अभिज्ञान के पुंज: स्वर्गीय सुभाष्सकर पांडेय
चेतना की प्रतिमूर्ति: योजनाकार सुभाष्सकर पांडेय
संवेदना के शृंग: अधिवक्ता सुभाष्सकर पांडेय
सदाशयता, सदाचार एवं सद्भावना के दृष्टांत: लेखक सुभाष्सकर पांडेय।
श्राद्ध संस्कार पर विशेष श्रद्धांजलि।
✍️ राजेश पांडेय
श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

“गोरी सोए सेज पर मुख पर डारे केस
चल खुसरो आपने रैन भई चहुं देस ।”
अमीर खुसरो की उक्त पंक्तियां हजारों वर्षों से मृत्यु की अटलता को बयां करता है। क्योंकि निधन एक स्वाभाविक एवं अंतिम सच्चाई है, परन्तु कभी-कभी यह लगता है कि यह संपूर्ण जीवन, मृत्यु के पहले का बवाल है।
सुभाष्सकर पांडेय अपने सक्रिय तेरासी वर्षों के जीवन में परकाया प्रवेश करते हैं, इसके लिए उनके पास एक अद्भुत भाव-भंगिमा है, जो विरासत में मिली थी, जो विद्वता से परिपूर्ण है यह स्वाभिमान के साथ समाज में जीवंत रही।
अपने से मिलने वाले प्रत्येक व्यक्ति को वह प्रभावित कर जाते थे। सक्रिय जीवन की दिनचर्या में तीन पीढियां के साथ आपका संवाद अटूट था। नातिन- पोती की उम्र के बच्चों के साथ आपका स्नेह, अपने उस उम्र की याद ताजा करता है जहां आप इस मिट्टी के साथ जीवंत रहे, तो दूसरी पीढ़ी के तरुण, व्यस्क एवं किशोर युवाओं के साथ आपका संवाद समय, समाज को समझने और समझने हेतु ख्यातप्रद रहा। आपकी बेबाक टिप्पणी उन्हें आश्वस्त कर जाती थी। तीसरी पीढ़ी में अपने मित्र बृजमोहन रस्तोगी एवं नागेंद्र मिश्रा जी से आप नित्य मिला करते थे और उनसे अपनी दैनिक ऊर्जा अवश्य ग्रहण करते थे।
अपने पेशेवर कार्य (अधिवक्ता) में आप सदैव सकारात्मक रहे अर्थात बदलते दौर में धन संग्रह करने हेतु आपके नैतिकता से किसी भी प्रकार का समझौता नहीं किया। आपने सदैव सकारात्मक आवेदन कर्ताओं के मामलों को न्यायालय के समक्ष में रखा। इसके लिए आप कई बार हाईकोर्ट भी गए। आपका कहना होता था कि व्यक्ति अगर सही है तो उसे न्याय मिलना ही चाहिए। इस नीति पर आपने कार्य किया।
आपकी दुर्लभ कार्य शैली आपको कभी काल-कवलित नहीं होने देगी क्योंकि आपका चरित्र अमरता एवं नश्वरता का प्रतीक रहा है।
” नाता-रिश्ता छुड़ाएं जात हो, निर्बल जानी के मोय।
हृदय से जब जाओगे तो सबल जानूंगा तोय।”

हमारी जैसी पीढ़ी को यह सौभाग्य प्राप्त है कि हमने स्वर्गीय सुभाष्सकर पांडेय जैसे व्यक्तित्व से संवाद स्थापित किया और उनके तर्कों को सुना है, उनके स्पष्टवादिता को आत्मसात किया है।
व्यक्ति का शरीर छोड़ देना सत्य की स्वीकृति है। जो सभी के जीवन में चौथे पहर में आ खड़ा होता है। विदाई निश्चित होती है परन्तु हम अपने को विभिन्न तर्कों से उस व्यक्ति को ओझल करना चाहते है।
मस्तिष्क एवं हृदय निरंतर उसकी स्मृति को प्रत्यक्ष आविर्भूत करता है, ऐसा होने पर व्यक्ति भावुक हो जाता है, उसकी यह भावुकता आंसू के रूप में उत्पन्न होती है।
अपने सुवास से सौम्य, सरस एवं सरल व्यक्तित्व के धनी पांडेय जी सदैव युवाओं के साथ रहना पसंद करते थे। इस स्वभाव से वे नई पीढ़ी से ऊर्जा एवं स्फुर्ति का मर्म अनुभव करते हैं। इसकी बानगी उनके साथ तर्क एवं विभिन्न पर्व-तीज-त्योहारों में होने वाले आयोजनों में देखा जा सकता था। नगर के युवा पत्रकारों के साथ अपने ही परिसर में होली का आयोजन करना सभी की स्मृतियों में वर्षों तक बना रहेगा।
पांडेय जी सदैव प्रत्येक समारोह में एक साधारण व्यक्ति की तरह प्रवेश करते हैं परन्तु उनकी सौम्यता एवं सरलता उन्हें विशिष्टता प्रदान करती रही। अपने तर्क के क्रम में वह कहां करते थे कि बोध आवश्यक शब्द है, एक समय के बाद व्यक्ति के काया में इसका स्थान होना चाहिए। वह स्वबोध, शत्रु बोध एवं मृत्यु बोध है। यही कारण है की मृत्यु जीवन की अंतिम अतिथि है परन्तु जीवन-मरण के चक्र में सदैव जीवन की चर्चा होती है।
सीवान की वसुंधरा ने समय-समय पर अपने रत्नगर्भा से कई रत्न पैदा किए हैं इनमें बृजकिशोर प्रसाद, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, खुदा बख्श खां, नारायण बाबू, सैयद हसन असगरी, मौलाना मजरुलहक, वैधनाथ प्रसाद उर्फ दाढ़ी बाबा, जगदीश दीन, बी.बी मिश्रा, संत कुमार वर्मा, उमाशंकर प्रसाद, कुमार बिहारी पांडेय, घनश्याम शुक्ल, मुरलीधर शुक्ल उर्फ आशा शुक्ला जैसे अनेकों नाम है। इसमें आज से सुभाष्सकर पांडेय का भी नाम सम्बद्ध हो गया है।
बहरहाल जब जीवन के पहर में मृत्यु से भय नहीं होता, व्यक्ति में परिपक्वता दिखाई पड़ने लगती है। व्यक्ति का अपने के बीच लगाव एवं कई परियोजनाओं पर स्वैच्छिक कार्य उसे स्वाभाविक एवं अंतिम सच्चाई से दूर ले जाने का प्रयास करती है। कहते हैं कि महापुरुषों के नहीं रहने से समाज निर्बल हो जाता है परन्तु मन, कर्म एवं वाणी की समानता व्यक्ति के व्यक्तित्व गढ़ने में भरपूर सहायक होती है।
मृत्यु व्यक्ति का अंत नहीं है बल्कि वह जीवन को नया अर्थ प्रदान करती है। क्योंकि जीवन की लंबाई नहीं जीवन की गहराई बोध प्रदान करती है।

अंततः मैं तेरे ही सदन आऊंगा,
उठो जागो सुबह हो गई,
एक नई स्फूर्ति-उमंग और पहचान लिए,
एक नई सुगंध एवं एक नई कलेवर के साथ,
सदैव मैं तेरे साथ खड़ा हूं,
उठो जागो देखो!देखो!…..
