाती है। मनुष्य फिर उसके पीछे दौड़ पड़ता है, जैसे हिरण मृगतृष्णा के पीछे दौड़ता है। पूँजीवाद ने मनुष्य को ग्राहक कम, शिकारी अधिक बना दिया है। हर कोई किसी अगली चमक की तलाश में है।

शायद प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि सोने के बदले चाँदी खरीदी जाए या नहीं। प्रश्न यह होना चाहिए कि मनुष्य अपनी सुरक्षा आखिर कहाँ खोज रहा है। धातुओं में? तिजोरियों में? बाजारों में? या अपने श्रम, अपने ज्ञान और अपने संबंधों में? क्योंकि इतिहास बताता है कि सभ्यताएँ केवल सोने-चाँदी से सुरक्षित नहीं होतीं। वे अपने नैतिक संतुलन, अपने ज्ञान और अपने सामाजिक विश्वास से सुरक्षित होती हैं। जिन समाजों में विश्वास टूटता है, वहाँ सबसे पहले लोग धातुओं की ओर भागते हैं। जैसे उन्हें मनुष्यों पर भरोसा नहीं रह गया हो, इसलिए वे निर्जीव चमक में भरोसा ढूँढ़ने लगते हैं।

चाँदी खरीदना बुरा नहीं है। सोना रखना भी अपराध नहीं है। पर यदि कोई मनुष्य अपने भीतर की सारी बेचैनी को धातुओं से भरना चाहता है, तो वह अंततः और अधिक रिक्त हो जाएगा। क्योंकि धातुएँ घर भर सकती हैं, मन नहीं। वे तिजोरी सुरक्षित कर सकती हैं, भविष्य नहीं। वे प्रकाश दे सकती हैं, पर दिशा नहीं। संसार की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि मनुष्य जीवन भर चमक इकट्ठी करता रहता है और अंत में एक छोटी-सी राख बनकर हवा में उड़ जाता है। सोना वहीं रह जाता है। चाँदी भी वहीं रह जाती है। केवल मनुष्य चला जाता है। धातुएँ कभी शोक नहीं मनातीं। शोक केवल मनुष्य मनाता है। यही उसकी सबसे बड़ी गरिमा है और सबसे बड़ी मूर्खता भी।

आभार~ परिचय दास

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