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अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठी में सीवान के राजेश पाण्डेय ने प्रस्तुत किया शोध पत्र

अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठी में सीवान के राजेश पाण्डेय ने प्रस्तुत किया शोध पत्र

हिन्दी पत्रकारिता के 200 वर्ष पूरे होने पर कानपुर के छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का हुआ आयोजन

श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

हिंदी पत्रकारिता के गौरवमयी दो सौ वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय, कानपुर के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग में दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का भव्य आयोजन 11-12 अप्रैल 2026 को किया गया। संगोष्ठी में महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय, मोतिहारी, बिहार में हिंदी विभाग के शोधार्थी व सीवान निवासी राजेश पाण्डेय ने अपना शोध पत्र “1857 की क्रांति में हिंदी पत्रकारिता का योगदान” विषय का वाचन किया।

भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद नई दिल्ली द्वारा प्रायोजित उक्त संगोष्ठी में ‘उदंत मार्तंड से ए.आई. युग तक: दो शताब्दियों का महासंवाद’ विषय पर कुल नौ सत्रों में इसके विविध आयामों पर विद्वान प्राध्यापकों एवं संपादकों द्वारा विशद विचार-विमर्श किया गया।

शोधार्थी राजेश पाण्डेय ने अपने शोध पत्र के वाचन में उधृत किया कि अगर भारत को 2047 में विकसित राष्ट्र के रूप में स्थापित करना है तो इसके अतीत को जानना-समझना होगा। इसके लिए पत्रकारिता एक ऐसी विधा है जिससे हम अपने दो सौ वर्षों के सामाजिक-सांस्कृतिक पहलू के विभिन्न आयामों को समझ सकते हैं। इस कड़ी में देश का पहला स्वतंत्रता संग्राम 1857 में प्रारंभ हुआ, जिसकी पुरजोर अभिव्यक्ति पत्रकारिता विद्या में मिलती है।

विशेष कर 1826 में कानपुर निवासी पंडित युगल किशोर शुक्ल की हिंदी पत्र उदंत मार्तंड ने जनमानस में एक जागृति का प्रयास किया, जिसकी परिणति 1857 की क्रांति में स्पष्ट अवलोकित होता है। 1857 से सत्तर वर्ष पूर्व भारत में पत्रकारिता आरंभ हुई परन्तु 1826 में पहला हिंदी पत्र उदंत मार्तंड के रूप में आया, जिसका ध्येय वाक्य था ‘हिंदुस्तानियों के हित हेतु’।

क्रांति के समय जनसंचार के नाम पर प्रिंट पत्रकारिता ही थी।। क्योंकि 1857 की क्रांति केवल शस्त्र से उत्तर देने वाली नहीं थी, वरन वैचारिक आंदोलन भी थी जिसे पत्रकारिता के माध्यम से पत्रकारों द्वारा किया जा रहा था। जनमानस में समाचार पत्रों को लेकर इतनी दिलचस्पी थी कि 1857 तक 28 पत्र छपने लगे थे। उक्त समय की पत्रकारिता अपने स्वभाव, प्रकृति, प्रभावपूर्ण देश प्रेमियों के स्वतंत्रता की भावना से ओत-प्रोत थी। इन समाचार पत्रों व उनके पत्रकारों का स्वतंत्रता की प्राप्ति में योगदान सदैव अविस्मरणीय रहेगा। इसके लिए आने वाली पीढ़ियां निश्चित रूप से इनकी ऋणी रहेगी।


वर्तमान समय में भी देश में सार्वजनिक चेतन को संगठित करने का जो भगीरथ प्रयास हिंंदी पत्रकारिता जगत करता है जिसकी जड़े हमारे अतीत में विद्यमान है क्योंकि अतीत अमृत है।

बहरहाल कार्यक्रम के संरक्षक माननीय कुलपति प्रो. विनय कुमार पाठक का सानिध्य प्राप्त हुआ, वही सह संरक्षक प्रो. सुधीर कुमार अवस्थी, माननीय प्रति कुलपति, डॉ. ओम जी उपाध्याय, सदस्य सचिव, भारतीय अनुसंधान परिषद नई दिल्ली, विश्वविद्यालय के कुल सचिव राकेश कुमार मिश्र, समारोह में अपनी गरिमामयी उपस्थिति बनाए रखी। पूरे कार्यक्रम के आयोजन मंडल में संयोजक एवं विभागाध्यक्ष डॉ. दिवाकर अवस्थी, सहसंयोजक डॉ. ओम शंकर गुप्ता, डॉ. हरिओम कुमार, आयोजन सह सचिव डाॅ. अंजनी कुमार उपाध्याय, डॉ. जितेंद्र डबराल, डॉ. रश्मि गौतम रही।

सलाहकार समिति के सदस्यों के रूप में प्रो. गोविंद जी पाण्डेय, लखनऊ, प्रो. वीरेंद्र कुमार व्यास, सतना, प्रो. प्रशांत कुमार हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय,हरियाण, प्रो. तनु डांग, इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय, दिल्ली, डॉ. उपेंद्र पाण्डेय, कानपुर, अमिताभ अग्निहोत्री, राष्ट्रवादी ने अपने सारगर्भित उद्बोधन से उपस्थित शोधार्थी एवं विद्यार्थियों का ज्ञानवर्धन किया।

कार्यक्रम की सफलता हेतु आयोजन समिति का गठन किया गया। जिसे दस प्रभागों में बांटा गया था। इनमें स्वागत समिति, पंजीकरण एवं वित्त समिति, तकनीक व आईसीटी समिति, मंचसज्जा एवं संचालन व्यवस्था, अनुशासन समिति, मीडिया समन्वय समिति, सांस्कृतिक समिति, भोजन व्यवस्था, यातायात व्यवस्था एवं आवास व्यवस्था प्रमुख रहा।

कार्यक्रम में शोध पत्र वाचन हेतु कुल चालीस विषय रखे गए थे जिन पर आचार्य, सहायक आचार्य, शोधार्थियों व विद्यार्थियों ने अपने शोध पत्रों का वाचन किया।

विशेष रूप से डॉ. अरुण भगत, सदस्य बिहार लोक सेवा आयोग, डॉ. राम मोहन पाठक, पूर्व कुलपति, प्रो. विवेकमणी अग्निहोत्री, क्वांगतोंग विश्वविद्यालय, चीन, प्रो. जगदीश उपासने, डॉ. दिनेश पाठक, यूक्रेन से प्रो. यूरी बोत्वींकिन, नेपाल से प्रो. निर्मल मणि अधिकारी का उद्बोधन पाथेय का मार्ग प्रशस्त करता रहेगा।

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