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सोने के अधिक आयात से अर्थव्यवस्था को नुकसान होता है,कैसे?

सोने के अधिक आयात से अर्थव्यवस्था को नुकसान होता है,कैसे?

श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्‍क

आर्थिक थिंक टैंक जीटीआरआई ने सरकार ने अपनी मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए) नीतियों की समीक्षा करने का आग्रह किया है। इसका कारण यह है कि भारत-संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के बीच हुए व्यापार समझौते के तहत दुबई को कीमती धातुओं पर टैरिफ छूट दी गई। इसने हाल ही में सोने के आयात में हुई भारी बढ़ोतरी में काफी योगदान दिया है।

भारत-यूएई के बीत व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौता (सीईपीए) मई 2022 में लागू हुआ था। इस समझौते के तहत, भारत ने टैरिफ रेट कोटा (टीआरक्यू) प्रणाली के माध्यम से संयुक्त अरब अमीरात से सोने के आयात पर सामान्य आयात शुल्क से एक प्रतिशत कम टैरिफ की अनुमति दी।

भारत-यूएई एफटीए से दुबई से सोना आयात बढ़ा

यह कोटा सालाना 120 टन से शुरू हुआ और 2027 तक बढ़कर 200 टन हो जाएगा, जो भारत के सोने के आयात का लगभग 25 प्रतिशत हिस्सा कवर करेगा। जीटीआरआई के संस्थापक अजय श्रीवास्तव ने कहा कि 2024 के बजट में भारत ने सामान्य सोने के आयात शुल्क को 15 प्रतिशत से घटाकर 6 प्रतिशत कर दिया।

इसके परिणामस्वरूप, दुबई से आयातित सोना असल में भारत में केवल पांच प्रतिशत शुल्क पर ही प्रवेश कर पाया। तब से दुबई से आयात में भारी बढ़ोतरी हुई है। यूएई से भारत के सोने के बार (छड़) का आयात 2022 में 2.9 अरब डॉलर से बढ़कर 2023 में 6.7 अरब डॉलर और 2025 में 16.5 अरब डॉलर तक पहुँच गया।

भविष्य के समझौतों से कीमती धातुएं बाहर रखने की सलाह

सीईपीए लागू होने से पहले भारत के सोना आयात में दुबई की हिस्सेदारी 7.9 प्रतिशत थी, जो 2025 में बढ़कर 28 प्रतिशत पर पहुंच गई।श्रीवास्तव ने कहा कि यह रुझान चिंता पैदा करता है क्योंकि यूएई न तो सोने का खनन करता है और न ही वहां कोई बड़ी प्रसंस्करण गतिविधि होती है।

इससे प्रतीत होता है कि इस व्यापार का एक बड़ा हिस्सा तीसरे देशों से सोने को दुबई के रास्ते भारत भेजना है, ताकि भारत के कम टैरिफ का फायदा उठाया जा सके।

जीटीआरआई ने भारत के व्यापार संतुलन और विदेशी मुद्रा भंडार की रक्षा के लिए मूल-स्थान संबंधी नियमों को और कड़ा करने, एफटीए के तहत कीमती धातुओं पर दी गई रियायतों की समीक्षा करने और भविष्य के व्यापार समझौतों से सोना, चांदी, प्लेटिनम और हीरे को बाहर रखने की सिफारिश की है।

बीते वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान भारत का सोना आयात मात्रा के लिहाज से 4.76 प्रतिशत घटकर 721.03 टन रहा है। लेकिन मूल्य के लिहाज से यह 24 प्रतिशत बढ़कर 71.98 अरब डॉलर रहा है।

भारत हर साल बड़ी मात्रा में सोने का आयात करता है, 2021 में आयात 1,067 टन से अधिक रहा, जबकि सबसे कम आयात वाले वर्ष में भी आयात 430 टन से अधिक था। दीर्घकालिक वार्षिक औसत लगभग 800 टन के आसपास बना हुआ है, जिससे विदेशी मुद्रा के बहिर्वाह और चालू खाता संतुलन पर काफी दबाव पड़ता है।

यह चिंता ऐसे समय में और भी मायने रखती जब भारत का विदेशी मुद्रा भंडार, 6 मार्च 2026 को जारी आंकड़ों के अनुसार लगभग 728.49 अरब डॉलर तक पहुंचने के बाद, आयात लागत में वृद्धि और मुद्रा दबाव के कारण अस्थिरता दिखाते हुए 690.69 अरब डॉलर के करीब आ गया है। कमजोर रुपया सीधे तौर पर आयात की घरेलू लागत को बढ़ाता है, विशेष रूप से कच्चे तेल और सोने की, जिससे बाहरी जोखिम बढ़ जाते हैं।

नहीं खरीदा एक साल तक गोल्ड, तो क्या होगा?

  • FY26 में भारत का कुल आयात बिल: $775 बिलियन
  • इनमें 4 कमोडिटी की कुल लागत : $240+ बिलियन
  • क्रूड ऑयल: $134.7 बिलियन
  • गोल्ड: $72 बिलियन
  • खाने का तेल: $19.5 बिलियन
  • फर्टिलाइजर्स: $14.5 बिलियन

ये चार वस्तुएं भारत के कुल आयात का 31.1 प्रतिशत हिस्सा हैं लेकिन इनमें अकेले सोने का आयात कुल इंपोर्ट का करीब 10 प्रतिशत है। यही कारण है कि प्रधानमंत्री मोदी ने नागरिकों से इन वस्तुओं का उपयोग कम करने का आग्रह किया है।

यदि भारतीय एक वर्ष के लिए सोने की खरीद में कमी लाते हैं तो गोल्ड इंपोर्ट में 30-40% की गिरावट से भी 20-25 अरब डॉलर की बचत हो सकती है। 50% की गिरावट से 36 अरब डॉलर की बचत हो सकती है। खास बात है कि यह अनुमानित चालू खाता संख्या का लगभग आधा है। एक वर्ष तक सोना न खरीदने से भारत से डॉलर का आउटफ्लो सीधे तौर पर अरबों डॉलर तक कम हो सकता है।

पेट्रोल पर कैसे बचेगा सरकार का पैसा?

भारत, वर्तमान में अपनी जरुरत का 89% तेल आयात करता है। सोने की कीमतों के साथ तेल की कीमतों में वृद्धि (पिछले एक वर्ष में लगभग 70 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 113 डॉलर तक) सीधे तौर पर डॉलर के आउटफ्लो को बढ़ाती है। चूंकि, FY26 में भारत ने क्रूड ऑयल के आयात पर $134.7 बिलियन खर्च किए थे और अगर कच्चे तेल की कीमतें लगातार बढ़ती रहीं तो यह आंकड़ा तेजी से बढ़ेगा और भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर बुरा असर डालेगा।

इंडिपेंडेंट कमोडिटी एक्सपर्ट अनुज गुप्ता ने कहा, अगर देश में पेट्रोल-डीजल की डिमांड कम हुई तो खपत कम होगी और सरकार पर ज्यादा क्रूड इंपोर्ट करने का दबाव नहीं होगा। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार लगातार पेट्रोलियम प्रोडक्ट पर निर्भरता कम करने के लिए इलेक्ट्रिक व्हीकल्स को प्रमोट कर रही है, और आने वाले दिनों में लोग तेजी से ई-व्हीकल की ओर शिफ्ट हो सकते हैं, सरकारी खजाने और पर्यावरण की सुरक्षा, दोनों के लिहाज से अच्छा होगा।

अब विदेशी मुद्रा भंडार का गणित समझें

ट्रेडिंग इकोनॉमिक्स द्वारा संकलित आंकड़ों के अनुसार, भारत का विदेशी मुद्रा भंडार लगभग 690.69 अरब डॉलर है। आरबीआई के आंकड़ों से पता चलता है कि फरवरी में भंडार बढ़कर लगभग 728 अरब डॉलर हो गया था, लेकिन वैश्विक अनिश्चितता बढ़ने के कारण अप्रैल में यह घटकर लगभग 691 अरब डॉलर रह गया।
वहीं दूसरी ओर, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने अनुमान लगाया है कि भारत का चालू खाता घाटा (CA) 2026 में बढ़कर 84.5 अरब डॉलर हो सकता है, जो जीडीपी का लगभग 2 प्रतिशत है। चालू खाते में वृद्धि का सीधा सा मतलब है- आने वाले डॉलरों की तुलना में जाने वाले डॉलरों की संख्या अधिक होगी।

विदेश यात्राओं पर होने वाला औसत खर्च

टूर एंड ट्रैवल एजेंसी SOTC की रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय टूरिस्ट के लिए 2026 में एक सप्ताह की फॉरेन ट्रिप का औसत खर्च आम तौर पर ₹50,000 से ₹1.5 लाख प्रति व्यक्ति के बीच रहता है।

हालांकि, यह खर्च दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के लिए ₹2 लाख से अधिक हो सकता है, जबकि यूरोप या अमेरिका के लिए यह कॉस्ट ₹2 लाख से अधिक हो सकती है। चूंकि, डॉलर की कीमत बढ़ रहती है और रुपया कमजोर हो रहा है, ऐसे में विदेश यात्रा और विदेश में पढ़ाई करना, दोनों महंगा हो जाता है इसलिए इन पैकेज और विदेश में अन्य खर्च बढ़ सकते हैं।

  • वहीं, true yatri की रिपोर्ट के अनुसार, भारत से बजट वाली यूरोप ट्रिप (7 दिन का खर्च) ₹80,000 – ₹1,30,000 प्रति व्यक्ति आता है।
  • 10 दिन के लिए यह खर्च ₹1,50,000 – ₹2,50,000 प्रति व्यक्ति होगा।
  • जबकि, लक्जरी ट्रिप (10-15 दिन) के लिए यह बजट ₹3,00,000 – ₹6,00,000+ प्रति व्यक्ति तक जा सकता है।

फ्लाइट फेयर

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