टीएमसी के 20 बागी सांसदों ने त्रिपुरा की NCPI पार्टी में विलय किया,क्यों?
श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी इस समय बड़े संकट से गुजर रही है। टीएमसी के 20 बागी लोकसभा सांसदों ने ममता बनर्जी का साथ छोड़ने के बाद अधिकांश लोगों को यही उम्मीद थी की वह उसी रास्ते पर चलेंगे, जिस पर दशकों से देशभर की कई राजनीतिक पार्टियां चली हैं। यानी बीजेपी में शामिल होना।
लेकिन बीजेपी (BJP) में शामिल होने के बजाय, इन सांसदों ने कानूनी पेचीदगियों से बचने के लिए त्रिपुरा की एक छोटी और अज्ञात पार्टी ‘नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया’ (NCPI) में विलय का रास्ता चुना है।
‘नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया’ (NCPI) त्रिपुरा स्थित एक रजिस्टर्ड लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक पार्टी है। इसकी राजनीतिक अहमियत न होना ही शायद इसकी सबसे बड़ी खूबी थी। इसने बागियों को TMC से निकलने का कानूनी रूप से सुरक्षित रास्ता दिया और साथ ही BJP को उन्हें तुरंत पार्टी में शामिल किए बिना उनके समर्थन का फायदा उठाने का मौका भी दिया।
सोची-समझी कानूनी रणनीति
TMC गुट का NCPI में विलय करने का फैसला भले की अजीब लग रहा है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह कदम सांसदों की सदस्यता बचाने की एक सोची-समझी कानूनी रणनीति है। इससे बागी सांसदों को संसद में अपनी सामूहिक ताकत बनाए रखने के लिए कानूनी सुरक्षा मिल जाएगी और साथ ही, बीजेपी को भी पश्चिम बंगाल में स्थानीय स्तर पर किसी बड़े राजनीतिक विरोध का सामना किए बिना संसद में इन सांसदों का समर्थन हासिल हो जाएगा।
एक ओर जहां टीएमसी नेतृत्व इस बगावत को संगठन के लिए बेअसर बता रहा है, वहीं विपक्षी नेता इसे पूरी तरह से बीजेपी की सह पर किया गया संसदीय और कानूनी खेल मान रहे हैं।
NCPI में ही क्यों शामिल होना चाहे TMC के बागी सांसद
सूत्रों के अनुसार, बागी सांसदों की मूल योजना बहुत साफ थी- वे दो-तिहाई सांसदों के साथ टीएमसी संसदीय दल से अलग होना चाहते थे, ताकि संसद में अपना एक स्वतंत्र गुट बनाकर बीजेपी (BJP) के नेतृत्व वाले एनडीए (NDA) को अपना समर्थन दे सकें।
हालांकि, संसद के कड़े नियमों और दल-बदल विरोधी कानून के कारण ऐसी व्यवस्था के लिए कोई गुंजाइश नहीं बची थ। इस गंभीर कानूनी अड़चन को देखते हुए बागियों ने रणनीति बदली और एनसीपीआई (NCPI) का रुख किया, क्योंकि यह अज्ञात दल उन्हें वह कानूनी मान्यता (legitimacy) दे सकता था, जो एक स्वतंत्र गुट के रूप में उन्हें कभी नहीं मिल पाती।
क्या बोले बागी सांसद?
एक वरिष्ठ बागी सांसद ने साफ किया कि यह फैसला “विचारधारा के बजाय व्यावहारिक प्राथमिकताओं” पर आधारित था। हम सभी सामूहिक रूप से आगे बढ़ना चाहते थे और बिना किसी अनावश्यक प्रक्रियात्मक अड़चन के ममता बनर्जी के नियंत्रण से बाहर अपनी एक राजनीतिक जमीन तैयार करना चाहते थे। ऐसे में एनसीपीआई (NCPI) का रास्ता हमारे लिए एक व्यावहारिक संसदीय समाधान साबित हुआ।”
वहीं, माकपा (CPI-M) नेता सुजन चक्रवर्ती का मानना है कि बागियों का यह कदम पश्चिम बंगाल विधानसभा के भीतर हुए समानांतर विद्रोह से सीखे गए सबक को दर्शाता है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि यह कोई राजनीतिक विलय नहीं, बल्कि विशुद्ध रूप से एक कानूनी तिकड़म है। उनका तर्क है कि लोकसभा के बागी सांसद उन तमाम कानूनी पेचीदगियों से बचना चाहते हैं, जो राज्य विधानसभा में टीएमसी (TMC) के बंटवारे के बाद पैदा हुई थीं।
विधानसभा और लोकसभा की बगावत में जमीन-आसमान का अंतर
विधानसभा और लोकसभा की बगावत में जमीन-आसमान का फर्क है। एक ओर जहां विधानसभा के बागी विधायकों ने खुद को ‘असली टीएमसी’ बताकर आधिकारिक नेतृत्व को चुनौती दी थी, जिससे मामला तुरंत अदालती लड़ाई और दावों-प्रतिदावों में फंस गया, वहीं लोकसभा के बागी सांसदों ने सोच-समझकर खुद को इस संगठनात्मक और अदालती विवाद से दूर रखा है।
वे पार्टी के संगठन, चुनाव चिह्न या ढांचे पर कब्जे का कोई दावा नहीं कर रहे हैं, बल्कि उन्होंने व्यावहारिक रूप से यह स्वीकार कर लिया है कि मूल टीएमसी ममता बनर्जी के पास ही रहेगी, बागी सांसदों का पूरा जोर सिर्फ पार्टी के ‘संसदीय विंग’ (Parliamentary Wing) को उनके नियंत्रण से आजाद कराने पर है।
