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बिहार और पूर्वी यूपी की पिड़िया कला

बिहार और पूर्वी यूपी की पिड़िया कला

श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

पिड़िया कला केवल दीवारों पर बनाई गई कुछ आकृतियों का समूह नहीं है। इसके भीतर लोकजीवन की एक जटिल और सूक्ष्म सौन्दर्य-दृष्टि सक्रिय रहती है। सामान्य दृष्टि से देखने पर जो चित्र सरल प्रतीत होते हैं, वे वास्तव में अनेक सांस्कृतिक अर्थों, लोकविश्वासों और भावनात्मक अनुभवों से निर्मित होते हैं।

सबसे पहले इसकी रेखाओं को देखें। पीड़िया कला की रेखाएँ प्रायः सीधी और यांत्रिक नहीं होतीं। उनमें हाथ की स्वाभाविक गति दिखाई देती है। वे किसी पैमाने से नापकर नहीं खींची जातीं, फिर भी उनमें एक सहज संतुलन उपस्थित रहता है। यह संतुलन शास्त्रीय प्रशिक्षण से नहीं, बल्कि पीढ़ियों से अर्जित अभ्यास से पैदा होता है। लोककलाकार अनुपात को गणितीय नियमों से नहीं, अनुभव से समझता है।

इसके रंगों की दुनिया भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। गेरू का लाल, चूने का सफेद, मिट्टी का भूरा, हल्दी का पीला और कभी-कभी पत्तियों से प्राप्त हरापन, ये सभी रंग केवल दृश्य प्रभाव उत्पन्न नहीं करते। इनके पीछे स्थानीय भूगोल और जीवन-परिस्थिति की छाप होती है। रंगों का यह संसार प्रकृति से सीधा संवाद करता है। कृत्रिम चमक के स्थान पर यहाँ धरती की गरमाहट दिखाई देती है।

पीड़िया कला की एक सूक्ष्म विशेषता उसका रिक्त स्थानों का उपयोग है। आधुनिक चित्रकला में जिस प्रकार खाली जगह भी अर्थ उत्पन्न करती है, उसी प्रकार लोककलाकार भी सम्पूर्ण दीवार को भर देने का प्रयास नहीं करता। आकृतियों के बीच छोड़ी गई जगहें चित्र को साँस लेने का अवसर देती हैं। यह अनायास नहीं होता। इसके पीछे एक सहज दृश्य-संतुलन कार्य करता है।

आकृतियों के चयन में भी गहरी सांस्कृतिक चेतना सक्रिय रहती है। सूर्य केवल सूर्य नहीं है। वह ऊर्जा, संरक्षण और निरन्तरता का प्रतीक है। चन्द्रमा शीतलता, सौम्यता और जीवन-चक्र का संकेत देता है। पक्षी स्वतंत्रता और संदेश के वाहक बन जाते हैं। वृक्ष जीवन की जड़ों और विस्तार दोनों का प्रतीक हैं। इस प्रकार प्रत्येक आकृति अपने दृश्य रूप से कहीं अधिक व्यापक अर्थ ग्रहण कर लेती है।

स्त्री-आकृतियों की उपस्थिति विशेष ध्यान आकर्षित करती है। अनेक बार वे प्रत्यक्ष रूप में दिखाई देती हैं और अनेक बार उनकी उपस्थिति केवल संकेतों में होती है। इन चित्रों में स्त्री केवल चित्रकार नहीं है; वह विषय भी है और दृष्टा भी। उसकी घरेलू दुनिया, उसकी इच्छाएँ, उसके उत्सव और उसके सम्बन्ध इन रेखाओं के भीतर कहीं न कहीं दर्ज रहते हैं।

पीड़िया कला की एक और बारीकी उसकी लयात्मकता है। लोकगीतों की तरह उसमें भी पुनरावृत्ति दिखाई देती है। कोई आकृति बार-बार आती है, कोई रूप बार-बार दोहराया जाता है। किन्तु यह पुनरावृत्ति नीरस नहीं बनती। वह चित्र में लय उत्पन्न करती है। ठीक वैसे ही जैसे किसी लोकगीत में एक पंक्ति बार-बार लौटकर उसके संगीत को गहरा बनाती है।

इस कला का समय-बोध भी उल्लेखनीय है। यह स्थायित्व की कला नहीं है। वर्षा, धूप और समय के साथ चित्र मिट जाते हैं। अगले वर्ष फिर नए चित्र बनते हैं। इस प्रकार पीड़िया कला क्षणभंगुरता को स्वीकार करती है। वह स्थायी स्मारक बनने की आकांक्षा नहीं रखती। उसका सौन्दर्य उसके नवीकरण में है। वह मिटती है ताकि पुनः जन्म ले सके। यह दृष्टि भारतीय लोकसंस्कृति की चक्रीय समय-चेतना से जुड़ी हुई है।

यदि और गहराई से देखें तो पीड़िया कला में सौन्दर्य और उपयोगिता के बीच कोई विभाजन नहीं मिलता। जिस दीवार का उपयोग घर की सुरक्षा के लिए होता है, वही सौन्दर्य का माध्यम भी बन जाती है। कला जीवन से अलग नहीं खड़ी होती; वह जीवन के भीतर ही अपना स्थान बनाती है। यही लोककला का सबसे बड़ा वैशिष्ट्य है।

वास्तव में पीड़िया कला की सबसे सूक्ष्म बारीकी उसकी आत्मीयता है। उसमें दर्शक को प्रभावित करने का कोई प्रदर्शन नहीं है। वह चमत्कार पैदा करने की कोशिश नहीं करती। वह धीरे-धीरे अपने निकट बुलाती है। उसकी रेखाओं में गाँव की साँझ है, उसके रंगों में खेतों की मिट्टी है, उसकी आकृतियों में लोकस्मृतियों का संचय है। इसी कारण उसे केवल देखा नहीं जाता, बल्कि महसूस किया जाता है। उसके भीतर एक पूरा लोकजीवन अपनी मौन किन्तु गहन उपस्थिति के साथ स्पंदित रहता है।

पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के गाँवों में कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा से आरम्भ होकर अगहन शुक्ल प्रतिपदा तक चलने वाला पीड़िया पर्व केवल एक लोकअनुष्ठान नहीं है, बल्कि स्त्री-स्मृति, लोककला और सामूहिक संवेदना का एक अद्भुत उत्सव है। इस पर्व के दौरान घरों की दीवारें केवल दीवारें नहीं रहतीं; वे लोकजीवन की जीवित पांडुलिपियों में बदल जाती हैं। मिट्टी, गोबर, गेरू और चावल के घोल से निर्मित आकृतियाँ किसी प्रशिक्षित कलाकार की कृति नहीं होतीं, फिर भी उनमें एक ऐसा सौन्दर्य होता है जो सीधे लोकमानस से निकलता है।

पीड़िया कला का जन्म जीवन और अनुष्ठान के संगम से हुआ है। इसकी जड़ें लोकविश्वास में हैं, किन्तु इसकी शाखाएँ सौन्दर्यबोध तक फैली हुई हैं। गाँव की किशोरियाँ और स्त्रियाँ जब दीवारों पर पीड़िया बनाती हैं, तब वे केवल धार्मिक कर्तव्य का निर्वाह नहीं कर रही होतीं। वे अपने समय, अपने परिवेश और अपनी सांस्कृतिक स्मृतियों को दृश्य रूप दे रही होती हैं। यह कला किसी संग्रहालय में संरक्षित परम्परा नहीं, बल्कि जीवित जीवन का हिस्सा है।

बिहार और पूर्वांचल की पीड़िया कला का पहला आकर्षण उसकी सामूहिकता है। आधुनिक कला प्रायः कलाकार की व्यक्तिगत अभिव्यक्ति मानी जाती है, किन्तु यहाँ कलाकार कोई एक व्यक्ति नहीं होता। पूरा समुदाय उसका सर्जक होता है। एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी को रेखाएँ बनाना सिखाती है। कोई औपचारिक विद्यालय नहीं, कोई प्रमाणपत्र नहीं, फिर भी कला की परम्परा निरन्तर चलती रहती है। यह लोकज्ञान की वही परम्परा है जिसने भारतीय संस्कृति को सदियों तक जीवित रखा।

पीड़िया कला में प्रयुक्त आकृतियाँ देखने में सरल लगती हैं, परन्तु उनके भीतर अर्थों की अनेक परतें छिपी होती हैं। सूर्य, चन्द्रमा, वृक्ष, पक्षी, फूल, मानवीय आकृतियाँ और ज्यामितीय विन्यास केवल सजावटी तत्व नहीं हैं। वे लोकजीवन की विश्व-दृष्टि के प्रतीक हैं। उनमें प्रकृति और मनुष्य के बीच किसी संघर्ष का भाव नहीं, बल्कि सह-अस्तित्व की अनुभूति है। गाँव का जीवन प्रकृति से अलग नहीं है; वह उसी का विस्तार है। इसलिए पीड़िया कला में प्रकृति बार-बार लौटती है।

इस कला की सबसे बड़ी विशेषता उसका स्त्री-केंद्रित स्वरूप है। भारतीय लोकसंस्कृति की अनेक महत्त्वपूर्ण परम्पराओं की तरह इसका संरक्षण भी स्त्रियों ने ही किया है। खेतों में श्रम करने वाली, परिवार का संचालन करने वाली और जीवन के अनगिनत दायित्व निभाने वाली स्त्रियाँ जब दीवारों पर आकृतियाँ उकेरती हैं, तब वे अपने भीतर छिपी कलाकार को भी अभिव्यक्त करती हैं। उनकी रेखाओं में घरेलू जीवन की लय है, श्रम की थकान है, उत्सव की चमक है और स्मृतियों की नमी भी।

यदि ध्यान से देखा जाए तो पीड़िया कला केवल धार्मिक नहीं है, बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक भी है। इसके माध्यम से स्त्रियाँ एक साझा सांस्कृतिक संसार का निर्माण करती हैं। गीत गाए जाते हैं, कथाएँ सुनाई जाती हैं, सामूहिक श्रम होता है और कला एक सामाजिक संवाद का माध्यम बन जाती है। इस प्रकार पीड़िया कला केवल दीवारों पर नहीं बनती; वह लोगों के बीच के सम्बन्धों में भी निर्मित होती है।

बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश की यह कला हमें भारतीय ग्राम्य जीवन के उस पक्ष से परिचित कराती है जहाँ सौन्दर्य किसी विलासिता का विषय नहीं, बल्कि जीवन की स्वाभाविक आवश्यकता है। सीमित संसाधनों के बीच भी मनुष्य अपने परिवेश को सुंदर बनाने की आकांक्षा रखता है। यही आकांक्षा मिट्टी की दीवारों को कलात्मक रूप देती है। यहाँ कला और जीवन के बीच कोई दूरी नहीं है। दोनों एक-दूसरे में घुले हुए हैं।

आधुनिक समय में जब गाँवों की संरचना बदल रही है, कच्चे घरों की जगह पक्के मकान ले रहे हैं और जीवन की गति निरन्तर तेज़ होती जा रही है, तब पीड़िया कला के सामने भी नई चुनौतियाँ उपस्थित हैं। कई स्थानों पर यह परम्परा कमजोर हुई है, किन्तु उसका सांस्कृतिक महत्व कम नहीं हुआ। वास्तव में जितनी तेजी से आधुनिकता फैल रही है, उतनी ही आवश्यकता इन लोकपरम्पराओं को समझने और संरक्षित करने की भी बढ़ रही है। क्योंकि इनके भीतर केवल अतीत नहीं, बल्कि समुदाय की सांस्कृतिक स्मृति सुरक्षित रहती है।

पीड़िया कला को देखते हुए बार-बार यह अनुभव होता है कि मनुष्य का सबसे बड़ा कलाकार उसका जीवन ही है। जिन हाथों ने खेतों में रोपनी की, जिन्होंने घर सँभाला, जिन्होंने बच्चों को पाला, वही हाथ दीवारों पर ऐसी आकृतियाँ बना देते हैं जिनमें लोकसौन्दर्य का अद्भुत संसार बसता है। यह कला किसी प्रसिद्ध नाम की मोहताज नहीं। इसकी पहचान उसका सामूहिक हृदय है।

बिहार और उत्तर प्रदेश की पीड़िया कला केवल एक लोकचित्रण परम्परा नहीं है। वह लोकसंस्कृति की धड़कन है, स्त्री-सृजन की मौन गाथा है और उस ग्रामीण सौन्दर्यबोध की जीवित अभिव्यक्ति है जो आज भी मिट्टी, स्मृति और मनुष्य के बीच एक अदृश्य सेतु बनाकर खड़ा है। उसकी रेखाएँ समय के साथ फीकी पड़ सकती हैं, किन्तु उनमें निहित सांस्कृतिक अर्थ भारतीय लोकजीवन की स्मृति में बहुत देर तक उजाला करते रहेंगे।

आभार- परिचय दास सर

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