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भारत अपना स्वदेशी AI तंत्र विकसित कर रहा है

भारत अपना स्वदेशी AI तंत्र विकसित कर रहा है

श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

आने वाले समय में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) यह तय करेगा कि देश कैसे शासन चलाएगा, इलाज करेगा, पढ़ाएगा, खेती में मदद करेगा और नागरिकों को सेवाएं देगा। ऐसे में भारत का मानना है कि 140 करोड़ लोगों के भविष्य को विदेशी कंपनियं के AI सिस्टम पर नहीं छोड़ा जा सकता।

इसलिए भारत अब अपना स्वदेशी और पूरी तरह देश के नियंत्रण वाला AI सिस्टम बनाने की दिशा में तेजी से काम कर रहा है। भारत का यह रुख हाल ही में आयोजित India AI Impact Summit में साफतौर पर सामने आया।

क्यों जरूरी है सॉवरेन AI?

इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी मंत्रालय के सचिव एस. कृष्णन ने कहा कि शुरुआत में यह सलाह दी गई थी कि भारत को अपना बड़ा AI मॉडल बनाने की जरूरत नहीं है, बल्कि ओपन सोर्स मॉडल का इस्तेमाल कर एप्लिकेशन पर ध्या देना चाहिए।

लेकिन विस्तृत चर्चा और विशेषत्रों से विचार-विमर्श के बाद सरकार इस नतीजे पर पहुंची कि कुछ क्षेत्रों में भारत को अपनी क्षमता विकसित करनी ही होगी। उनका कहा है कि भारत को बहुत बड़े और महंगे मॉडल की जरूरत नहीं है। भारत खास और जरूरी क्षेत्रों पर ध्यान देकर अपने मॉडल बना सकता है।

भारत में 20 से ज्यादा आधिकारिक भाषाएं और सैकड़ों बोलियां हैं। लेकिन दुनिया के ज्यादातर AI मॉडल अंग्रेजी और पश्चिमी डेटा पर आधारित हैं। एस. कृष्णन ने कहा कि मौजूदा AI मॉडल भारतीय भाषाओं और स्थानीय संदर्भों को पूरी तरह नहीं समझते।

इंटरनेट पर भारतीय भाषाओं का डेटा भी सीमित है, जिससे वैश्विक मॉडल भारत के लिए पूरी तरह उपयुक्त नहीं बन पाते। भरत चाहता है कि AI सिस्टम भारतीय भाषा, संस्कृति और सामाजिक संदर्भ को स्वाभाविक रूप से समझें, केवल अनुवाद के सहारे नहीं।

किसके हाथ में हैं ‘किल स्विच’?

सरकार का एक बड़ा तर्क रणनीतिक नियंत्रण को लेकर है। एस. कृष्णन ने कहा कि जैसे-जैसे AI सिस्टम पर निर्भरता बढ़ेगी, यह जरूरी है कि उसका अंतिम नियंत्रण भारत के हाथ में हो।

अगर कोई विदेशी कंपनी या देश ‘किल स्विच’ यानी सिस्टम बंद करने की अंतिम ताकत रखता है, तो यह भविष्य में सुरक्षा और शासन के लिए खतरा बन सकता है। इसलिए भारत सिर्फ AI मॉडल ही नहीं, बल्कि पूरा डिजिटल ढांचा- डेटा सेंटर, क्लाउड और प्लेटफॉर्म अपे नियंत्रण में रखना चाहता है।

BharatGen: भारत का स्वदेशी AI

  • समिट में सबसे बड़ी घोषणा BharatGen की रही।
  • यह IIT बॉम्बे के नेतृत्व में शुरू किया गया सरकार द्वारा पूरी तरह वित्तपोषित प्रोजेक्ट है।
  • BharatGen ने 17 अरब पैरामीटर वाला बहुभाषी फाउंडेशन मॉडल पेश किया है, जो 22 भारतीय भाषओं में काम कर सकता है।
  • इसे भारतीय डेटा पर प्रशिक्षित किया गया है।
  • यह मॉडल शासन, स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि और नागरिक सेवाओं जैसे क्षेत्रों में उपयोग के लिए तैयार किया गया है।

Sarvam: एक और भारतीय पहल

  • सरकार की IndiaAI मिशन के तहत Sarvam को भी समर्थन दिया जा रहा है।
  • यह पहल IIT मद्रास से जुड़ी है और भारतीय भाषाओं व वॉइस आधारित तकनीक पर काम कर रही है।
  • Sarvam के मॉडल बड़े पैमाने पर उपयोग और बेहतर तर्क क्षमता के लिए बनाए जा रहे हैं।
  • सरकार का कहना है कि वह किसी एक संस्था को बढ़ावा नहीं दे रही, बल्कि कई भारतीय स्टार्टअप और संस्थानों को साथ लेकर चल रही है।

भारत की डिजिटल ताकत

भारत की AI महत्वाकांक्षा उसकी डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी है। आधार, यूपीआई और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म पहले ही बड़े पैमाने पर काम कर रहे हैं। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रॉन ने भी भारत की डिजिटल पहचान प्रणाली की तारीफ की।

उन्होंने कहा कि भारत ने 140 करोड़ लोगों के लिए डिजिटल पहचान बनाकर एक मिसाल कायम की है। उनका कहना था कि भारत ने दिखाया है कि तकनीक को बड़े स्तर पर और समावेशी तरीके से लागू किया जा सकता है।

मोदी का वैश्विक संदेश

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने समिट का उद्घाटन करते हुए कहा कि जो AI मॉडल भारत में सफल होगा, वह दुनिया में कहीं भी सफल हो सकता है। उन्होंने कहा कि भारत का लक्ष्य AI पर एकाधिकार बनाना नहीं, बल्कि इसे लोकतांत्रिक और सबके लिए उपयोगी बनाना है। आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने भी कहा कि रणनीतिक जरूरतों के लिए भारत को किसी पर निर्भर नहीं रहना चाहिए।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआइ) की वैश्विक प्रतिस्पर्धा में लंबे समय तक अमरीका और चीन का वर्चस्व दिखाई देता रहा है। चैटजीपीटी, जैमिनी और अन्य उन्नत एआइ मॉडलों ने तकनीकी नेतृत्व की दिशा तय की। ऐसे समय में किसी भारतीय एआइ मॉडल का अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क पर बेहतर प्रदर्शन केवल तकनीकी उपलब्धि नहीं, बल्कि भारत की डिजिटल आत्मनिर्भरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण संकेत है। देसी एआइ ‘सर्वम’ का हालिया प्रदर्शन इसी बदलती तस्वीर को सामने लाता है। कंपनी के ओसीआर और वॉइस मॉडल ने उच्च सटीकता दर हासिल कर यह साबित किया है कि स्थानीय जरूरतों के अनुरूप विकसित तकनीक वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर सकती है।

हालांकि उच्च गुणवत्ता वाले बहुभाषी डेटा सेट की उपलब्धता, उन्नत सेमीकंडक्टर और कंप्यूटिंग अवसंरचना का अभाव, दीर्घकालिक अनुसंधान निवेश की कमी तथा वैश्विक प्रतिभा को बनाए रखने की चुनौतियां भी सामने हैं। इसके साथ-साथ डेटा गोपनीयता, नैतिक उपयोग और विश्वसनीय नियामकीय ढांचे को मजबूत करना भी आवश्यक होगा, ताकि तकनीक पर जनविश्वास बना रहे। अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में टिके रहने के लिए उद्योग-शिक्षा सहयोग, नवाचार-अनुकूल नीतियां और स्वदेशी स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र को तेजी से विकसित करना होगा। यदि इन चुनौतियों का संतुलित समाधान किया जाता है, तो भारत न केवल एआइ का बड़ा बाजार रहेगा, बल्कि वैश्विक तकनीकी नेतृत्व की दिशा में निर्णायक भूमिका निभा सकेगा।

इन चुनौतियों से निपटने में भारत सरकार कई स्तरों पर महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। उच्च गुणवत्ता वाले बहुभाषी डेटा सेट, उन्नत कंप्यूटिंग अवसंरचना और सेमीकंडक्टर निर्माण में दीर्घकालिक निवेश बढ़ाना होगा। साथ ही विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों और उद्योग के बीच मजबूत सहयोग तंत्र विकसित कर नवाचार को प्रोत्साहन दिया जा सकता है। एआइ स्टार्टअप्स के लिए वित्तीय सहायता, कर प्रोत्साहन और सरल नीतिगत ढांचा उन्हें वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार करेगा। एआइ तकनीक का उपभोक्ता बनने के बजाय निर्माता बनने की रणनीति अपनानी होगी।

वैश्विक एआइ क्षेत्र में यूनाइटेड फ्रंट बनाने के लिए भारत संतुलित, समावेशी और भरोसेमंद नेतृत्व की भूमिका निभा सकता है। भारत को लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित खुले, सुरक्षित और नैतिक एआइ मानकों को बढ़ावा देते हुए बहुपक्षीय मंचों- जैसे जी-20, संयुक्त राष्ट्र और ब्रिक्स पर साझा नीति-संवाद शुरू करना होगा। यदि भारत पारदर्शिता, विश्वास और साझेदारी पर आधारित पहलें आगे बढ़ाता है, तो वह एआइ शासन में एक संतुलनकारी शक्ति बनकर वैश्विक स्तर पर साझा प्रगति का मार्ग प्रशस्त कर सकता है।

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