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‘अंतर्राष्ट्रीय पत्रकारिता दिवस पर विशेष मार्मिक आलेख’ 

‘अंतर्राष्ट्रीय पत्रकारिता दिवस पर विशेष मार्मिक आलेख’ 

‘सच्ची पत्रकारिता की मर्यादित दिशाएं और दुर्दशाएं

श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

बाह्य बेहद आकर्षण एवं चकाचौंध से भरी पत्रकारिता की धर्मितापूर्ण ज़िन्दगी,बेहद संघर्षपूर्ण और चुनौतियों से भरी पड़ी है! वस्तुत: सच्ची,मर्यादित,शुचितापूर्ण एवं धर्मितापूर्ण पत्रकारिता की गरिमा और अस्मिता बेशक ही बिल्कुल ‘ईमानदारीपूर्ण’ ही मानी जाती हैं! जबकि कुछेक पत्रकारिता अपनी ‘पीत पत्रकारिता’ की व्याधियों से भी ग्रसित-बदनाम रही हैं! लेकिन, हमारा सर्वसमाज सदैव ‘पत्रकारिता’ को बिल्कुल ही ईमानदार,जिम्मेदार,कर्तव्यनिष्ठ,निर्भीक,निष्पक्ष,गहन जांच-पड़ताल और विश्वसनीयता का सशक्त प्रतीक ही माना है!

दूजा यह कि पत्रकारिता को हमेशा सर्वसमाज एवं राष्ट्र का हितार्थक भी माना गया है! जिसे सदियों से सदा साधनापूर्ण श्रेयस्कर बौद्धिकता का श्रमपूर्ण श्रेष्ठ सद्कर्म का रूपक भी माना गया है! यद्यपि कर्मयोगी पत्रकारों एवं पत्रकारिता को हमेशा ऐसे मानने वाला हमारा सर्वसमाज और केन्द्र व राज्य सरकारें भी कभी पत्रकारों की आपबीती तथा व्यतीत हो रहीं उनकी पीड़ाओं एवं परेशानियों पर कदापि-कतई विशेष क्या..?

वस्तुत: थोड़ा भी ध्यान नहीं दिया है! जिससे प्रायः पत्रकारबंधुगण ‘बंधुआ मजदूरों’ की सी जिंदगी जीने हेतु अभिशप्त हैं! सचमुच प्रायः पत्रकारों की कथित कमोवेश यही आज हालात हैं! वस्तुत: विश्व के विशालतम हमारे लोकप्रिय भारतीय लोकतंत्र के जनकथित ‘चौथे स्तंभ’ स्वरूप हमारे पत्रकार और पत्रकारिता की दुरूह भरी ज़िन्दगी की करूण-कठिन कहानियों की अब शेष अंततः यही पृष्ठ-भूमियां भी हैं..! बशर्ते, घर-परिवार के जो पत्रकारगण बेहतर अगर हालात के व्यक्ति नहीं हैं ! तब वे अपने पत्रकारीय जीवन की अनेक संघर्षपूर्ण चुनौतियों एवं अपनी आर्थिक संकट के सबब रोज जद्दोजहद की जिंदगी से दो-चार होते रहे हैं..!

मगर, कुछेक अपवाद को छोड़ दें ..! तब बेहतरीन लेखन की समझ और समृद्धि सचमुच ‘विशेष संपन्नता’ के मध्य जनित व विकसित भी कथित कहां हो पाती हैं ..! क्योंकि, पत्रकारिता और साहित्यिक विशेष विधा की सृजनात्मकतापूर्ण रचनात्मक कलाएं तो पीड़ित एवं जीवन-मूल्यों से सदैव जूझती महान आत्माओं की मनोवृत्तियों से ही सृजित-विकसित होती हैं.. ! बावजूद इसके बहुतेरे पत्रकार असामाजिक तत्वों के भी आए दिन कथित शिकार होते रहते हैं..! इस हालात में ‘पत्रकार और पत्रकारिता’ प्रायः सचमुच ‘पीड़िता एवं दयनीयता’ की शिकार होकर अधिकांशत: संघर्ष व चुनौतियों से ही सदैव जूझती रही हैं!

पत्रकार भले ही भूखमरी का शिकार हो जाए..! परंतु वह बेशक और बेहद बिल्कुल ईमानदार छवि का व्यक्तित्व जरूर होना चाहिए! पत्रकारों के प्रति प्रायः ऐसी ही सर्वमान्य सोच सदा विकसित रही हैं..! परंतु,पवित्रता व शुचिता की प्रतीक रही हमारी ‘सच्ची पत्रकारिता’ भी जनकथित अब अन्य अनेकशः पदों-ए-पेशों और कथित राजनीति की भांति भ्रष्टाचार का भी कुछेक शिकार होती जा रही है..! यह दीगर बात है कि कथित अवसरहीनता के कारण पत्रकारिता अन्यों की भांति अभी भ्रष्टाचार की व्यापकता का घोर शिकार नहीं हो पा रही हैं!

मसलन यह हकीकतपू्र्ण बातें, दिलोदिमाग से महसूस की जाएं,तो हमारी ‘पत्रकारिता’ आज बेशक ही अपने ‘अर्थ-संकट’ के ‘हालात’ और अपनी ‘मर्यादा’ के मध्य सदैव जूझती हुई ‘दो-राहे’ पर बेचारी-सी खड़ी है! जबकि कथित दूसरी ओर हमारे विशेष होनहार युवाजन पत्रकारिता में अपना बेहतर भविष्य तलाशने में भी अब हिचकने और बचने की विशेष कोशिशें कर रहे हैं! लेकिन,यह सच बात हमारे लोकप्रिय लोकतंत्र हेतु बेहद और बेशक ही विकट विडंबनापूर्ण है! …और इसके पूर्णांत विशेष में आज ‘अंतर्राष्ट्रीय पत्रकारिता दिवस’ के सुअवसर पर ‘विश्व पत्रकारिता जगत’ की ओर से ‘अंतर्राष्ट्रीय सर्वसमाज’ को हार्दिक अनंत शुभकामनाएं और ढ़ेरों बधाइयां..!

 

आभार- धनंजय मिश्र, वरिष्ठ पत्रकार, सीवान, बिहार

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