अमरीका~इज़राइल व ईरान युद्ध की खबर व विश्लेषण को भारत के न्यूज़ चैनल हद से ज्यादा प्राथमिकता के साथ क्यों दिखा रहे ?
श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

टेलीविज़न स्क्रीन पर युद्ध की चमक हमेशा वास्तविक युद्ध से ज़्यादा आकर्षक होती है। दूर कहीं बम गिरता है और यहाँ स्टूडियो में एंकर की आवाज़ ऊँची हो जाती है, जैसे वह भी किसी मोर्चे पर तैनात हो।
अमरीका, इज़राइल और ईरान के बीच तनाव या युद्ध की आशंका को भारतीय न्यूज़ चैनल जिस उन्माद के साथ दिखाते हैं, वह केवल सूचना देने का काम नहीं करता, वह एक तरह का दृश्य-नाटक रचता है—जहाँ दर्शक को यह विश्वास दिलाया जाता है कि दुनिया का केंद्र वहीं है जहाँ कैमरा टिक गया है।
यहाँ सवाल यह नहीं है कि इन घटनाओं को दिखाया क्यों जा रहा है—दुनिया की बड़ी राजनीतिक हलचलें स्वाभाविक रूप से खबर बनती हैं। सवाल यह है कि इन्हें “हद से ज्यादा” प्राथमिकता क्यों दी जा रही है, और इस प्राथमिकता का असली अर्थ क्या है। दरअसल यह प्राथमिकता सूचना की नहीं बल्कि बाजार, सत्ता और दर्शक-मन की त्रिकोणीय संरचना की देन है।
भारतीय न्यूज़ चैनलों का एक बड़ा संकट यह है कि वे समाचार माध्यम कम और मनोरंजन उद्योग अधिक बन चुके हैं। युद्ध, खासकर पश्चिम एशिया का युद्ध, एक ऐसा दृश्य देता है जिसमें भय, रोमांच, तकनीक और वैचारिक ध्रुवीकरण सब कुछ एक साथ मिल जाता है।
मिसाइलों के एनीमेशन, नक्शों पर लाल-नीली रेखाएँ, “ब्रेकिंग” की चिल्लाहट—यह सब मिलकर एक ऐसा तमाशा रचते हैं जो दर्शक को बाँधता है और दर्शक बँधा रहेगा तो विज्ञापन आएँगे, टीआरपी बढ़ेगी और चैनल का अस्तित्व सुरक्षित रहेगा। इतना सरल समीकरण है कि इसे समझने के लिए किसी गहरे राजनीतिक सिद्धांत की जरूरत नहीं पड़ती लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती। यह केवल बाज़ार का खेल नहीं है, यह वैचारिक निर्माण का भी खेल है।
अमरीका-इज़राइल-ईरान जैसे त्रिकोण को दिखाते समय चैनल अक्सर एक स्पष्ट नैरेटिव गढ़ते हैं—“हम” बनाम “वे” का। यहाँ “हम” का अर्थ कभी लोकतंत्र, कभी सभ्यता, कभी आधुनिकता से जोड़ा जाता है, और “वे” को अराजकता, कट्टरता या खतरे के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। यह द्वैत इतना सरल और सुविधाजनक है कि जटिल अंतरराष्ट्रीय राजनीति को भी एक टीवी डिबेट के स्तर तक गिरा देता है जहाँ हर चीज़ दो रंगों में बँट जाती है।
विडंबना यह है कि भारत जैसे देश में जहाँ अपने भीतर ही असंख्य सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक संकट मौजूद हैं वहाँ दूरस्थ युद्धों को इस तरह प्रस्तुत किया जाता है मानो वे हमारे दरवाज़े पर दस्तक दे रहे हों। बेरोज़गारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, किसानों की समस्याएँ, स्थानीय भ्रष्टाचार—ये सब खबरें धीरे-धीरे हाशिए पर चली जाती हैं और उनकी जगह ले लेता है एक ऐसा युद्ध जिसका प्रत्यक्ष प्रभाव आम भारतीय के जीवन पर सीमित है। यह एक तरह का “ध्यान भटकाने” का तंत्र है जिसे बहुत सूक्ष्म ढंग से काम में लाया जाता है।
किसी भी लोकतंत्र में मीडिया का दायित्व केवल सूचना देना नहीं होता बल्कि प्राथमिकताओं का संतुलन बनाए रखना भी होता है। जब यह संतुलन टूटता है तो मीडिया खुद एक राजनीतिक उपकरण बन जाता है। भारतीय न्यूज़ चैनलों का यह झुकाव इस बात की ओर इशारा करता है कि वे अब सत्ता और बाजार के बीच फँसे हुए हैं और जनता के वास्तविक मुद्दे उनके लिए उतने आकर्षक नहीं रह गए हैं।
यहाँ एक मनोवैज्ञानिक पक्ष भी है जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता। दूर के युद्ध हमेशा सुरक्षित लगते हैं। दर्शक को एक तरह का “रोमांच” मिलता है—वह भयभीत भी होता है लेकिन उस भय में एक दूरी होती है।
यह वैसा ही है जैसे कोई फिल्म देखना, जिसमें विस्फोट होते हैं, लोग मरते हैं लेकिन अंततः दर्शक अपनी कुर्सी पर सुरक्षित बैठा रहता है। न्यूज़ चैनल इस मनोविज्ञान को अच्छी तरह समझते हैं और उसका इस्तेमाल करते हैं। वे जानते हैं कि स्थानीय समस्याएँ दर्शक को असहज करती हैं क्योंकि वे उसके जीवन से जुड़ी होती हैं जबकि अंतरराष्ट्रीय युद्ध उसे एक तरह का भावनात्मक “एस्केप” देते हैं।
इसके साथ ही, वैश्विक राजनीति में भारत की स्थिति भी इस कवरेज को प्रभावित करती है। भारत का पश्चिम एशिया से गहरा आर्थिक और सामरिक संबंध है—तेल, व्यापार, प्रवासी भारतीय, कूटनीति। इन सब कारणों से इन क्षेत्रों की घटनाएँ महत्वपूर्ण हैं लेकिन महत्त्व और अतिशयोक्ति में फर्क होता है। जब महत्त्व को अतिशयोक्ति में बदल दिया जाता है तो वह सूचना नहीं बल्कि प्रोपेगैंडा बन जाता है।
इस पूरी प्रक्रिया में भाषा की भूमिका भी दिलचस्प है। न्यूज़ चैनल अक्सर युद्ध को एक खेल या प्रतियोगिता की तरह प्रस्तुत करते हैं—“कौन भारी?”, “किसका पलड़ा मजबूत?”, “किसने दिया करारा जवाब?”—ये वाक्य युद्ध की भयावहता को कम करके उसे एक तमाशे में बदल देते हैं। वास्तविकता यह है कि हर बम के पीछे मानव जीवन का विनाश होता है, हर मिसाइल किसी शहर, किसी परिवार, किसी स्मृति को मिटा देती है। लेकिन टीवी स्क्रीन पर यह सब केवल ग्राफिक्स और आंकड़ों में सिमट जाता है।
विरोध यहाँ से शुरू होता है—इस अमानवीकरण के खिलाफ, इस तमाशाकरण के खिलाफ। यह जरूरी है कि हम इस प्रवृत्ति को पहचानें और सवाल करें कि क्या हम सचमुच खबर देख रहे हैं या हमें एक कथा सुनाई जा रही है।जो किसी और के हितों के अनुसार गढ़ी गई है।
भारतीय मीडिया को यह समझना होगा कि उसका दायित्व केवल दर्शक को बाँधे रखना नहीं है बल्कि उसे सचेत करना भी है। अगर वह केवल मनोरंजन और उन्माद का माध्यम बनकर रह जाएगा तो वह धीरे-धीरे अपनी विश्वसनीयता खो देगा। और जब मीडिया की विश्वसनीयता खत्म होती है तो लोकतंत्र का एक महत्त्वपूर्ण स्तंभ भी कमजोर हो जाता है।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि इस तरह की कवरेज एक तरह का “वैचारिक आयात” भी है।
पश्चिमी मीडिया जिस तरह से इन घटनाओं को प्रस्तुत करता है, भारतीय चैनल अक्सर उसी शैली की नकल करते हैं, बिना यह सोचे कि हमारे सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भ अलग हैं। यह नकल केवल शैली की नहीं बल्कि दृष्टिकोण की भी होती है जो हमारे अपने अनुभवों और जरूरतों को हाशिए पर डाल देती है।
यह प्रश्न केवल मीडिया का नहीं, दर्शक का भी है। जब तक दर्शक इस तमाशे को देखता रहेगा, उसकी मांग बनी रहेगी। लेकिन दर्शक की पसंद भी एक दिन में नहीं बनती; उसे लगातार उसी तरह की सामग्री परोसी जाती है, जिससे उसकी संवेदनाएँ उसी दिशा में ढलती जाती हैं। यह एक चक्र है, जिसमें मीडिया और दर्शक दोनों एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं।
इसलिए विरोध केवल आलोचना से आगे जाना चाहिए—यह एक सजगता की मांग करता है। यह समझने की कि हर “ब्रेकिंग न्यूज़” वास्तव में कितनी “ब्रेकिंग” है, और हर युद्ध हमारे लिए कितना प्रासंगिक है। यह भी समझने की कि जो खबरें हमें नहीं दिखाई जा रही हैं, वे शायद ज्यादा महत्त्वपूर्ण हैं।
और हाँ, यह उम्मीद करना कि न्यूज़ चैनल अचानक आत्मज्ञान प्राप्त कर लेंगे और अपनी प्राथमिकताएँ बदल देंगे, थोड़ा वैसा ही है जैसे यह उम्मीद करना कि युद्ध खुद ही बंद हो जाएँगे क्योंकि वे अमानवीय हैं। दुनिया इतनी सीधी नहीं है। लेकिन दर्शक अगर थोड़ी समझदारी दिखाए, तो इस तमाशे की चमक थोड़ी कम जरूर हो सकती है।
बाकी, स्टूडियो में बैठे एंकर कल फिर किसी नक्शे पर तीर चलाएँगे और दर्शक फिर कुछ देर के लिए खुद को विश्व राजनीति का विशेषज्ञ समझेगा। मानव जाति को भ्रम पसंद है और मीडिया उसे बेचने का सबसे कुशल व्यापारी बन चुका है।
भारतीय न्यूज़ चैनलों की हालत कुछ ऐसी हो गई है कि उन्हें वास्तविकता से ज्यादा उसका चमकदार ट्रेलर पसंद आता है। अमरीका-इज़राइल-ईरान जैसे संघर्ष उनके लिए सूचना का विषय कम और प्रदर्शन का अवसर ज्यादा बन जाते हैं। वे युद्ध को समझाने के बजाय उसे बेचते हैं, जैसे कोई महँगा प्रोडक्ट हो जिसे हर हाल में दर्शक के दिमाग में ठूँसना है।
समस्या केवल कवरेज की मात्रा नहीं, उसके स्वरूप में है। जटिल अंतरराष्ट्रीय संबंधों को वे दो-तीन वाक्यों के आक्रामक नैरेटिव में बदल देते हैं—जहाँ इतिहास, कूटनीति और मानवीय त्रासदी सब गायब हो जाती है और बचता है सिर्फ शोर। यह शोर दर्शक को जागरूक नहीं करता बल्कि उसे एक तरह की नकली उत्तेजना में डाल देता है जहाँ वह खुद को जानकार समझता है लेकिन असल में कुछ भी गहराई से नहीं समझ पाता।
इस प्रवृत्ति का एक खतरनाक पहलू यह है कि यह देश के भीतर के जरूरी मुद्दों को पीछे धकेल देती है। जब हर समय दूर के युद्ध स्क्रीन पर छाए रहते हैं तो पास की समस्याएँ अदृश्य हो जाती हैं। मीडिया जो लोकतंत्र का आईना माना जाता है, धीरे-धीरे एक ऐसा दर्पण बन जाता है जिसमें केवल वही दिखता है जो बिकाऊ है, न कि जो आवश्यक है।
और सच कहें तो यह सब आकस्मिक नहीं है। यह बाज़ार, सत्ता और दर्शक-रुचि के गठजोड़ का परिणाम है। टीआरपी की भूख ने पत्रकारिता को तमाशे में बदल दिया है। एंकर अब संवाददाता कम और प्रस्तोता ज्यादा लगते हैं जिनका काम सूचना देना नहीं बल्कि माहौल बनाना है।
मीडिया पर गंभीर टिप्पणी करते समय यह मान लेना चाहिए कि समस्या केवल संस्थानों में नहीं, उस पूरी संरचना में है जिसने समाचार को उपभोग की वस्तु बना दिया है। जब तक यह संरचना बदलेगी नहीं, तब तक हर युद्ध, हर संकट इसी तरह एक “शो” में बदलता रहेगा—और दर्शक, चाहकर भी, दर्शक ही बना रहेगा।
आभार~ परिचय दास
