इतिहास के हाशिये पर खड़े बिहार संस्थापक सच्चिदानंद सिंहा
श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

हर वर्ष 22 मार्च को बड़े उत्साह और सांस्कृतिक वैभव के साथ बिहार का स्थापना दिवस मनाया जाता है। राजधानी से लेकर जिलों और विदेशों तक बड़े धूमधाम से आयोजन होते हैं। कार्यक्रमों की श्रृंखला, विकास के दावे, सांस्कृतिक प्रस्तुतियां और राजनीतिक भाषण इस दिन को खास बना देते हैं। लेकिन इस चमक-दमक के बीच एक सवाल लगातार अनुत्तरित रह जाता है—क्या हम उस ऐतिहासिक व्यक्तित्व को पर्याप्त सम्मान दे पा रहे हैं, जिनकी बौद्धिक और राजनीतिक पहल ने बिहार को एक अलग प्रांत का दर्जा दिलाने का मार्ग प्रशस्त किया ?
यह सवाल हमें सीधे ले जाता है मशहूर बैरिस्टर और संविधान सभा के अस्थायी अध्यक्ष स्व. डा.सच्चितानंद सिन्हा की अनदेखी की की ओर। सच्चिदानंद सिंहा को बिहार के निर्माण के वैचारिक शिल्पियों में अग्रणी माना जाता है। राज्य के रूप में बिहार का निर्माण उनकी दीर्घकालिक कोशिशें, लेखन और राजनीतिक संवाद को दिया जाता है । उन्होंने न केवल बिहार की अलग पहचान की वकालत की, बल्कि उसकी बौद्धिक नींव भी रखी। फिर भी विडंबना यह है कि बिहार दिवस के अवसर पर उनकी भूमिका की चर्चा तो दूर उनका नाम तक लेने से परहेज किया जाता है।
पूरा बिहार घूम आइये, कहीं डॉ.सिन्हा की एक प्रतिमा तक नहीं मिलेगी। जबकि इसी बिहार की राजधानी पटना में अपराधी -राजनेता का स्मारक बना हुआ है। जो समाज -राज्य अपने पूर्वजों के योगदान को विस्मृत कर देते हैं वे इतिहास के कूड़ेदान में फेंक दिए जाते हैं। बिहार की दुर्दशा का एक बड़ा कारण यह भी है कि अपने नायकों को याद करने में भी राजनीतिक लाभ -हानी और वोट को ध्यान में रखते हैं। सच्चिदानंद बाबू के नाम पर वोटों का ध्रुवीकरण नहीं कराया जा सकता। इसलिए उन्हें याद करने की जहमत क्यों उठाई जाये ?
आज बिहार दिवस एक बड़े इवेंट में बदल चुका है। मंचों पर विकास योजनाओं की घोषणाएँ, सांस्कृतिक कार्यक्रम और राजनीतिक उपलब्धियों का प्रदर्शन होता है। लेकिन इतिहास की गंभीरता और उसके नायकों की चर्चा पीछे छूट जाती है। सच्चिदानंद सिंहा जैसे व्यक्तित्व, जिनकी वजह से यह दिन संभव हुआ, उन्हें वह स्थान नहीं मिलता जो मिलना चाहिए। यह केवल एक व्यक्ति की उपेक्षा नहीं, बल्कि ऐतिहासिक चेतना के क्षरण का संकेत है।

यह भी सच है कि स्मृति का निर्माण हमेशा राजनीति से प्रभावित होता है। वर्तमान नेतृत्व अक्सर उन प्रतीकों को प्रमुखता देता है, जो उनके राजनीतिक विमर्श के अनुकूल हों। परिणामस्वरूप, वोट बैंक की दृष्टि से लाभकारी नहीं होने के कारण सच्चिदानंद सिंहा जैसे बौद्धिक और अत्यंत महत्वपूर्ण व्यक्तित्व पीछे छूट जाते हैं। यह चयनात्मक स्मरण न केवल इतिहास के साथ अन्याय है, बल्कि नई पीढ़ी को अधूरी जानकारी भी देता है।
समस्या का समाधान केवल सरकारी मंचों तक सीमित नहीं है। स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में भी सच्चिदानंद सिंहा के योगदान पर चर्चा नहीं होती। यदि नई पीढ़ी को अपने राज्य के इतिहास की सही समझ देनी है, तो पाठ्यक्रम और जनचर्चा में इन नायकों को प्रमुख स्थान देना होगा। इतिहास केवल तारीखों का संग्रह नहीं, बल्कि पहचान और प्रेरणा का स्रोत होता है।
समय आ गया है कि बिहार दिवस को केवल उत्सव नहीं, बल्कि आत्ममंथन का अवसर भी बनाया जाए। गांधी मैदान जैसे प्रमुख स्थलों पर सच्चिदानंद सिंहा के योगदान को केंद्र में रखकर विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जा सकते हैं। उनके नाम पर शोध संस्थान, व्याख्यान श्रृंखला और पुरस्कार स्थापित किए जाएँ, ताकि उनकी विरासत जीवित और प्रासंगिक बनी रहे।
बिहार दिवस का वास्तविक अर्थ तभी पूर्ण होगा, जब हम उसके ऐतिहासिक आधार को ईमानदारी से स्वीकारें और सम्मान दें। सच्चिदानंद सिंहा की उपेक्षा केवल अतीत की अनदेखी नहीं, बल्कि भविष्य के प्रति हमारी जिम्मेदारी से भी विमुख होना है। एक समाज तभी परिपक्व बनता है, जब वह अपने नायकों को याद रखने और उनसे सीखने की परंपरा को जीवित रखता है। बिहार को भी इसी दिशा में आगे बढ़ना होगा।
विशेष ध्यानार्थ:
बिहार दिवस मनाने की शुरुआत भाजपा के पूर्व विधान पार्षद हरेंद्र प्रताप के प्रयासों से 2010 से शुरू हुई।
डॉ.सिन्हा के योगदान का उल्लेख करते हुए उन्होंने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को जो पत्र लिखा था वह संलग्न है।
