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जब तक यह संवाद जीवित है, तब तक फगुआ नहीं मरेगा

जब तक यह संवाद जीवित है, तब तक फगुआ नहीं मरेगा

फगुआ महज, एक पर्व भर नहीं है, वह लोक के भीतर धड़कती कविता है

श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

आज होली है। फागुन की इस दोपहर में कोई पुरानी स्मृति-धुन लौट रही है। हवा में गीले आम्र-मंजरियों की गंध है। कहीं दूर घंटियों की धीमी टुनटुनाहट। पर, भीतर कुछ खटकता है। जैसे यह मौसम पहले जैसा नहीं रहा। क्या यह वही फागुन है, जो बचपन में खेतों की मेड़ों पर दौड़ते हुए हमारे गालों पर परस जाता था? या अब यह महज़ कैलेंडर की तारीख बन गया है?

वे बीते दिन याद आते हैं। तब फगुआ महज, एक पर्व भर नहीं होता था। वह लोक के भीतर धड़कती कविता थी। लोककंठ में रचे-बसे गीतों में। उनके ठहाकों में, उनकी थकान में। गोधूलि के उस धुंधलके में जब गाँव की औरतें रंग-अबीर से भीगी अँचलों में फगुनी गीत गातीं। तब लगता था कि जीवन खुद एक उत्सव है। ढोलक की थाप से उठता लोकसंगीत जैसे मनुष्य और प्रकृति के मधुर मिलन का प्रतीक बन जाता था।

आज भी फगुनी बयार चल रही है। आम की डालियों में मंजरियाँ झूम रही हैं। पर मन किसी अजीब रिक्ति से भर गया है। चारों ओर होली की चर्चा है। व्हाट्सएप होली के संदेश, फारवर्ड से भरा है। बाजार सजे हैं। पर भीतर वह गुंज नहीं है जो कभी ‘फगुआ’ के दिनों में गली-कूचों में फूट पड़ती थी। तब लोग होली नहीं मनाते थे, वे फगुआ जीते थे।

गाँव के चौपाल से लेकर खेत की मेड़ों तक, ढोलक की थाप और मंजीरे की छनछन में जैसे कोई सामूहिक स्वर लहरी फूट उठती थी। अधपके गन्ने के रस जैसी मीठी। माटी से सनी हुई उस आत्मा की गंध आज कहीं बिखर गई है। आज भी रंग तो लगते हैं, पर वे चेहरे पर टिकते नहीं। क्योंकि मन तक पहुँचने का रास्ता शायद खो गया है।

याद आता है। फगुआ का अर्थ था, मिलन। रंगों में, हँसी में, बोली में। न कोई छोटा, न कोई बड़ा। सब एक ही लय में झूमते थे। फगुनी मस्ती में। अब वह लय टूट गई है। कान पर हेडफोन हैं। पर मन के संगी-साथी चुप हैं। होली अब शोर में है, वह सहज उल्लास अब बाजार में बंद पैकेटों में कैद है।

और हाँ, भाषा भी बदल गई है। ‘फगुआ’ की जगह ‘होली’ ने ले ली है। यह सिर्फ शब्दों का बदलाव नहीं, यह संस्कारों की रचना के ढर्रे का टूटना है। फगुआ लोक की वस्तु थी। माटी की। बोली की। रिश्तों की। होली शहरी है। अभिजात्य। उसमें कृत्रिम रंगों की चमक है, पर माटी की सौंध नहीं।

आज वही लोकगीत मोबाइल के स्पीकर में कैद हैं। अबीर उड़ता है, मगर हवा में नहीं। कॉरपोरेट ब्रांडिंग के बैनरों पर। रंग हैं, पर उनमें मिट्टी की गंध नहीं। खाना वही है, पर स्वाद बदल गया है। मानो रिश्तों का स्वाद भी फीका पड़ गया हो। अब होली, फगुआ नहीं रही, वह रंग का व्यापार हो गई है।

फगुआ कभी आत्मा की खिलखिलाहट थी। उसमें हास्य था, ठिठोली थी, पर वह किसी का अपमान नहीं करती थी। आज के रंगों में जो छींटें हैं, वे मन पर चुभते हैं। कभी रंग लगाते हुए लोग दिल मिला लेते थे। अब सेल्फी खिंचवाकर मुस्कुरा लेते हैं। फर्क यह नहीं कि रंग बदले हैं; फर्क यह है कि संवेदना बदल गई है।

लोक का अर्थ यही था। एक साझा अनुभव, सामूहिक जीवन की थाप। उसमें न कोई बड़ा था, न छोटा। ऊँच-नीच के भेद रंगों में धुल जाते थे। वह समाज के नवनीकरण का पर्व था। फागुन का मूल अर्थ क्या है? मनुष्य में पुनरुत्थान। यह पुनरुत्थान केवल पीताम्बरधारी मोहन का नहीं, बल्कि हमारे भीतर बसे बालकृष्ण का है, जो छल-छद्म के संसार में भी सच्ची हँसी उगल सकता है।

वर्तमान में जब हम ‘होली’ मनाते हैं, एक उत्सव जिसका बाजार मूल्य तय हो चुका है, तो ‘फगुआ’ जैसे भीतर बैठा बच्चा चुपचाप कोने में बैठ जाता है। वह जानता है, रंगों का अर्थ अब उतना सहज नहीं रहा। अबीर से अधिक मायने रखता है अब इंस्टाग्राम का फिल्टर। पर उस बच्चे को मारना नहीं चाहिए। वह हमारी असल जड़ है।

फिर भी मन के किसी कोने में अब भी वह पुराना स्वर गूँजता है,’ सदा आनंद रहे एही द्वारे, मोहन खेले होरी हो।’ शायद वही स्वर स्मृति का रंग है, जो हमें बताता है कि जब तक स्मृतियाँ जीवित हैं, फगुआ पूरी तरह कभी मरेगा नहीं। वह लौटेगा, किसी बच्चे की पहली पिचकारी में, किसी पुरानी औरत की गाई फगुनाही में, या किसी थके हुए मनुष्य के मुस्कान में जो बसंत को महसूस कर लेता है।

फागुन की सिखावन क्या है? समय चाहे बदल जाए, यदि मनुष्य अपनी जड़ों से जुड़ा रहे, तो ऋतुएँ कभी बूढ़ी नहीं होतीं। मिट्टी का रंग बदल सकता है। पर उसकी गंध वही रहती है। और यही गंध ही जीवन का सौंदर्य है। यह गंध हमारे लोकगीतों, होरी और कजरी में बसती है। जहाँ आनंद तपस्या से टकराता नहीं, बल्कि उसी से उपजता है। दरअसल फगुआ का यही दर्शन है। मनुष्य का मनुष्य से मिलन, जीवन का जीवन से संवाद। जब तक यह संवाद जीवित है, तब तक फगुआ नहीं मरेगा। वह बस किसी कोने में बैठा हमारे लौटने की प्रतीक्षा करता रहेगा।

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