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EC नहीं कर सकता नागरिकता का निर्धारण- सुप्रीम कोर्ट

EC नहीं कर सकता नागरिकता का निर्धारण- सुप्रीम कोर्ट

श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (17 जुलाई) को पश्चिम बंगाल में वोटर लिस्ट के ‘स्पेशल इंटेंसिव रिविजन’ (SIR) के बाद की स्थिति से जुड़ी एक याचिका पर सुनवाई अगस्त तक टाल दी लेकिन दो टूक लहजे में कहा कि भारत का चुनाव आयोग (ECI) किसी की भी नागरिकता तय नहीं कर सकता। चीफ जस्टिस (CJI) सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने यह टिप्पणी तब की, जब वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायणन ने बताया कि वोटर लिस्ट से नाम हटने के बाद लोगों को सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) और जाति प्रमाण पत्र जैसी योजनाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है।

इस पर जस्टिस बागची ने कहा, “हमने बिहार SIR मामले में पहले भी बताया था कि ECI की यह जिम्मेदारी है कि जब ट्रिब्यूनल कहे कि कोई व्यक्ति SIR लिस्ट में नहीं हो सकता, तो ECI को नागरिकता कानून के तहत नागरिकता तय करने के लिए मामले को मंत्रालय के पास भेजना चाहिए।” कोर्ट ने कहा कि नागरिकता तय करने के मामले में ECI कोई संवैधानिक अथॉरिटी नहीं है। जस्टिस बागची ने कहा, “कानून में कोई कन्फ्यूजन नहीं है…इसे साफ कर लीजिए। नागरिकता तय करने के मामले में निर्वाचन आयोग कोई संवैधानिक प्राधिकरण नहीं है। निर्वाचन आयोग का अधिकार केवल मतदाता सूची के पर्यवेक्षण और नियंत्रण तक है।”

अब भी 33.5 लाख अपीलें लंबित

कोर्ट पश्चिम बंगाल में अपीलेट ट्रिब्यूनल के कामकाज से जुड़ी एक याचिका पर सुनवाई कर रहा था। शंकरनारायणन ने कहा कि जिस तरह से 19 ट्रिब्यूनल काम कर रहे थे, उससे प्रैक्टिकल लेवल पर गड़बड़ी और देरी हो रही थी। वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि अब भी 33.5 लाख अपीलें लंबित हैं और जिन मामलों का निपटारा हो चुका है, उनमें करीब 70 प्रतिशत दावों को स्वीकार किया गया है। उन्होंने कहा, ”लेकिन, जब तक इन अपीलों का निपटारा होता है, तब तक संबंधित लोगों को पीडीएस और अन्य सरकारी योजनाओं से बाहर कर दिया जाता है।”

25 अगस्त को अगली सुनवाई

पीठ ने इस नयी याचिका को पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी सहित एसआईआर से संबंधित अन्य लंबित याचिकाओं के साथ 25 अगस्त को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने पर सहमति जताई। याचिका में संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के तहत प्रदत्त अधिकारों को लागू कराने का अनुरोध किया गया है। याचिका में कहा गया है कि पश्चिम बंगाल में एसआईआर प्रक्रिया के दौरान सत्यापन चरण में 58 लाख से अधिक मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। इसके बाद दावों और आपत्तियों के चरण में नाम जोड़ने के लिए 9.64 लाख (फॉर्म-6 और 6ए) तथा नाम हटाने के लिए 99 हजार से अधिक (फॉर्म-7) आवेदन प्राप्त हुए। इसके बावजूद 28 फरवरी को प्रकाशित अंतिम मतदाता सूची में केवल लगभग 1.82 लाख नए नाम ही शामिल किए गए।

याचिकाकर्ता ने कहा कि निर्वाचन आयोग ने विधानसभा क्षेत्रवार यह जानकारी सार्वजनिक नहीं की है कि कितने आवेदन प्राप्त हुए, कितने स्वीकार किए गए या कितने खारिज हुए। इससे पूरी प्रक्रिया की सार्वजनिक निगरानी और पारदर्शिता सीमित हो गई है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी शुक्रवार को पश्चिम बंगाल में SIR से जुड़ी याचिका पर सुनवाई के दौरान की. सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि नागरिकता तय करना EC का संवैधानिक अधिकार नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग का अधिकार केवल वोटर लिस्ट के नियंत्रण और पर्यवेक्षण तक ही सीमित है. सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि कानून की स्थिति में कोई भ्रम नहीं है.

कोर्ट ने कहा कि कोई ट्रिब्यूनल किसी व्यक्ति का नाम एसआईआर की सूची में शामिल नहीं करने का फैसला देता है, तो निर्वाचन आयोग को नागरिकता निर्धारण के लिए मामला संबंधित मंत्रालय को भेजना होगा. मतदाता सूची में नाम नहीं होने से नागरिकता अपने आप खत्म नहीं होती. कोर्ट ने उस याचिका को भी सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया.

इस याचिका में पश्चिम बंगाल एसआईआर के विधानसभा क्षेत्र के आधार पर जानकारी मांगने की अपील की गई है. सुप्रीम कोर्ट इस याचिका पर अगली सुनवाई अब 25 अगस्त को करेगा. गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट पहले भी यह साफ कर चुका है कि नागरिकता तय करना चुनाव आयोग का काम नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि एसआईआर और वोटर लिस्ट का नागरिकता से कोई सीधा नाता नहीं है.

गौरतलब है कि हाल ही में झारखंड का एक वीडियो वायरल हुआ था. एसआईआर फॉर्म भरने के नाम पर कथित उगाही के इस वीडियो में दावा किया गया था कि नागरिकता न जाए, इसके लिए एसआईआर फॉर्म भरने के लिए 50 से सौ रुपये तक की उगाही की जा रही थी. यह धनराशि खर्चा-पानी के नाम पर ली जा रही थी.

 

 

 

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