फेंनुस : स्वाद से स्मृति तक
श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

आज सुबह एक तस्वीर दिखी। ट्वीटर पर। किसी ने पूछा था। “यह क्या चीज है?” देखा। ठिठक गया। सहसा मन, स्मृति के किसी सघन वन में उतर गया। बचपन के दिन बाइस्कोप-से खुलने लगे। सीन-दर-सीन। वह तस्वीर फेंनुस की थी। वही, जिसे कहीं ‘फेंनसा’ कहते हैं, कहीं ‘इंद्री’, तो कहीं ‘खिरसा’। देखा तो लगा, सामने कोई व्यंजन नहीं, पूरा बचपन है। भाप उठती कड़ाही के साथ नानी की मुस्कान। गाय की रंभाहट। गँवई आँगन की भोर। फेंनुस कोई साधारण पकवान नहीं था।
वह तो उत्सव था, सद्यः प्रसूता गाय या भैंस के पहले दूध से बना, गाढ़ा, केसरिया, दानेदार। चूल्हे पर जब वह दूध धीमी आँच पर उबलता, तो घर-भर में उसकी खुशबू बिखर जाती। उबालते-उबालते उसमें एक विशेष गाढ़ापन और दानेदार मृदुता आ जाती है। अति-पौष्टिक, दानेदार, मुँह में घुल जाने वाला व्यंजन। नानी कहतीं, “धीरे चलाना, नहीं तो दूध बैठ जाएगा।”
बहरहाल फेंनुस बनाना भी जैसे एक रीति हुआ करती थी। जब माटी के चूल्हे पर पीतल की कढ़ाई चढ़ाई जाती, तो धीरे-धीरे दूध की खुशबू पूरे आँगन में फैल जाती। माई या मौसी, धीमी आँच पर उस दूध को लगातार चलातीं। ताकि तले में न लगे, ऊपर न उफने। जब दूध का रंग सुनहला होने लगता, तब लगता, जैसे सूरज का टुकड़ा चूल्हे पर उतर आया हो। और अंत में, बचता, दानेदार फेंनुस।
उसे कोई गुड़ में नहलाता, कोई मीठी चीनी से सजाता। पर स्वाद की असल परीक्षा तब होती, जब बिना किसी मिलावट के, सादा फेंनुस कटोरे में परोसा जाता। वह स्वाद आज भी ज़ुबान नहीं भूल पाती। एकांत में भी जैसे कोई पुरानी धुन गुनगुनाने लगती है।
हमारी नानी जब फेंनुस बनाती थीं, तो वह केवल भोजन नहीं बनता था, वह मेरे बालपन का त्योहार बन जाता था। कभी-कभी भादो की रिमझिम में नानी कहतीं, “अरे, कल सीता के भैंस बियाइल बिया, तोहरे खातिर फेंनुस भेजले बाड़ी।” यह सुनते ही भीतर बेसब्री-बेताबी उतर आती। सीता दीदी के घर से ढेर सारा फेंनुस आता। कहीं मदन मामा के घर से, तो कभी कैलास भाई के घर से।
कभी दयानंद भैया के घर से। कभी पंडी जी के घर से। मेरे अलावा फेंनुस कोई खाता नहीं था। क्योंकि गुरुमुख हुए लोग गाय-भैंस के प्रसव के 21 दिनों के बाद का ही दूध ग्रहण करते। लिहाजा हमारे लिए प्रचूर दूध। गर्म दानेदार, केसर की रंगत लिए फेंनुस को छेड़ने की हिम्मत भी न होती, जैसे कोई पूजा का प्रसाद हो। मन भर खाता। फुलहा कटोरा में भर कर।
नानी बतातीं कि यह “देह को ताकत देता है…” शायद इसीलिए, फेंनुस में केवल दूध या स्वाद नहीं था, उसमें माँ की ममता, पशु के श्रम और खेत की गंध भी घुली रहती थी। पर, आज गाँवों से गाय-भैंस की रंभाहट गुम है। जिस ‘खूँटे’ पर या घारी या घोठे पर कभी दूध दुहते वक्त गाय-भैंस बाँधी जाती थीं, वहाँ अब मोटरसाइकिलें टिकी हैं। जिन नादों में छाँटी-पानी छलकता था, वे अब चबूतरों या गमलों के रूप में स्मृति का हिस्सा भर रह गए हैं। हर दुआर या बथान में कभी नाद, छँटी-कट्टा मशीन और एक रस्सी या छान लटकती थी, अब वहाँ प्लास्टिक के बाल्टी और पैकेट बंद दूध की थैलियाँ हैं।
गाँव का आदमी अब पशुपालन से थक गया है। इसे कई कारण भी हैं। मसलन खेत छोटे, चारा महँगा, मेहनत ज़्यादा और दूध के दाम इतने नहीं कि पशु का पेट भी भर सके। फिर, गाँव का युवा अब गाँव में रहना नहीं चाहता। शहर की नौकरी। चमकदार जीवन और तत्काल सुविधा का आकर्षण उसे पशु रखने से दूर ले गया। पहले जब ‘बियाँव’ होता था, तो पूरा टोला उस घर में जाता, नई बछिया को देखता, दुलारता। अब तो यह संस्कार ही भूला जा रहा है।
फेंनुस कोई सोफे पर बैठे चम्मच से खाने की चीज़ नहीं है। उसे तो गरम-गरम ही मुँह में डालो, उसकी तासीर, उसकी मिठास, उसका घुला हुआ स्वाद भीतर तक उतर जाता है। उसमें जो दानेदार बनावट होती है, वह न हलवे जैसी है, न खीर जैसी। वह अपने आप में अनूठी है। शायद इसलिए उसका स्वाद ‘अकथनीय’ कहा जाना चाहिए। यह वही स्वाद है, जो माँ अपने बच्चे के लिए बचाकर रखती है। बच्चा बाद में उसे याद करके आँसू निगलता।
आज जब हम पैकेट-दूध के फॉइल को काटकर कॉर्नफ्लोर से बनी मिठाई खाते हैं, तो लगता है, हमने स्वाद नहीं, संवेदना भी खो दी। फेंनुस का स्वाद अब केवल जिह्वा का नहीं, स्मृति का हिस्सा हो गया है।
भारतीय गाँवों के जीवन में दूध केवल आहार नहीं, धर्म का अंग रहा है।नवजात शिशु के लिए ‘पहली बिनौली’ (गाय का आरंभिक दूध) शुभ मानी जाती थी। यह कोलोस्ट्रम, जो प्रोटीन और ताकत से भरपूर होता है, फेंनुस का आधार है। यह ज्ञान गाँवों की स्त्रियों के परिश्रम और अनुभव से उपजा था, किताबों से नहीं। उत्तर भारत के विभिन्न हिस्सों में इसके भिन्न नाम हैं। याद कीजिए अवध में ‘फेंनसा’, पूर्वांचल में ‘इंद्री’, झारखंड में ‘खिरसा’, और कुछ बंगाल की सीमाओं में ‘पेंनोस’। यह व्यंजन सिर्फ स्वादिष्ट नहीं, लोक-वैज्ञानिक भी था, क्योंकि इससे शरीर को बल और गर्मी मिलती थी।
फेंनुस का उल्लेख कई लोकगीतों और ग्रामीण लोककथाओं में मिलता है। जहाँ नवजात बछिया या नवजात शिशु के जन्म के साथ इसका उल्लेख एक ‘शुभ पकवान’ के रूप में होता है। यह केवल भोजन न रहकर, एक सामाजिक संकेत बन जाता था, घर में नई ज़िंदगी आयी है।
यकीन मानिये गाँव अब वह नहीं रहा, जहाँ सूरज उगते ही चरवाहे बांसुरी बजाते दिखें। अब गाँव का किंकर्तव्य जीवन आर्थिक विवशताओं की गिरफ्त में है। चारा महँगा, खेत सिंचाई पर निर्भर, और नयी नस्लों की गायों में बीमारियाँ बढ़ गई हैं।
चारे-भूसे के लिए जगह नहीं बची। हार्वेस्टर और कंपाइन मशीन से खेती होती है। दूध बेचकर मिलने वाली रकम किसी तरह पशु के इलाज और चारे तक सीमित रह जाती है। ऐसे में किसान सोचता है, ‘क्या होगा गाय या भैंस रखकर? इस सोच का फैलना ही परंपरा के क्षरण का आरंभ है।
हमारी समझ से एक और बड़ा कारण है, जीवन की बदलती लय। पहले समय था। पशु बाँधने, दूध दुहने, दही जमाने का। अब कोई रुकना नहीं चाहता। काम पर जाने से पहले पैकेट फाड़ो, दूध उबालो और चल दो। सुविधा ने संस्कृति को विस्थापित कर दिया है।
फेंनुस अब केवल स्वाद नहीं, स्मृति है। जब कभी गर्मी की दोपहरी में गाँव के किसी वृद्ध से फेंनुस का नाम लो, तो उसकी आँखों में चमक लौट आती है। पूछता हूँ, तो जवाब मिलता है। अरे, बबुआ अब उ सुवाद कहाँ मिली? अब तऽ दूध भी दूध नाहीं रहल…। यह वाक्य केवल शिकायत नहीं, एक युग का शोकगीत है।
हमारे नाना की कही बात याद आती है। वह बताते थे। गाँव का लोक जीवन जब कृत्रिमता की गिरफ्त में आता है, तो वहाँ का स्वाद भी कृत्रिम हो जाता है। यही बात फेंनुस पर लागू होती है। जब खेत ऊसर हो रहे हैं, तालाब सूख रहे हैं, जनमानस शहर की दिशा में पलायन कर रहा है, तो फेंनुस जैसा सरल, खाँटी, असल स्वाद केवल यादों के गालों में खिलखिला सकता है, मुँह में नहीं।
यकीन मानिए फेंनुस आज हमारी स्मृति में एक लोकगाथा की तरह जीवित है। उसके साथ हमारे गाँव का औदार्य, पशुओं की रंभाहट, और नानी के हाथों की थरथराती स्नेहिल उँगलियाँ बची हैं। पर भीतर कहीं उम्मीद भी है,
अगर कभी गाँव में कोई गाय फिर बियायेगी, तो शायद कोई नानी फिर कड़ाही चढ़ाएगी, फिर सुनहले दूध से उठती भाप में यादों का कोई पुराना गीत गुनगुनायेगा। शायद तब हम दोबारा अनुभव कर पाएँ कि असली स्वाद केवल जीभ से नहीं, अंतर मन से चखा जाता है।
