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सगौली रेलवे स्टेशन का नाम सुगौली होना चाहिए

सगौली रेलवे स्टेशन का नाम सुगौली होना चाहिए

श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

पूर्वी चंपारण में सगौली रेलवे जंक्शन है। यह सुगौली प्रखंड में अवस्थित है। यहां अंचल,थाना और पोस्ट सब सुगौली के नाम से है किन्तु रेलवे स्टेशन सगौली है। यहां 1816 में ब्रिटिश भारत और नेपाल महाराजा के बीच संधि हुई थी जो सुगौली संधि के नाम से विख्यात है। 1857 में सुगौली स्थित इरेगुरली कैवेलरी फौज में तैनात 12 हजार भारतीय जवानों ने विद्रोह कर दिया था ।वह भी सुगौली सिपाही विद्रोह के रूप में देखा जा सकता है। मैं यह मानता हूं कि सगौली रेलवे स्टेशन का नाम सुगौली होना चाहिए।

या फिर सुगौली संधि स्टेशन होना चाहिए जिससे लोगों में सुगौली संधि के बारे में जिज्ञासा बढ़े ।एक दूसरा पहलू यह है कि 1995 में बड़ी लाईन के निर्माण से पूर्व तक तीन प्लेटफार्म होता था । एक नम्बर पर बेतिया नरकटियागंज की ओर जानेवाली तो दो नम्बर पर मोतिहारी मुजफ्फरपुर की ओर जानेवाली तथा तीन नम्बर पर रक्सौल की ओर जानेवाली गाड़ियां लगती थीं। यह दीगर बात है कि गिनती के लिए एक ही प्लेटफार्म था परन्तु पश्चिम साइड में एक पूर्व में दो तथा प्लेटफार्म के उतरी हिस्से के पूर्वी छोर पर तीन नंबर प्लेटफार्म था ।

रक्सौल जानेवाली गाड़ियां यहीं से बनकर चलती थीं। उसमें कोयला पानी यहीं भरा जाता था तथा इंजन का मेंटेनेंस सगौली लोको शेड में होता था । उस समय मुजफ्फरपुर नरकटियागंज रुट में करीब आठ जोड़ी ट्रेने चलती थीं।

आज की तारीख में सगौली स्टेशन से एक भी ट्रेन बनकर नहीं चलती । कहा जाता है कि यहां वाशिंग पीट नहीं है। बोगी में पानी भरने की सुविधा नहीं है। आज प्रतिदिन करीब बीस जोड़ी गाड़ियां यहां से गुजरती हैं परन्तु प्लेटफार्म मात्र दो है । जगह नहीं मिलने के कारण गाड़ियों को सेमरा, मझौलिया या रामगढ़वा में बिना मतलब रुकना पड़ता है।

अतः मैं रेल विभाग से मांग करता हूं कि सगौली में एक और प्लेटफार्म का निर्माण कराया जाय ।वाशिंगपीट का भी निर्माण कराया जाय ताकि सगौली से भी ट्रेन बनकर चले ।

बिहार के पूर्वी चंपारण जिले में स्थित सुगौली को 207 साल पहले अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली थी। नेपाल की सीमा से सटे इस स्थान पर 1816 में तत्कालीन नेपाल सरकार एवं ब्रिटिश हुकूमत के बीच ऐतिहासिक सुगौली की संधि हुई थी। इस संधि के बाद ब्रिटिश सरकार के खिलाफ छेड़ी गई नेपाली कबीलों की जंग खत्म हुई थी।

सुगौली बेतिया महाराज की ग्रीष्मकालीन राजधानी हुआ करती थी। तत्कालीन बेतिया महाराज आनन्द किशोर ने सुगौली संधि स्थल की पहचान कायम रखने के लिए यहां अष्टधातु से बने युग्म पंचमुखी महादेव के मंदिर की स्थापना कराई थी। यह आज भी श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। कहा जाता है कि इसे उस समय स्थापित ऐसे तीन मंदिरों में से एक माना जाता था। बेतिया राज की ग्रीष्मकालीन राजधानी होने से यहां रानी के स्नान का कुआं, नौबतखाना, सिपाहियों के रहने का विशाल मैदान, राजा के मनोरंजन के लिए नगर में झील के किनारे बसे नर्तकियों का मोहल्ला आदि बनाया गया था। अब इन भवनों का सिर्फ अवशेष बचा है।

सागौली संधि (4 मार्च, 1816), नेपाल के गोरखा सरदारों और ब्रिटिश भारतीय सरकार के बीच हुआ समझौता था जिसने युद्ध का अंत किया।एंग्लो-नेपाली (गोरखा) युद्ध (1814-16)। संधि के अनुसार , नेपाल ने विवादित तराई क्षेत्र पर अपना सारा दावा त्याग दिया और काली नदी के पश्चिम में स्थित तथा सतलुज नदी तक फैले अपने विजय प्राप्त क्षेत्रों को सौंप दिया । नेपाल स्वतंत्र रहा, लेकिन उसे एक ब्रिटिश रेजिडेंट मिला, जिसका दर्जा एक स्वतंत्र देश में राजदूत के समान था, न कि किसी भारतीय राज्य में सर्वोच्च सरकार के नियंत्रक प्रतिनिधि के समान।

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