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नये मिज़ाज के शहर में मनुष्य की उदासी

नये मिज़ाज के शहर में मनुष्य की उदासी

श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से।

ये नए मिज़ाज का शहर है, ज़रा फ़ासले से मिला करो।।~ बशीर बद्र

कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से” केवल एक सामाजिक सावधानी नहीं है बल्कि आधुनिक मनुष्य की मानसिक संरचना का अत्यंत सूक्ष्म और मार्मिक उद् घाटन है। यह शेर अपने छोटे आकार में उस पूरे समय का चेहरा पकड़ लेता है जिसमें आत्मीयता धीरे-धीरे संदेह में बदलती जा रही है।

“तपाक” शब्द इस शेर का केंद्र है। तपाक का अर्थ केवल उत्साह नहीं है। इसमें सहजता, अपनापन, बिना हिचक के आगे बढ़ जाना और हृदय की खुली हुई अवस्था शामिल है। पुराने समय में यह मानवीय गुण था। लोग बिना औपचारिकता के मिलते थे। संबंधों में गणना कम होती थी। गाँवों और छोटे नगरों में मनुष्य पहले हृदय से जुड़ता था, परिचय बाद में पूछता था।

लेकिन शेर का “नया मिज़ाज” उस संसार की ओर संकेत करता है जहाँ मनुष्य पहले अपने चारों ओर अदृश्य सुरक्षा-घेरा बनाता है। आधुनिक शहरों में आत्मीयता तुरंत स्वीकार नहीं की जाती। वहाँ अत्यधिक निकटता लोगों को असहज कर देती है। इसलिए शायर कहता है कि यदि तुम बहुत आत्मीय होकर गले मिलने जाओगे तो लोग हाथ भी नहीं मिलाएँगे। अर्थात वे तुम्हारी ऊष्मा से पीछे हट जाएँगे।

यहाँ “हाथ मिलाना” और “गले मिलना” के बीच का अंतर अत्यंत अर्थपूर्ण है। हाथ मिलाना एक नियंत्रित सामाजिक व्यवहार है। उसमें दूरी बनी रहती है। जबकि गले मिलना मनुष्य के भीतर की दीवारों को गिरा देता है। आधुनिक समाज औपचारिकता को स्वीकार करता है लेकिन आत्मीयता से डरता है।

यह शेर केवल किसी शहर का वर्णन नहीं करता। यहाँ “शहर” आधुनिक सभ्यता का प्रतीक है। यह महानगरों की वह मानसिकता है जहाँ लोग भीड़ में रहते हुए भी भीतर से अकेले हैं। उनके पास संपर्क बहुत हैं लेकिन संबंध कम हैं। वे संवाद करते हैं पर खुलते नहीं। वे साथ चलते हैं पर भीतर की दूरी बनाए रखते हैं।

“ज़रा फ़ासले से मिला करो” में जीवन का एक कठोर यथार्थ छिपा है। यह केवल शारीरिक दूरी की बात नहीं है बल्कि भावनात्मक अनुशासन की बात है। शायर जैसे कह रहा हो कि इस समय में अपनी संवेदनाओं को तुरंत किसी के सामने मत खोलो। यहाँ विश्वास धीरे-धीरे बनता है।

इस शेर की सबसे बड़ी शक्ति उसकी संयमित उदासी है। इसमें कोई क्रोध नहीं है, कोई शिकायत नहीं। शायर केवल समय की प्रकृति को पहचान रहा है। वह जानता है कि मनुष्य बदल चुका है। अब संबंधों में सावधानी, संकोच और आत्म-सुरक्षा अधिक है।

लेकिन इस शेर के भीतर एक गहरी त्रासदी भी छिपी हुई है। फ़ासले बनाए रखते-रखते मनुष्य भीतर से सूखने लगता है। सुरक्षा की यह संस्कृति उसे चोट से तो बचा लेती है पर गहरे प्रेम से भी दूर कर देती है। आधुनिक मनुष्य का अकेलापन इसी कारण इतना व्यापक है क्योंकि उसने आत्मीयता को धीरे-धीरे जोखिम मान लिया है।

बशीर बद्र का कौशल इस बात में है कि उन्होंने अत्यंत साधारण शब्दों में समय की एक बड़ी सच्चाई को पकड़ लिया। उन्होंने दर्शन की भाषा नहीं अपनाई बल्कि रोज़मर्रा के व्यवहार से आधुनिक सभ्यता का मनोविज्ञान निर्मित कर दिया। यही बड़े शायर की पहचान होती है कि वह मामूली दृश्य में युग की आत्मा देख लेता है।

यह शेर पढ़ते हुए लगता है कि आधुनिक मनुष्य अपने ही बनाए हुए फ़ासलों का बंदी बन गया है। उसने स्वयं को सुरक्षित रखने के लिए जो दीवारें बनाई थीं, वही धीरे-धीरे उसकी संवेदना की सीमाएँ बन गईं फिर भी उसके भीतर कहीं एक मौन आकांक्षा बची रहती है कि कोई ऐसा मिले जिससे वह बिना भय, बिना गणना, बिना औपचारिकता के “तपाक” से मिल सके।

शायद इसी कारण यह शेर केवल लोकप्रिय नहीं हुआ बल्कि लोगों की स्मृति का स्थायी हिस्सा बन गया। इसमें हमारे समय की थकी हुई आत्मा बोलती है। मानव सभ्यता ने तकनीक, गति और सुविधा तो बहुत अर्जित कर ली पर सहज आत्मीयता की कला धीरे-धीरे खोती चली गई। यही इस शेर का सबसे गहरा दुःख है।

इस शेर की एक और अत्यंत सूक्ष्म परत यह है कि यहाँ शायर केवल दूसरों के व्यवहार की चर्चा नहीं कर रहा बल्कि स्वयं अपने अनुभव की राख से बोल रहा है। यह कोई सिद्धांत नहीं, जीवन से निकली हुई थकी हुई समझ है। ऐसा लगता है जैसे किसी व्यक्ति ने अत्यधिक आत्मीय होकर लोगों को अपनाया हो और बदले में धीरे-धीरे दूरी, संकोच या उपेक्षा प्राप्त की हो। इसलिए इस शेर में शिकायत की तीखी आवाज़ नहीं बल्कि अनुभूति की धीमी धूल है।

“नए मिज़ाज का शहर” वास्तव में संबंधों की बदलती हुई अर्थव्यवस्था है। आधुनिक समय में संबंध भी बाज़ार की वस्तुओं की तरह व्यवस्थित होने लगे हैं। मनुष्य अब यह देखता है कि सामने वाले से उसे क्या लाभ, क्या सुरक्षा, क्या अवसर प्राप्त होगा। आत्मीयता अब स्वतःस्फूर्त भाव नहीं रही बल्कि एक प्रकार की नियंत्रित रणनीति बनती जा रही है। इसी कारण अत्यधिक खुलापन लोगों को असामान्य लगता है।

पुराने समय में मनुष्य की पहचान उसके संबंधों से होती थी। अब उसकी पहचान उसके निजी दायरे से होती है। पहले लोग अपनेपन के विस्तार में जीते थे, अब वे निजता की रक्षा में जीते हैं। यह परिवर्तन केवल सामाजिक नहीं, अस्तित्वगत है। आधुनिक मनुष्य अपने भीतर लगातार चौकन्ना रहता है। उसे भय है कि कहीं उसकी सरलता का उपयोग न कर लिया जाए, कहीं उसकी संवेदना उसका दुर्बल पक्ष न बन जाए।

इसलिए यह शेर केवल सामाजिक दूरी की बात नहीं करता, बल्कि विश्वास के संकट की ओर भी संकेत करता है। आधुनिक समय का सबसे बड़ा संकट यही है कि मनुष्य धीरे-धीरे विश्वास खोता जा रहा है। वह सामने वाले की मुस्कान में भी आशंका खोजता है। वह आत्मीयता को भी संभावित छल की दृष्टि से देखने लगा है।

यहाँ “फ़ासला” केवल बचाव नहीं है, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक कवच है। लोग अपने चारों ओर अदृश्य सीमाएँ बनाकर चलते हैं। वे बातचीत करते हैं, हँसते हैं, साथ काम करते हैं लेकिन भीतर की वास्तविक दुनिया तक बहुत कम लोगों को प्रवेश देते हैं। यही कारण है कि आधुनिक जीवन में संवाद बढ़े हैं, पर आत्मीयता घटती गई है।

इस शेर का एक राजनीतिक और सांस्कृतिक अर्थ भी है। आधुनिक शहरों में मनुष्य लगातार प्रतिस्पर्धा में जीता है। वहाँ हर व्यक्ति दूसरे से आगे निकलने की दौड़ में है। प्रतिस्पर्धा का यह वातावरण मनुष्य को भीतर से कठोर बनाता है। वह दूसरों को संभावित सहयोगी से अधिक संभावित प्रतिद्वंद्वी की तरह देखने लगता है। ऐसे वातावरण में सहज आत्मीयता धीरे-धीरे दुर्लभ हो जाती है।

बशीर बद्र की भाषा की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वह बहुत गहरी बात को अत्यंत सरल शब्दों में कहते हैं। उनके यहाँ कोई दार्शनिक जटिलता नहीं है, फिर भी अर्थ अत्यंत व्यापक हो जाता है। “ज़रा फ़ासले से मिला करो” एक सामान्य सलाह की तरह सुनाई देता है लेकिन उसके भीतर पूरे आधुनिक मनुष्य की थकान, सतर्कता और अकेलापन जमा है।

इस शेर को यदि प्रेम के संदर्भ में पढ़ें तो अर्थ और भी मार्मिक हो जाता है। प्रेम का स्वभाव निकटता है, जबकि आधुनिक समय का स्वभाव दूरी। यही कारण है कि आज संबंध जल्दी बनते हैं और जल्दी टूट भी जाते हैं। लोग भावनात्मक रूप से पूरी तरह खुलने से डरते हैं। वे प्रेम में भी अपने भीतर कुछ हिस्सा सुरक्षित रख लेना चाहते हैं। जैसे आत्मा ने भी अब बीमा पॉलिसी बनवा ली हो। मानव हृदय अब “टर्म्स एंड कंडीशंस” के साथ आता है।

यह शेर उस विडंबना को भी उजागर करता है कि मनुष्य भीतर से आत्मीयता चाहता है, लेकिन व्यवहार में उससे बचता है। वह चाहता है कि कोई उसे समझे, उसके निकट आए, उसके अकेलेपन को छुए; लेकिन जब कोई सचमुच निकट आने लगता है तो वही मनुष्य असहज हो उठता है। आधुनिक संवेदना का यही द्वंद्व इस शेर में बहुत सूक्ष्मता से उपस्थित है।

शहर का अर्थ यहाँ केवल भौतिक स्थान नहीं है। यह मानसिकता है। ऐसा भी संभव है कि कोई व्यक्ति गाँव में रहकर भी “नए मिज़ाज” का हो और कोई महानगर में रहकर भी अत्यंत आत्मीय हो। इसलिए यह शेर अंततः मनुष्य की भीतरी स्थिति का शेर है।

इस शेर में एक सांस्कृतिक संक्रमण की आहट भी सुनाई देती है। भारतीय समाज लंबे समय तक सामूहिकता का समाज रहा। यहाँ संबंधों, परिवारों, मोहल्लों और समुदायों की मजबूत संरचना थी लेकिन आधुनिकता के साथ व्यक्तिवाद बढ़ा। मनुष्य अधिक स्वतंत्र हुआ लेकिन अधिक अकेला भी। यह शेर उसी संक्रमणकाल की कविता है जहाँ आत्मीयता और निजता एक-दूसरे से टकरा रही हैं।

शायद इसी कारण यह शेर समय के साथ पुराना नहीं होता। हर पीढ़ी इसमें अपना अनुभव खोज लेती है। जो व्यक्ति बहुत आत्मीय होकर चोट खा चुका है, उसे यह शेर अपना लगता है। जो व्यक्ति आधुनिक शहरों के बीच अकेलापन जी रहा है, उसे भी यह शेर अपनी कहानी जैसा प्रतीत होता है।

इस शेर का सबसे करुण पक्ष यह है कि यह मनुष्य को दूरी बनाए रखने की सलाह देता है जबकि मनुष्य की मूल प्रकृति निकटता की आकांक्षा करती है। अर्थात समय ने मनुष्य को उसके स्वभाव के विरुद्ध जीना सिखा दिया है। यही आधुनिक सभ्यता की सबसे बड़ी विडंबना है।

आभार~ परिचय दास

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