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पूर्वांचल में मानसून ठिठका, उमस और गर्मी ने तपाया

पूर्वांचल में मानसून ठिठका, उमस और गर्मी ने तपाया

श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क 

पूर्वांचल सह‍ित वाराणसी में मौसम का रुख लगातार सप्‍ताह भर से एक समान बना हुआ है। मौसम व‍िभाग ने मानसून की रेखा के एक सप्‍ताह से ठ‍िठके होने की जानकारी ने लोगों के द‍िलों की धड़कनों को तेज कर रखा है। समय से पहले आया मानसून अब समय सीमा की सीमाओं की परीक्षा ले रहा है।

अमूमन मानसून पूर्वांचल की चौखट पर 18 से 20 जून तक आ जाता है। लेक‍िन मानसून यूपी के महाराजगंज ज‍िले की सीमा पर सप्‍ताह भर से स्‍थि‍र है। झारखंड और छत्‍तीसगढ़ के रास्‍ते बीच में मानसून पश्‍चि‍म की ओर रुख तो किया लेक‍िन मानसून एक बार फ‍िर ठ‍िठक गया है। मानसून अमूमन 20 जून तक पूर्वांचल में सोनभद्र के रास्‍ते दस्‍तक दे देता था लेक‍िन मानसून की गत‍ि आगे बढ़ने के साथ ही कुछ सुस्‍त भी हो गई है।

ब‍िहार में पटना से लेकर झारखंड उड़ीसा तेलंगाना और महाराष्‍ट्र के न‍िचले ह‍िस्‍सों से वर्तमान मानसूनी रेखा गुजर रही है। जबकि‍ मुंबई में भी व‍िकट हो चली गर्मी में लोगों के रात में घर से बाहर आकर सोने की तस्‍वीरों ने मानसून के धोखे की कहानी से डराना शुरू कर द‍िया है। माना जा रहा है क‍ि अब 20 जून की म‍ियाद बीती तो मानसून के आगमन के एक एक द‍िन किसानों पर भारी पड़ने वाले हैं। हालांक‍ि मौसम व‍िभाग ने भी 23 जून तक हीट वेव का अलर्ट जारी क‍िया है।

मानसून इस दौरान सक्र‍िय हुआ तो पूर्वांचल में प्रवेश करके लोगों को राहत भी दे सकता है। लेक‍िन मौसम व‍िभाग का दावा अगर सच हो गया तो मानसून 23 जून के बाद ही यूपी में सक्र‍िय होगा। हालांक‍ि लोकल हीट‍िंंग के साथ लोकल फैक्‍टर बादलों की आवाजाही के संकेत को बनाए तो हुए है लेक‍िन पर‍िस्‍थ‍ित‍ियां अनुकूल नहीं होने की वजह से बादल बार‍िश नहीं करा पा रहे हैं। जबक‍ि प्री मानसूनी सक्र‍ियता का रुख बना हुआ है तो मानसून के आगमन की राह प्रशस्‍त भी कर सकता है।

हालांक‍ि मौसम व‍िभाग ने सप्‍ताह भर से मानसून के एक ही स्‍थान लग लगभग ठ‍िठके होने का आंकड़ा जारी कर मानसून की गत‍ि के सुस्‍त होने की जानकारी दी है। हालांक‍ि पूर्व में भी अल न‍ीनो के प्रभाव से मानसून का रुख बदलने का अनुमान जाह‍ि‍र किया जा चुका है। माना जा रहा है क‍ि आने वाले द‍िनों में मानसून अगर सक्र‍िय नहीं हुआ तो किसानों की धान की अगेती फसल प्रभाव‍ित तो होगी ही साथ ही गर्मी की मार से बीमार‍ियां भी स‍िर उठाने लगेंगी।

क्या है अल नीनो इफेक्ट?

अल नीनो इफेक्ट मौसम संबंधी एक विशेष घटना क्या स्थिति है, जो मध्य और पूर्वी प्रशांत सागर में समुद्र का तापमान सामान्य से अधिक होने पर बनती है। आसान भाषा में समझे तो इस इफ़ेक्ट की वजह से तापमान काफी गर्म हो जाता है। इसकी वजह से पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में रहने वाला गर्म सतह वाला पानी भूमध्य रेखा के साथ पूर्व की ओर बढ़ने लगता है, जिससे भारत के मौसम पर असर पड़ता है। ऐसी स्थिति में भयानक गर्मी का सामना करना पड़ता है और सूखे के हालात बनने लगते हैं।

कितनी बार होता है अल नीनो?

अल नीनो हर दो से सात साल में होता है। इस साल का अल नीनो चार साल में पहला होगा। यह तीन साल लंबे ला नीना चरण का अनुसरण करता है, जो मार्च 2023 में समाप्त हुआ है। औसतन, अल नीनो इफेक्ट लगभग 9-12 महीने तक सक्रिय रहता है। हालांकि, कभी-कभी यह 18 महीने तक जारी रहता है। इस साल अल नीनो के कम से कम सर्दियों तक और 2024 के पहले तीन महीनों तक रहने की उम्मीद है।

अल नीनो कब घोषित किया जाता है?

एनओएए एक अल नीनो फेज के विकास की घोषणा तब करता है, जब भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के एक निश्चित क्षेत्र में समुद्र की सतह का तापमान कम से कम एक महीने के लिए औसत से कम से कम 0.5 डिग्री सेल्सियस ऊपर पहुंच जाता है। साथ ही इस दौरान वातावरण में परिवर्तन भी होता है।

अल नीनो कैसे होता है?

अल नीनो वातावरण और महासागर के बीच एक कॉम्प्लेक्स इंटरेक्शन के कारण होता है। इस इफेक्ट के प्राइमरी ड्राइवर भूमध्य रेखा के पास स्थिर पूर्वी हवाएं हैं, जो भूमध्य रेखा और ध्रुवों के बीच सोलर सीट में अंतर के कारण होती हैं। आम तौर पर, ये हवाएं पश्चिमी प्रशांत महासागर में गर्म पानी को बनाए रखने में मदद करती हैं। लेकिन अल नीनो के दौरान, ट्रेड विंड्स कमजोर हो जाती हैं या दिशा उलट जाती है, जिससे मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागरों में गर्म पानी का निर्माण होता है। इस गर्म पानी के निर्माण की वजह से दुनिया भर के मौसम के मिजाज पर गहरा असर पड़ता है।

अल नीनो और भारत में मानसून का कनेक्‍शन

मौसम वैज्ञान‍िकों ने साल 2023 में भारत में सामान्य मानसून वर्षा की भविष्यवाणी की है। हालांकि, इसके साथ ही मानसून (जून से सितंबर) के दौरान अल नीनो के विकसित होने की संभावनाएं भी 90 प्रत‍िशत बनी हुई है। ऐसे में इस बार सामान्य से कम बारिश होने के कयास लगाए जाने लगे हैं।

अल नीनो के प्रभाव क्या हैं?

अल नीनो दुनिया भर के मौसम के पैटर्न पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकता है। यह आमतौर पर ऑस्ट्रेलिया में सूखे, इंडोनेशिया और फिलीपींस में बाढ़ और अटलांटिक महासागर में तूफान की गतिविधि से जुड़ा है।

वहीं, भारत में अल नीनो इफेक्ट आमतौर पर दक्षिण-पश्चिम मानसून के सामान्य से अधिक शुष्क मौसम और पूरे देश में बढ़ी हुई गर्मी और सूखे के लिए जिम्मेदार होता है। मौसम पर इस तरह के प्रभावों से फसलों और पशुओं को नुकसान हो सकता है, भोजन की कमी हो सकती है, जो अप्रत्यक्ष रूप से भारत की अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकते हैं।

अल नीनो के लिए भारत कैसे तैयार हो सकता है?

अल नीनो के विकास पर नज़र रखने और शुरुआती कार्रवाई करने के लिए मौसम की स्थिति की बारीकी से निगरानी करना, सूखे, हीटवेव और अन्य मौसम की घटनाओं से निपटने के लिए आकस्मिक योजनाएं विकसित करना, कमी का सामना करने वाले क्षेत्रों में भोजन और पानी का वितरण करना, और संबंधित जोखिमों और तैयारियों पर जनता को शिक्षित करना- ये कुछ ऐसे तरीके हैं, जिनसे भारत अल नीनो के लिए तैयारी कर सकता है।

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