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मुफ्त बिजली और कृषि सब्सिडी का बोझ राज्यों के खजाने पर वित्तीय दबाव डाल रहा है

मुफ्त बिजली और कृषि सब्सिडी का बोझ राज्यों के खजाने पर वित्तीय दबाव डाल रहा है

श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

मुफ्त बिजली और कृषि सब्सिडी का बढ़ता बोझ राज्यों के खजाने पर करारा प्रहार कर रहा है। राजस्व व्यय में सब्सिडी की हिस्सेदारी लगातार बढ़ना कई राज्यों के वित्तीय प्रबंधन के लिए गंभीर खतरे का संकेत दे रहा है। नियंत्रक व लेखा परीक्षक (सीएजी) की तरप से आज राज्यों के वित्त पर जारी रिपोर्ट ‘स्टेट फाइनेंस 2024-25’ के मुताबिक वित्त वर्ष 2024-25 में राज्यों का कुल सब्सिडी व्यय 4,37,326 करोड़ रुपये रहा, जिसमें ऊर्जा क्षेत्र की सब्सिडी अकेले 1,89,802 करोड़ रुपये (43.40 प्रतिशत) है।

कितना हो रहा खर्च?

ऊर्जा और कृषि एवं संबद्ध गतिविधियां मिलकर कुल सब्सिडी का लगभग 73 प्रतिशत हिस्सा रखती हैं। सब्सिडी का बोझ राज्यों के खजाने पर किस कदर बोझ डाल रहा है, इसे इस बात से समझा जा सकता है कि पिछले एक दशक में राज्यों के राजस्व में औसतन 137 फीसद (की वृद्धि हुई है जबकि इनकी तरफ से दी जाने वाली सब्सिडी की राशि में 214 फीसद (1.39 लाख करोड रुपये से बढ़ कर 4.32 लाख करोड़ रुपये हो गई है।

बताते चलें कि भारतीय राजनीति में पिछले एक दशक में मुफ्त बिजली एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन कर उभरा है। इसकी शुरुआत दिल्ली में आम आदमी पार्टी ने की, जहां 200 यूनिट तक मुफ्त बिजली का प्रावधान लंबे समय से चल रहा है। दिल्ली के बाद में कई अन्य राज्यों में विभिन्न राजनीतिक दलों ने इसे आजमाया व सफलता हासिल की।

पंजाब में भी आप सरकार ने इसी मॉडल को लागू किया। पिछले दो वर्षों में कई राज्यों में भाजपा, कांग्रेस या क्षेत्रीय दलों की सरकारों ने भी कृषि और घरेलू उपभोक्ताओं के लिए मुफ्त या अत्यधिक सब्सिडी वाली बिजली योजनाएं शुरू या विस्तारित की हैं, जैसे कर्नाटक की गृह ज्योति योजना और राजस्थान की घरेलू उपभोक्ताओं के लिए 100 यूनिट मुफ्त बिजली जैसी पहल।

क्या कहतें हैं आंकड़ें?

ये योजनाएं चुनावी वादों का हिस्सा बनकर राज्य सरकारों पर वित्तीय दबाव बढ़ा रही हैं। सीएजी रिपोर्ट के अनुसार वित्त वर्ष 2024-25 में ऊर्जा सब्सिडी में सबसे ज्यादा खर्च करने वाले शीर्ष पांच राज्य हैं, राजस्थान (32,572 करोड़ रुपये), कर्नाटक (26,701 करोड़ रुपये), मध्य प्रदेश (18,790 करोड़ रुपये), उत्तर प्रदेश (17,392 करोड़ रुपये) और महाराष्ट्र (16,094 करोड़ रुपये)।

इन राज्यों में आम जनता को मासिक मुफ्त बिजली की सीमा अलग-अलग है, राजस्थान में घरेलू उपभोक्ताओं को 100 यूनिट तक मुफ्त, कर्नाटक में 200 यूनिट, दिल्ली के माडल की तर्ज पर अन्य राज्यों में भी 100-200 यूनिट तक की सब्सिडी दी जा रही है, जिससे बिजली वितरण कंपनियों (डिस्काम) के राजस्व घाटे की भरपाई राज्य खजाने से की जा रही है।

कुल मिलाकर वित्त वर्ष 2024-25 में राज्यों द्वारा दी गई सब्सिडी 4,37,326 करोड़ रुपये रही, जिसमें महाराष्ट्र (56,104 करोड़ रुपये), तमिलनाडु (52,603 करोड़ रु.), कर्नाटक (48,114 करोड़ रु.), मध्य प्रदेश (43,687 करोड़ रु.) और राजस्थान (34,024 करोड़ रु.) जैसे शीर्ष पांच राज्य अकेले 54 फीसद हिस्सा रखते हैं।

इन सभी राज्यों की तरफ से दी जाने वाली सब्सिजी में बिजली सब्सिडी की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा है। यह स्थिति राज्यों को दीर्घकालिक वित्तीय स्थिरता और विकास योजनाओं के लिए चुनौती बनाती जा रही है।

 

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