प्रतियोगी परीक्षाओं की चुनौतियां
श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

भारत में प्रतियोगी परीक्षाएँ अब केवल परीक्षाएँ नहीं रह गई हैं, वे सामाजिक आकांक्षाओं, आर्थिक असुरक्षाओं, पारिवारिक दबावों और राजनीतिक व्यवस्थाओं का एक विशाल संगम बन चुकी हैं। विशेषकर ऐसी प्रतियोगी परीक्षाएँ, जहाँ एक सीट केवल एक सीट नहीं होती बल्कि लाखों परिवारों के लिए प्रतिष्ठा, भविष्य, आर्थिक सुरक्षा और सामाजिक उन्नयन का प्रतीक बन जाती है। ऐसे में जब किसी परीक्षा का प्रश्नपत्र बार-बार लीक होता है तो यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं रहती बल्कि पूरे समाज के नैतिक ढाँचे में आई दरारों को भी उजागर करती है। मनुष्य ने ज्ञान को इतना प्रतिस्पर्धात्मक बना दिया है कि अब बच्चे पढ़ाई कम और व्यवस्था से युद्ध अधिक लड़ते दिखाई देते हैं।
प्रतियोगी परीक्षाओं के प्रश्नपत्र लीक होने की घटनाएँ इसलिए बार-बार सामने आती हैं क्योंकि इन परीक्षाओं का आकार असाधारण रूप से विशाल है। लाखों विद्यार्थी, हजारों परीक्षा केंद्र, अनेक राज्य, निजी एजेंसियाँ, डिजिटल ट्रांसमिशन, प्रिंटिंग प्रेस, परिवहन व्यवस्था और स्थानीय प्रशासनिक इकाइयाँ इसमें शामिल होती हैं। जहाँ इतनी लंबी शृंखला होगी, वहाँ किसी एक कड़ी की कमजोरी पूरे तंत्र को संक्रमित कर सकती है। प्रश्नपत्र की सुरक्षा केवल एक ताले का प्रश्न नहीं है; यह मानव- शृंखला की विश्वसनीयता का प्रश्न है। और दुर्भाग्य यह है कि भारतीय प्रशासनिक ढाँचे में अक्सर वही सबसे कम सुरक्षित होता है।
दूसरा कारण है बेरोजगारी और अवसरों की सीमित संख्या। जब लाखों युवाओं को लगता है कि जीवन की सारी संभावनाएँ केवल एक प्रतियोगी परीक्षा पर निर्भर हैं, तब कुछ लोग अवैध रास्तों की ओर आकर्षित होने लगते हैं। यह आकर्षण केवल छात्रों तक सीमित नहीं रहता। इसमें कोचिंग माफिया, दलाल, कुछ भ्रष्ट अधिकारी, प्रिंटिंग कर्मी, साइबर नेटवर्क और स्थानीय राजनीतिक संरक्षण तक जुड़ जाते हैं।
परीक्षा धीरे-धीरे ज्ञान की जगह बाजार में बदल जाती है। एक ओर कोई छात्र रात भर पढ़ता है, दूसरी ओर कोई गिरोह रात भर सौदे करता है। दोनों ही भविष्य खरीदने की कोशिश में लगे रहते हैं, बस तरीक़े अलग होते हैं। मानव सभ्यता ने शिक्षा को मुक्ति का साधन कहा था, फिर उसे लीक हुए पीडीएफ और एन्क्रिप्टेड टेलीग्राम चैनलों के हवाले कर दिया। प्रगति सचमुच अद्भुत प्राणी है।
कोचिंग उद्योग का अनियंत्रित विस्तार भी एक बड़ा कारण है। अनेक कोचिंग संस्थान शिक्षा से अधिक परिणाम बेचने लगे हैं। सफलता प्रतिशत का विज्ञापन, रैंक की होड़ और अभिभावकों की बेचैनी ने एक ऐसा वातावरण बना दिया है जहाँ नैतिकता को अक्सर “कमज़ोर विकल्प” मान लिया जाता है। जब समाज सफलता को चरित्र से बड़ा बना देता है, तब कुछ लोग सफलता पाने के लिए किसी भी रास्ते को उचित समझने लगते हैं। यह विडंबना है कि चिकित्सा शिक्षा में प्रवेश पाने के लिए ही अनैतिक चिकित्सा शुरू हो जाती है।
राजनीतिक और प्रशासनिक संरक्षण भी कई बार इन घटनाओं को बढ़ाता है। प्रश्नपत्र लीक कोई अकेला व्यक्ति नहीं कर सकता। इसके पीछे संगठित नेटवर्क होते हैं। कई बार स्थानीय प्रभावशाली लोग, परीक्षा केंद्र संचालक, तकनीकी कर्मचारी और अपराधी समूह मिलकर ऐसी संरचना बना लेते हैं जिसे पकड़ना कठिन हो जाता है। जाँच एजेंसियाँ अक्सर घटना के बाद सक्रिय होती हैं, जबकि नेटवर्क पहले से वर्षों तक सक्रिय रहता है। भारतीय व्यवस्था में अपराध का सबसे बड़ा साहस यही है कि उसे दंड मिलने में देर होती है। और देर से मिला दंड, अपराधियों के लिए आधा प्रोत्साहन बन जाता है।
तकनीकी कमियाँ भी गंभीर भूमिका निभाती हैं। प्रश्नपत्र प्रिंटिंग से लेकर डिजिटल ट्रांसफर तक अनेक स्तरों से गुजरता है। यदि किसी स्तर पर एन्क्रिप्शन कमजोर हो, निगरानी ढीली हो या मानव हस्तक्षेप अधिक हो, तो लीक की संभावना बढ़ जाती है। कई बार परीक्षा केंद्रों पर मोबाइल, ब्लूटूथ डिवाइस, कैमरा पेन और एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग ऐप्स का उपयोग किया जाता है। तकनीक जितनी सुरक्षा देती है, उतने ही नए अपराध भी पैदा करती है। मनुष्य ने इंटरनेट बनाया था ज्ञान बाँटने के लिए; अब वही इंटरनेट कभी-कभी उत्तर कुंजी बाँटने में अधिक व्यस्त दिखाई देता है।
एक महत्त्वपूर्ण कारण सामाजिक मानसिकता भी है। हमारे यहाँ प्रतियोगी परीक्षा को जीवन-मृत्यु का प्रश्न बना दिया गया है। असफलता को सामान्य मानने की संस्कृति विकसित नहीं हो पाई। एक छात्र यदि किसी प्रतिष्ठित पेशे तक नहीं पहुँचता, तो उसे लगता है कि उसका पूरा जीवन समाप्त हो गया। परिवार भी कई बार बच्चों पर ऐसा दबाव डालते हैं कि वे मानसिक रूप से टूटने लगते हैं। इस तनावपूर्ण वातावरण में कुछ लोग गलत रास्तों को “व्यावहारिक” मान लेते हैं। यह केवल अपराध नहीं, सामाजिक असंतुलन का परिणाम भी है।
उपाय क्या हैं? सबसे पहले परीक्षा प्रणाली को पूर्णतः बहुस्तरीय डिजिटल सुरक्षा के अंतर्गत लाना होगा। प्रश्नपत्रों का निर्माण, भंडारण और वितरण “एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन” पर आधारित होना चाहिए। परीक्षा शुरू होने से कुछ मिनट पहले तक प्रश्नपत्र स्थानीय स्तर पर डिक्रिप्ट न हो सके, ऐसी व्यवस्था आवश्यक है। कई देशों में यह मॉडल सफलतापूर्वक अपनाया गया है। भारत में तकनीकी क्षमता की कमी नहीं है; कमी है राजनीतिक प्राथमिकता और प्रशासनिक अनुशासन की। तकनीक हमारे यहाँ रॉकेट भी बना लेती है और कभी-कभी प्रश्नपत्र भी उड़ा देती है। दिशा तय करने वाला मनुष्य ही है।
दूसरा उपाय है परीक्षा केंद्रों का कठोर मानकीकरण। हर केंद्र पर सीसीटीवी, लाइव मॉनिटरिंग, जैमर, बायोमेट्रिक सत्यापन और स्वतंत्र पर्यवेक्षक अनिवार्य होने चाहिए। परीक्षा संचालन निजी एजेंसियों पर कम और प्रत्यक्ष सरकारी नियंत्रण में अधिक होना चाहिए। जहाँ जिम्मेदारी बिखरती है, वहाँ जवाबदेही भी गायब हो जाती है।
तीसरा उपाय है त्वरित और सार्वजनिक दंड। प्रश्नपत्र लीक को सामान्य आपराधिक घटना नहीं, राष्ट्रीय शैक्षिक अपराध की श्रेणी में रखा जाना चाहिए। यदि कुछ बड़े मामलों में तेज़ सुनवाई और कठोर सजा दिखाई दे, तो नेटवर्क का मनोबल टूटेगा। भारत में कई अपराध इसलिए दोहराए जाते हैं क्योंकि अपराधी को व्यवस्था से अधिक भय नहीं होता।
चौथा उपाय शिक्षा और अवसरों के विकेंद्रीकरण से जुड़ा है। जब एक ही प्रतियोगी परीक्षा लाखों छात्रों के भविष्य का एकमात्र द्वार बन जाती है, तब उस द्वार पर अपराधी भी जमा हो जाते हैं। अधिक संस्थान, अधिक सीटें, क्षेत्रीय स्तर पर गुणवत्तापूर्ण कॉलेज और बहुविकल्पीय प्रवेश मॉडल इस दबाव को कम कर सकते हैं। पूरी युवा आबादी को एक संकरे सुराख़ से गुजारने की कोशिश अंततः विस्फोट ही पैदा करती है।
पाँचवाँ उपाय सामाजिक है। परिवारों और समाज को यह स्वीकार करना होगा कि असफलता जीवन का अंत नहीं है। हर छात्र डॉक्टर या इंजीनियर नहीं बनेगा, और यह कोई त्रासदी नहीं है। जिस समाज में केवल कुछ पेशों को सम्मान मिलेगा, वहाँ उन पेशों तक पहुँचने के लिए अनैतिक दौड़ भी बढ़ेगी। सम्मान का लोकतंत्रीकरण भी परीक्षा सुधार का हिस्सा है, भले लोग इसे समझना न चाहें।
मीडिया की भूमिका भी लक्षित की जानी चाहिए । कई बार मीडिया केवल सनसनी पर केंद्रित रहता है, जबकि आवश्यकता गहरी जाँच और संस्थागत विश्लेषण की होती है। यदि पत्रकारिता केवल “किस शहर में प्रश्नपत्र लीक हुआ” तक सीमित रहेगी, तो समस्या की जड़ें अदृश्य ही बनी रहेंगी। समाज को यह समझना होगा कि प्रश्नपत्र लीक केवल छात्रों की समस्या नहीं, राष्ट्र की बौद्धिक विश्वसनीयता का संकट है।
सबसे दुखद बात यह है कि इन घटनाओं का सबसे बड़ा आघात उन छात्रों पर पड़ता है जो ईमानदारी से मेहनत करते हैं। एक ग्रामीण छात्र, जो बिजली कटने के बीच लालटेन में पढ़ता है, जब सुनता है कि किसी ने पैसे देकर प्रश्नपत्र खरीद लिया, तब केवल उसका परिणाम नहीं टूटता, उसका व्यवस्था पर विश्वास भी टूटता है। और किसी राष्ट्र के लिए विश्वास का टूटना किसी प्रश्नपत्र के लीक होने से कहीं अधिक खतरनाक होता है।
परीक्षा व्यवस्था अंततः केवल प्रशासनिक मशीन नहीं होती; वह समाज के नैतिक तापमान का दर्पण भी होती है। यदि बार-बार प्रश्नपत्र लीक हो रहे हैं, तो इसका अर्थ यह भी है कि कहीं न कहीं हम सफलता को सत्य से बड़ा बना बैठे हैं। जिस दिन समाज ईमानदारी को फिर से उपलब्धि मानेगा, उस दिन शायद प्रश्नपत्रों की सुरक्षा पर इतने ताले लगाने की आवश्यकता भी कम पड़ जाएगी। तब तक मनुष्य फाइलों में नैतिकता लिखता रहेगा और टेलीग्राम चैनलों में प्रश्नपत्र खोजता रहेगा।
आभार-~ परिचय दास
