सेमर का फूल सुंदरता, प्रेम एवं क्षणभंगुरता का प्रतीक है
पत्तों से रहित वृक्षों पर फूलने वाला यह सेमर का फूल सटीक समय का सूचक है
” सुंदर होना आवश्यक नहीं,
जरूरी है समय पर खिलना।”
✍🏻 राजेश पांडेय
श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

ऋतुओं के राजा बसंत में प्रकृति ने अपना श्रृंगार कर लिया है। इसमें पेड़ पौधे ने अपने पुष्पों से अपने को आच्छादित कर लिया है। इनमें आम के मोंजरों से पेड़ बैरां गए हैं। सेमर के पेड़ पर लाल फूल भी एक विशेष प्रकार की भाव-भंगिमा प्रकट कर रहे हैं।
“फूलों में फूल सेमर का लाल फूल,
ना रंग का अभिमान है न सुगंध की बयार है,
ऊंची कांटेदार डाल पर खड़ा रहता है यह फूल।”
सेमर का फूल जीवन में हमें समयबद्धता की सीख देता है। समय से सारे कार्य करना यह सिखाता है।उसका संदेश है कि”सुन्दर होना आवश्यक नहीं वरन् जरुरी है समय पर खिलना और बिना शोर किये झड़ जाना।”हमारे जीवन में बहुत से व्यक्ति ऐसे होते है जो सेमर की फूल की तरह आते है चले जाते हैं, परन्तु उनका समय याद रखा जाता है। सेमर का लाल फूल आकर्षण, क्षणभंगुरता एवं आडंबर व मोह-फांस के प्रतीक के रूप में विद्यमान हैं।
कबीर दास जी का प्रसिद्ध दोहा-
“यहु ऐसा संसार है,जैसा सेमल फूल है,
दिन दस के ब्यौहार कौन,झूठे रंग फूल।”
यह फूल प्रकृति एवं यथार्थ के मध्य एक लंबी विरोधाभास को जन्म देता है। गौर करें तो पायेंगे कि यह बिना पत्तों के लाल रंग से भरा होता है।
कहानीकार मार्केडेय की पहली उपन्यास 1956 में रचित ‘सेमल का फूल’ है। जिसमें कथा का ताना-बाना प्रेम एवं विवाह जैसे विषय को लिये हुए एक रोमांटिक भाव-भूमि पर बुना गया है। कथा भावुकता और करुणा के संसार को ही हमारे सामने नहीं लाती बल्कि जीवन की बुनियादी समस्याओं को उठाती है एवं उसके समाधान का प्रयास करती है। पूरी कथा स्त्री पात्र निलिमा के प्रेम संबंधों पर आधारित है जो डायरी में लिखे प्रसंगों को सामने लेकर आती है। वहीं प्रसिद्ध लेखक त्रिलोचन की ‘सेमल’ नाम की कविता प्राकृतिक रूप का वर्णन करती है, जबकि अभिषेक सूर्यवंशी की प्रेम कहानी ‘सेमल के फूल’ भी एक प्रसिद्ध रचना है।

बहरहाल सेमर का फूल हमारे बहिरंग व्यवहार का द्योतक है जो आकर्षक लाल परन्तु सारहीन है जो निराशा को गले लगाता है। वहीं इसकी तुलना में शांत, पवित्र फूल हमारी आत्मा है जो सुगंध, स्वभाव एवं भंगिमा का सूचक है। परन्तु सेमल के फूलों की प्रासंगिकता यह है कि जीवन छोटा है लेकिन प्रेम सत्य और सुगंध से भरा होना चाहिए।
” बाहर की सुंदरता को पहचानों, पर उससे मत छलो तुम!
अंदर की सुगंध को ढूंढो और उसी में जियो तुम।”
“न पूजा की थाल में मैं सजता हूं,
न नारी के गजरे में सुगंध भर पाता हूं,
फिर भी प्रत्येक बसंत में समय के साथ अपना धर्म निभाता हूं।”
