अमलतास दिखा ,वह पीला है, पर चंचल नहीं,वह उजला है, पर आक्रामक नहीं
श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

कॉलेज से लौटते हुए अमलतास दिखा। वह रास्ते के किनारे नहीं, जैसे समय के किनारे खड़ा था। धूप मंथर थी। हवा अलसाई। सूरज लौट रहा था। आकाश में बदरी, छाने को उत्सुक। तप्त धरती पर बारिश की प्रतीक्षा। ऐसे समय में उसका खिलना किसी शास्त्र-वाक्य की तरह लगा। शांत। स्पष्ट। और भीतर तक उतर जाने वाला।
अमलतास का फूल देखकर सबसे पहले उसका रंग नहीं, उसकी मर्यादा ध्यान खींचती है। वह पीला है। पर चंचल नहीं। वह उजला है, पर आक्रामक नहीं। वह जैसे अपनी शोभा को भी संयम में रखता है। उसकी डालियाँ झुकी हुई थीं। यह झुकना हार का नहीं, परिपक्वता का था। फलों से लदी शाखा जिस तरह अपना भार स्वयं नीचे कर लेती है, वैसे ही फूलों से भरा अमलतास अपने सौंदर्य को भी नम्रता में बदल देता है।
भारतीय काव्य-परंपरा में वृक्ष केवल वनस्पति नहीं रहे। वे ऋतु के सहचर रहे हैं। वे मनुष्य के भावों के साझेदार रहे हैं। कालिदास ने प्रकृति को इसी कारण जीवित, संवेदनशील और अर्थपूर्ण बनाया। ऋतुओं का परिवर्तन उनके यहाँ केवल मौसम का परिवर्तन नहीं है। वह मन:स्थितियों का भी रूपांतरण है। अमलतास उसी परंपरा का आधुनिक साक्ष्य है। वह जेठ की दाहकता में भी सौंदर्य की संभावना रचता है। वह बताता है कि तपन और प्रस्फुटन विरोधी नहीं, एक ही जीवन-प्रवाह के दो छोर हैं।
अरग्वध का नाम सुनते ही औषधि का बोध होता है। यह वृक्ष रोग हरने वाला है। पर भारतीय दृष्टि में औषधि केवल शरीर की नहीं होती। वह मन की भी होती है। थकी हुई आँख के लिए उसका पीला फूल औषध है। उकताए हुए मन के लिए उसकी छाया औषध है। और सूखती हुई संवेदना के लिए उसकी उपस्थिति औषध है। ऐसे वृक्ष आसपास रहें, तो शहर भी थोड़ा अधिक रहने योग्य लगता है।
उसकी पीली लताएँ मुझे लोकगीतों की पंक्तियों जैसी लगीं। लम्बी। लचीली। और मद्धिम लय वाली। उनमें कोई जल्दबाजी नहीं थी। कोई आग्रह नहीं था। जैसे गाँव की कोई बूढ़ी स्त्री आँगन में बैठकर चुपचाप सूप फँटक रही हो। कंकड़ छाँट रही हो। जैसे किसी बच्चे ने पहली बार धूप का स्वाद लिया हो। लोक में जो सच्चा होता है, वह अक्सर सरल भी होता है। अमलतास की सरलता उसी लोकगंध की है।
कुछ देर उसके नीचे खड़ा रहा। नीचे गिरे फूलों को देखा। वे पेड़ से अलग होकर भी व्यर्थ नहीं लगे। लगा जैसे प्रकृति अपने सौंदर्य को बाँटना जानती है। जो फूल शाखा पर है, वह दृश्य है। जो नीचे झर गया, वह स्मृति है। और स्मृति दृश्य से अधिक देर तक रहती है।
पर, इस अमलतास से मनई क्या सीख सकता है? यह वृक्ष मनुष्य को एक और बात सिखाता है। खिलना केवल वसंत का अधिकार नहीं। जीवन की कठोर ऋतुओं में भी सुंदरता जन्म ले सकती है। जरूरी यह है कि भीतर की ऋतु जीवित रहे। अमलतास बाहर का वृक्ष है, पर उसका सबसे बड़ा फल भीतर उगता है। वह मन को धूप से नहीं, धैर्य से भरता है।
मैं आगे बढ़ गया। लौटने की जल्दी थी। पर अमलतास वहीं नहीं रह गया। वह भीतर चलने लगा। अब जब भी जेठ की तपन में कोई पीला फूल दिखेगा, मुझे वही झुकी हुई डालियाँ, वही मौन उजास। वही शास्त्रीय-सी करुणा याद आएगी।
